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हाईकोर्ट ने कहा :सिविल विवाद को आपराधिक रूप देने की अनुमति नहीं दी जा सकती

Thu, 25 Aug 2022 08:47 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Thu, 25 Aug 2022 08:47 PM IST
सार

करार के मुताबिक शिकायतकर्ता को 20 लाख रुपये छह माह में देने थे लेकिन उसके द्वारा दी गए दो चेक बाउंस हो गए। इसके उपरांत शिकायतकर्ता ने सिविल कोर्ट में दीवानी वाद भी दायर कर दिया।

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High Court said: Civil dispute cannot be allowed to be criminalized
लखनऊ हाईकोर्ट

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए कहा है कि दो पक्षों के बीच के सिविल विवाद को आपराधिक रूप देते हुए, मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यह न्यायिक प्रक्रिया का दुरूपयोग है। इन टिप्पणियों के साथ कोर्ट ने याची के खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमे को निरस्त कर दिया।

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यह आदेश न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह की एकल पीठ ने अनिल कुमार तिवारी की ओर से दाखिल एक याचिका पर पारित किया। याची की ओर से अधिवक्ता चन्दन श्रीवास्तव की दलील थी कि याची की एक जमीन को बेंचने का करार याची व मामले के शिकायतकर्ता के मध्य हुआ था। करार के मुताबिक शिकायतकर्ता को 20 लाख रुपये छह माह में देने थे लेकिन उसके द्वारा दी गए दो चेक बाउंस हो गए। इसके उपरांत शिकायतकर्ता ने सिविल कोर्ट में दीवानी वाद भी दायर कर दिया।

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इसके छह वर्षों बाद इस मामले में याची के विरुद्ध आईपीसी की धारा 420 समेत अन्य आरोपों में एफआईआर दर्ज करवा दी गई, जिसकी विवेचना के उपरांत पुलिस ने याची के विरुद्ध आरोप पत्र दाखिल कर दिया व निचली अदालत ने उक्त आरोप पत्र पर संज्ञान लेते हुए, याची को तलब कर लिया। दलील दी गई कि याची व शिकायतकर्ता के बीच एक दीवानी विवाद है जिसे आपराधिक रंग देकर याची को वर्तमान मुकदमे में फँसाया गया है। सर्वोच्च व उच्च न्यायालय के निर्णयों का उल्लेख करते हुए, आरोप पत्र व निचली अदालत के संज्ञान आदेश को रद् करने की मांग की गई। 

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