'पीआईएल छोड़ो, जरा अपनी ड्यूटी ढंग से करो अमिताभ ठाकुर'
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‘उत्तर प्रदेश के हालात चिंताजनक हैं,इसकी एक वजह यहां की नाकारा पुलिस भी है। आप आईजी रैंक के अधिकारी हैं, लेकिन समाज के प्रति कर्तव्य निभाने के बजाए इस बात में ज्यादा मशगूल रहते हैं कि कैसे कोई जनहित याचिका दाखिल कर सरकार के लिए निर्देश जारी करवाएं। आप खुद भी उसी सरकार का हिस्सा हैं,लेकिन अखबारों में नाम छपने और लोकप्रियता के लिए पीआईएल दाखिल करते रहते हैं। इस पर न केवल रोक लगनी चाहिए,बल्कि इसे गलत आचरण के रूप में देखा जाना चाहिए।’
अनुशासनहीनता के आरोप में निलंबित आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर की एक के बाद एक पीआईएल दाखिल करने पर हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने पिछले साल यह टिप्पणी की थी।
न्यायमूर्ति सुनील अंबवानी और न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय की पीठ ने इस तरह की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए निर्देश तक जारी किए कि अमिताभ ठाकुर सहित कोई भी सेवारत कर्मचारी सरकार की लिखित अनुमति के बिना पीआईएल दाखिल नहीं कर सकता।
'पीआईएल करनी है तो पहले सरकार से अनुमति लेकर आइए'
अमिताभ ठाकुर ने वकीलों के हड़ताल के खिलाफ पिछले साल पीआईएल दाखिल की थी। अदालत ने उन्हें कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि,‘इस मामले से आपका कोई लेना-देना नहीं हैं,अगर याचिका करनी ही है तो पहले सरकार की अनुमति लेकर आइए।’
अदालत ने कहा कि आईजी अमिताभ ठाकुर समाज की बेहतर सेवा कर सकते हैं लेकिन अपनीलोकप्रियता के लिए वे याचिकाएं दायर करते हैं। एक पुलिस अधिकारी का ऐसा आचरण को दुराचरण माना जाना चाहिए। अदालत ने कहा. महज याचिकाएं दायर कर बिजी दिखने की कोशिश करते हैं अमिताभ ठाकुर।
कोर्ट ने प्रदेश के मुख्य सचिव और केंद्र सरकार को निर्देश दिए कि कोई भी कर्मचारी सरकार से अनुमति के बगैर ऐसी कोई यचिका नहीं कर सकेगा,जिसका सीधा संबंध उससे न हो। साथ ही कहा कि केंद्र व राज्य इसकी पूरी पड़ताल करें कि क्या आईजी रैंक के किसी अधिकारी को ऐसी याचिकाएं दायर करने की अनुमति दी जानी चाहिए जिनमें वे हाईकोर्ट से सीधे या परोक्ष निर्देश लेकर केंद्र या प्रदेश सरकार के कामकाज पर बेजा असर डाल सकते हों।
अमिताभ ठाकुर ने दो साल में दर्ज की 20 याचिकाएं
हाईकोर्ट ने कहा कि आईजी ठाकुर ने 2012 से 2014 के बीच बीस पीआईएल दाखिल कीं। कई में सह-याचिकाकर्ता हैं। यही नहीं सरकार से अनुमति लिए बगैर ऐसे मामलों में याचिकाएं की हैं,जिनका उनसे कोई ताल्लुक नहीं है।
सरकार की आलोचना नहीं कर सकते अधिकारी
ठाकुर ने कोर्ट में दलील दी कि ऑल इंडिया सर्विसेस (कंडक्ट) रूल्स 1968 के अनुसार उन्हें प्रदेश सरकार से अनुमति लेने की जरूरत नहीं है।
इन याचिकाओं के बारे में उन्होंने सरकार को सूचित किया है। लेकिन हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी कर्मचारी रेडियो, मीडिया,किसी भी प्रकाशित दस्तावेज,प्रेस से बातचीत या सार्वजनिक संवाद के दौरान ऐसा कोई बयान या राय नहीं दे सकता जिसमें सरकार की नीतियों की आलोचना हो,या फिर ये बातें केंद्र व राज्य सरकारों के संबंधों पर असर डालती हों।
यहां तक परोक्ष तौर पर भी वह ऐसा नहीं कर सकता। हालांकि अपना कर्तव्य निभाते हुए कही बातों या व्यक्त विचारों को इससे अलग रखा गया है।
उस समय हाईकोर्ट ने अमिताभ ठाकुर को नसीहत दी थी कि वे एक सेवारत आईपीएस ऑफिसर होने के नाते नियमों से तो बंधे हैं ही,उन्हें सम्मानजनक व्यवहार भी करना चाहिए। आईपीएस अधिकारी 24 घंटे ड्यूटी पर माने जाते हैं। उनमें ईमानदारी,समर्पण और सरकार से मिले निर्देशों का पालन करने का गुण होना चाहिए। सरकार उन्हें ऐसी याचिकाएं दायर करने से रोक सकती है जिनका उनसे सीधा संबंध न हो।