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यूपी का रण : मिर्जापुर मंडल में भाजपा के सामने प्रदर्शन दोहराने की चुनौती तो अन्य दलों के दमखम की भी होगी अग्निपरीक्षा

Wed, 15 Dec 2021 09:14 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Wed, 15 Dec 2021 09:14 AM IST
सार

1989 के बाद जब कांग्रेस का पराभव हुआ तो लोग अन्य दलों में विकल्प तलाशने लगे। इस बदलाव पर राममंदिर आंदोलन का भी बहुत हद तक प्रभाव रहा। बात 2017 के चुनाव की करें तो मंडल की 12 सीटों में से 9 पर भगवा परचम फहराया।

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If the challenge of repeating the demonstration in front of the BJP in Mirzapur division, then the strength of other parties will also be a litmus test.
मां विंध्यवासिनी मंदिर परिसर के कायाकल्प के तहत विंध्य कॉरिडोर योजना - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मिर्जापुर मंडल का सियासी मिजाज कभी एक जैसा नहीं रहा। राजनीतिक दिग्गजों की जन्म एवं कर्मभूमि वाली यह धरती देश के अन्य इलाकों की तरह शुरू में कांग्रेस के साथ चली। पर, वर्ष 1989 के बाद जब कांग्रेस का पराभव हुआ तो लोग अन्य दलों में विकल्प तलाशने लगे। इस बदलाव पर राममंदिर आंदोलन का भी बहुत हद तक प्रभाव रहा। बात 2017 के चुनाव की करें तो मंडल की 12 सीटों में से 9 पर भगवा परचम फहराया। वहीं, दो सीटें भाजपा के सहयोगी अपना दल के खाते में गईं। जबकि एक सीट पर निषाद पार्टी का कब्जा है। सरकार के पास मंडल में गिनाने के लिए विंध्य कॉरिडोर, हर घर नल से जल, मेडिकल कॉलेज जैसे विकास कार्य हैं, पर दूसरी ओर पिछड़े और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अपेक्षित विकास नहीं होने का सवाल भी है। बहरहाल सियासी पंडितों का मानना है कि यहां जातिगत समीकरणों को जो साध लेता है, उसी के सिर ताज सजता है। पढ़िए जयेंद्र चतुर्वेदी, मनीष जायसवाल, सुजीत शुक्ला की रिपोर्ट...

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विंध्याचल शक्तिपीठ का अपना आध्यात्मिक महत्व है। अमरकोश की व्याख्या के अनुसार विंध्य शब्द संस्कृत के वैन्ध शब्द से उत्पन्न हुआ, जिसका अर्थ है बाधा डालना या रोकना। कथाओं के अनुसार विंध्य कभी सूर्य का मार्ग रोकते थे, जिससे उनका यह नाम पड़ा। शायद इसी वजह से यहां की मिट्टी की ऐसी तासीर रही कि जिसका साथ दिया उसके साथ मजबूती से खड़े रहे। कई-कई बार आजमाया। विंध्याचल पर्वत का केंद्र जो विधानसभा क्षेत्र के लिहाज से मिर्जापुर के नाम से जाना जाता है, इस सीट पर 1962 में ही जनसंघ का दीपक जलने लगा, जो लगातार जला। पहले भगवान दास, फिर विजय बहादुर और उसके बाद आशाराम जीते। वर्ष 1977 में राजनाथ सिंह यहां से जीते। महज 26 साल की उम्र में उन्हें विधानसभा पहुंचाया। राममंदिर आंदोलन से यहां का मिजाज ऐसा बदला कि 1989 से 1996 तक डॉ. सुरजीत डंग ने कमल खिलाया। अलबत्ता 2002 में सपा के कैलाश चौरसिया यहां साइकिल दौड़ाने में कामयाब हुए थे, पर 2017 में जनता ने उन्हें भी विदा कर दिया और भाजपा के रत्नाकर मिश्रा विधायक बने।

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चुनार में भी फहराया भगवा परचम
कुर्मी बहुल चुनार सीट पर शुरू में जनता दल के उस समय बेलौस व मुंहफट नेता यदुनाथ सिंह पटेल का ही दबदबा रहा। पर, 1993 में भाजपा के दिग्गज नेताओं में शामिल रहे ओमप्रकाश सिंह यहां से जीते। ओमप्रकाश लगातार चार बार जीतते रहे, पर 2012 के चुनाव में अखिलेश की उम्मीदों की साइकिल ने उनकी रफ्तार पर ब्रेक लगा दी। हालांकि, पांच साल बाद ही ओमप्रकाश सिंह के पुत्र अनुराग ने पिता की पराजय का बदला लेकर इस सीट पर फिर कमल खिला दिया।

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पं. कमलापति के परिवार का रहा प्रभाव 
वर्ष 2012 में अस्तित्व में आई और नक्सल प्रभावित मड़िहान पहले राजगढ़ विधानभा क्षेत्र का हिस्सा थी। राजगढ़ से कमलापति त्रिपाठी के पुत्र लोकपति त्रिपाठी कई बार विधायक रहे। सीट का नाम बदलकर मड़िहान होने के बाद भी कमलापति त्रिपाठी के परिवार से लोगों का लगाव बना रहा। यह लगाव ही माना जाएगा कि पटेल, कोल, आदिवासी, मौर्य  मतदाता बहुल इस सीट पर वर्ष 2012 में हुए पहले चुनाव में भी कमलापति त्रिपाठी का परिवार ही जीता। उनके पौत्र कांग्रेस के ललितेश पति त्रिपाठी ने यहां उम्मीदों की साइकिल की रफ्तार रोक दी। पर, 2017 में चल रही भगवा बयार के सामने कांग्रेस ठहर नहीं पाई। भाजपा के रमाशंकर पटेल ने ललितेश को हरा दिया।


दिग्गजों की सीट रही मझवां 
कमलापति त्रिपाठी के पुत्र लोकपति त्रिपाठी को अपना विधायक चुन चुकी मझवां सीट लंबे समय तक वीआईपी मानी जाती रही। इसकी बड़ी वजह यहां से चुने गए विधायकों का मंत्री बनना रहा। इनमें लोकपति त्रिपाठी, रुद्र प्रसाद सिंह और बसपा के भागवत पाल शामिल रहे। 1991 में इस सीट का मिजाज बदला। ज्यादातर ने बसपा को पसंद किया। बीच-बीच में कुछ बार भाजपा को आजमाया। 2017 में यहां से शुचिस्मिता मौर्य ने लगातार तीन बार से चुने जा रहे बसपा के डॉ. रमेश चंद्र बिंद को पराजित कर कमल खिलाया। शुचिस्मिता 1996 में यहां से भाजपा से विधायक रहे रामचंद्र मौर्य की बहू हैं। 


रॉबर्ट्सगंज पर रहा भगवा का प्रभाव 
चुनार किले के कथानक पर देवकीनंदन खत्री के उपन्यास में उल्लिखित विजयगढ़ रॉबर्ट्सगंज विधानसभा क्षेत्र में ही है। दस्यु सरगना घमड़ी प्रसाद यहां विधायक रह चुके हैं। इस सीट पर ब्राह्मण और पिछड़ी जातियों की आबादी के समीकरण से चुनाव का परिणाम तय होता है। शुरुआत में कांग्रेस की प्रभुत्व वाली इस सीट पर 1969 के बाद जनसंघ का दबदबा बढ़ा। विधानसभा के 17 चुनाव में सात बार जनसंघ या भाजपा का झंडा फहराया है। इस समय यहां से भाजपा के भूपेश चौबे विधायक हैं। वहीं, घोरावल सीट 2012 में अस्तित्व में आई। 2012 में यहां साइकिल दौड़ी तो 2017 में कमल खिला। ओबरा सीट भी 2012 में ही अस्तित्व में आई। यह उन दो सीटों में है जो 2017 में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित की गईं। मोदी लहर ने यहां भी कमाल दिखाया। दुद्धी सीट भी अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है। 2017 में यहां अपना दल गठबंधन के हरिराम चेरो चुनाव जीते। 

पर्यटन स्थलों का विकास नहीं
मिर्जापुर जिले में चुनार किला, सिद्धनाथ की दरी, विंढम व टाडा जलप्रपात समेत कई ऐसे पर्यटन स्थल उपलब्ध हैं, जिसके विकास का मुद्दा हर चुनाव में होता है। चुनार का प्रसिद्ध चीनी मिट्टी के बर्तन बनाने का उद्योग भी बंद होने के कगार पर है। स्थानीय राजेश पटेल बताते हैं, परंपरागत तरीके से कांसे के बर्तन बनाने का काम होता था, लेकिन मांग घटने की वजह से यह कारोबार दम तोड़ रहा है। राजेंद्र प्रसाद प्रजापति भी चुनावी चर्चा छिड़ते ही हस्तशिल्प कारोबार की दशा पर राजेश जैसा ही सवाल उठाते हैं। 


विश्वविद्यालय का सपना अधूरा
मिर्जापुर के ही आकाश यादव कहते हैं, अभी तक विश्वविद्यालय का सपना अधूरा है। सैनिक स्कूल की मांग भी समय-समय पर की जाती रही है। युवा आयुष सिंह का कहना है कि आज भी बेहतर उच्च शिक्षा के लिए लोगों को दूसरे जिले का रुख करना पड़ता है।


उम्र गुजार चुके पुल का नहीं मिला विकल्प
प्रमुख जिलों और प्रदेशों से मिर्जापुर को जोड़ने वाला शास्त्री पुल कमजोर हो चुका है। इस पुल में अक्सर समस्या आने पर भारी वाहनों के आवागमन पर रोक लगा दी जाती है। ट्रक कारोबार से जुड़े शैलेश दुबे ने कहा कि परिवहन में रुकावट के चलते यहां खनन और समृद्ध ट्रक कारोबार बड़े पैमाने पर प्रभावित हुआ। 


सोनभद्र : थोड़ा हुआ, बहुत की है जरूरत
बात सोनभद्र की करें तो कभी खनन उद्योग से हजारों लोगों को रोजगार देने वाला यह जिला सियासतदानों के लिए हमेशा उर्वर रहा। समाजसेवी रमेश सिंह कहते हैं, खनिजों की अकूत संपदा समेटे इस जिले में शिक्षा, सड़क और सबसे जरूरी पेयजल को लेकर हमेशा लोग परेशान रहे हैं। हालांकि, जल जीवन मिशन योजना के तहत गांव-गाव पानी पहुंचाने का काम शुरू होने से लोग कुछ हद तक राहत जरूर महसूस कर रहे हैं। एक मेडिकल कॉलेज खोलकर पूरे जिले की चिकित्सा व्यवस्था को सुधारने की प्रयास जरूर किया गया है।  ज्ञानेश्वर श्रीवास्तव बताते हैं कि सुदूर आदिवासी बहुल इलाकों में स्थित अस्पतालों में डॉक्टर और दवाएं नहीं मिलने की समस्या आम है। मुद्दों पर चर्चा के दौरान कृपाशंकर पेयजल की समस्या पर सवाल उठाते हैं। वह कहते हैं, रिहंद जलाशय के चारों तरफ  स्थित गांवों में दूषित पेयजल की समस्या है। पानी में फ्लोराइड, आयरन की अधिकता से लोग बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। हर घर नल से जल योजना पूरी हो तभी बदलाव आ सकता है। वहीं, गिरीश पांडेय कहते हैं एनसीएल, एनटीपीसी, हिंडाल्को, तापीय परियोजनाओं जैसे बड़े औद्योगिक संस्थाओं के बावजूद यहां के लोगों को रोजगार की तलाश में पलायन करना पड़ रहा है।


भदोही : कारपेट सिटी का तमगा...सड़कें अब भी नहीं बनीं
अखिल भारतीय कालीन निर्माता संघ के अध्यक्ष ओंकार मिश्रा कहते हैं, कारपेट सिटी का तमगा मिलने के बाद भी भदोही को दूसरे जिलों से जोड़ने वाली सड़कें अब भी नहीं बनी हैं। खास कर मंडल मुख्यालय मिर्जापुर से जिले को जोड़ने वाली एक ही सड़क उपलब्ध है, वह भी सिंगल रोड है। ऐेसे में रोजाना घंटों जाम लगना नियति बन गई है। इसी तरह स्वास्थ्य व शिक्षा के क्षेत्र में भी कोई उल्लेखनीय काम नहीं हुआ। एक 100 बेड का अस्पताल निर्माणाधीन है, जो कई वर्षों बाद भी अधूरा पड़ा है। ओंकार कहते हैं गंगा नदी पर कई पीपे के पुल हैं, जिसे पक्का करने के भी वादे सभी दल के जनप्रतिनिधि करते रहे हैं, लेकिन चुनाव बाद उन्हें यह वादे याद नहीं रहते हैं।  वहीं, कैयर मऊ (राजापुर) के गन्ना किसान मोहन सिंह कहते हैं कि करीब डेढ़ दशक से बंद औराई चीनी मिल को पुन: शुरू करने की जरूरत है। 

सीटों का गणित

मिर्जापुर (पांच सीटें)
मिर्जापुर नगर : भाजपा के रत्नाकर मिश्र विधायक हैं। इसके पहले सपा के कैलाश चौरसिया 2002 से लगातार तीन बार जीते थे।
जातिगत समीकरण : वैश्य करीब 60 हजार, ब्राह्मण 40 हजार, क्षत्रिय 25 हजार, 22 हजार यादव,  कायस्थ 20 हजार, मौर्य 15 हजार पटेल व बिंद 10-10 हजार और मुस्लिम 40 हजार।
मझवां : भाजपा की शुचिस्मिता मौर्य विधायक हैं। 
जातिगत समीकरण : ब्राह्मण और बिंद करीब 60-60 हजार, कुशवाहा 30 हजार, क्षत्रिय 20 हजार, पटेल 16 हजार और मुस्लिम 22 हजार।
चुनार : भाजपा के अनुराग सिंह विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : कुर्मी करीब 1.30 लाख,  निषाद, यादव, प्रजापति, लोहार, चौहान, राजभर, रौनियार व बियार करीब एक लाख, ब्राह्मण, क्षत्रिय व कायस्थ करीब 25 हजार, अनुसूचित जाति करीब 50 हजार।
मड़िहान : भाजपा के रमाशंकर पटेल विधायक हैं।
जातिगत समीकरण : कुर्मी करीब 90 हजार, कोल 40 हजार, मौर्या 27हजार, ब्राह्मण 13 हजार, यादव व सोनकर 10-10 हजार, अनुसूचित जाति 30 हजार और मुस्लिम 14 हजार।
छानबे (सु.) : अपना दल (एस) के राहुल प्रकाश विधायक हैं। 
जातिगत समीकरण : कोल करीब 62 हजार, अन्य अनुसूचित जातियां 55 हजार, ब्राह्मण 58 हजार, बिंद 30 हजार, मौर्य 25 हजार, कुर्मी 20 हजार, मुस्लिम 18 हजार, क्षत्रिय 16 हजार, पाल 15 हजार, कहार, कुम्हार, धोबी, नाई, निषाद आदि 45 हजार।  


भदोही (तीन सीटें)
ज्ञानपुर : 2002 से बाहुबली विजय मिश्र इस सीट से विधायक हैं। मिश्र 2017 में निषाद पार्टी के टिकट से जीते। मिश्र इस समय जेल में बंद हैं।
जातिगत समीकरण :  ब्राह्मण करीब 75 हजार, बिंद 55 हजार, यादव 45 हजार, मुस्लिम 40 हजार, एससी 40 हजार, क्षत्रिय 20 हजार, पाल 25 हजार, मौर्य 25 हजार एवं अन्य 35 हजार।
औराई (सु.) : भाजपा के दीनानाथ भास्कर यहां से विधायक हैं। साल 2012 में औराई सुरक्षित सीट बनी। तब सपा की मधुबाला पासी जीती थीं।
जातिगत समीकरण : ब्राह्मण करीब 60 हजार, एससी 50 हजार, मुस्लिम, बिंद और यादव 40-40 हजार, क्षत्रिय 25 हजार, पाल 20 हजार, मौर्य 25 हजार और अन्य 55 हजार।
भदोही : भाजपा के रवींद्रनाथ त्रिपाठी विधायक हैं। 2012 में सपा से जाहिद बेग जीते थे।
जातिगत समीकरण : ब्राह्मण 70 हजार, मुस्लिम 60 हजार, यादव 55 हजार, बिंद 60 हजार, एससी 55 हजार, क्षत्रिय 25 हजार, पाल 30 हजार, मौर्य 25 हजार एवं अन्य 35 हजार।


सोनभद्र (चार सीटें)
रॉबर्ट्सगंज : भाजपा के भूपेश चौबे विधायक हैं। 2012 में यहां से सपा के अविनाश कुशवाहा ने जीत दर्ज की थी।
जातिगत समीकरण : ब्राह्मण 46 हजार, अनुसूचित जाति 39 हजार, वैश्य 28 हजार, अल्पसंख्यक 20 हजार, यादव 14 हजार, कुर्मी 18 हजार, धांगर 14 हजार, क्षत्रिय 13 हजार, कन्नौजिया 13 हजार, चेरो 6 हजार, बिंद-बियार व गोंड 40 हजार।
घोरावल : भाजपा के डॉ. अनिल मौर्य विधायक हैं। 2012 में यह सीट सृजित हुई थी। पहले चुनाव में सपा के रमेश चंद्र दुबे ने तब बसपा से उतरे डॉ. अनिल मौर्य को हराया था।
जातिगत समीकरण :  कुशवाहा करीब 58 हजार, ब्राह्मण 47 हजार, यादव 23 हजार, कुर्मी 34 हजार, अनुसूचित जाति 40 हजार, वैश्य 30 हजार, बिंद-बियार व चौहान 40 हजार, वैसवार 10 हजार, क्षत्रिय 15 हजार।
ओबरा : भाजपा के संजीव गोंड विधायक हैं। यह सीट 2012 में बनी थी।
जातिगत समीकरण : यादव करीब 32 हजार, खरवार 24 हजार, वैश्य 20 हजार, कोल 19 हजार, ब्राह्मण 15 हजार, वैसवार 12 हजार, मौर्या, पटेल व विश्वकर्मा 30 हजार, बैगा, चेरो, पनिका 20 हजार।
दुद्धी (सु.) : अपना दल के हरिराम चेरो विधायक हैं। इस सीट से गोंड जनजाति के विजय सिंह लगातार सात बार विधायक रहे हैं।
जातिगत समीकरण : गोंड करीब 48 हजार, वैश्य 29 हजार, खरवार 25 हजार, ब्राह्मण 20 हजार, चेरो 12 हजार, वैसवार 13 हजार, अनुसूचित जाति 33 हजार, मुस्लिम-यादव 18-18 हजार, अन्य ओबीसी 40 हजार।

 

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