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एलडीए बताए-किन अफसरों ने दिया था गरीबों के लिए बनाए गए मकान ढहाने का आदेश
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लखनऊ। हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने पारा के हंसखेड़ा और केसरीखेड़ा में गरीबों के लिए बने करीब दो हजार घर ढहाने का फैसला लेने वाले एलडीए के तत्कालीन अफसरों के नाम मांगे हैं। अदालत ने कहा कि प्राधिकरण इन मकानों का प्रोजेक्ट बनाने वाले अफसरों के नाम भी हलफनामे पर दे। अगली सुनवाई नौ नवंबर को होगी।
मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने शनिवार को यह आदेश स्थानीय अधिवक्ता मोतीलाल यादव की जनहित याचिका पर दिया। याची का कहना था कि वर्ष 1998-2000 में एलडीए ने गरीबों को न्यूनतम मासिक किस्त पर आवास की सुविधा देने के लिए ये मकान बनवाए थे। हैरान करने वाली बात यह है कि इन घरों में शौचालय, रसोई जैसी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं दी गईं। ये मकान उपयोग में नहीं आए तो एलडीए ने वर्ष 2012 में इन्हें तोड़कर मल्टी स्टोरी बिल्डिंग बनाने का प्रस्ताव पास कर दिया। याची का कहना है कि ऐसे योजना बनाने वाले अफसरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। इनके कामों से गरीबों को मकान तो मिले नहीं, उल्टे सरकारी धन की बर्बादी हुई। कोर्ट ने मामले में राज्य सरकार समेत एलडीए से जवाब मांगा था कि इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं? साथ ही क्या इनके खिलाफ कोई कार्रवाई की गई? अदालत ने यह भी पूछा था कि क्यों न इसके जिम्मेदार कर्मचारियों के खिलाफ दीवानी, विभागीय व आपराधिक कार्रवाई शुरू की जाए? कोर्ट के इस आदेश के तहत जवाब तो दाखिल किया गया, लेकिन जिम्मेदार अफसरों के नाम नहीं बताए गए।
2002 में बने मकान, 2009 में तोड़ने का प्रस्ताव
एलडीए ने वर्ष 2002 में इन मकानों का निर्माण पूरा कराया था। 2009 में इन्हें ध्वस्त करने का प्रस्ताव तैयार होकर बोर्ड बैठक में पहली बार पहुुंचा। साल 2012 में इन मकानों को तोड़कर मल्टी स्टोरी बनाने का प्रस्ताव पास हुआ। एलडीए मामले में लापरवाही बरतने वाले इंजीनियरों एवं अफसरों की शासन को रिपोर्ट भेज चुका है। हालांकि, अब तक जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं हो सकी है। इससे पहले हंसखेड़ा व केसरीखेड़ा में गरीबों के मकान बनने के बाद एलडीए ने आवंटन भी किया था। यहां काफी गरीब परिवार रहते भी थे। इनमें अधिकतर रिक्शा चालक ही थे। हालांकि, जर्जर होने के कारण रहने वालों के लिए जानलेवा साबित होने का अंदेशा हुआ तो मकान गिरा दिए गए।
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खड़े हैं समाजवादी एंक्लेव
मकानों को तोड़ने का सिलसिला 2014 तक चला। इस दौरान मुकेश मेश्राम, राजीव गंगवार, मृत्युंजय कुमार, डॉ. रजनीश दुबे, भुवनेश कुमार, एमपी अग्रवाल आदि वीसी तैनात रहे। ध्वस्तीकरण का आदेश भी बोर्ड बैठक में हुआ था। प्राधिकरण ने गरीबों के घर ढहाने के बाद हंसखेड़ा एवं केसरीखेड़ा की खाली जमीन पर समाजवादी एन्क्लेव योजना के तहत एमआईजी, एलआईजी के फ्लैट बनाने का सपना दिखाया। हालांकि, इसमें भी पंजीकरण कराने वालों का सपना पूरा नहीं हो सका। समाजवादी एन्क्लेव खड़े हैं, मगर पंजीयन कराने वाले फ्लैट नहीं पा सके। उधर, रेरा ने भी समय से इस योजना के पूरा न होने के कारण पंजीयन को निरस्त कर दिया है।
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मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने शनिवार को यह आदेश स्थानीय अधिवक्ता मोतीलाल यादव की जनहित याचिका पर दिया। याची का कहना था कि वर्ष 1998-2000 में एलडीए ने गरीबों को न्यूनतम मासिक किस्त पर आवास की सुविधा देने के लिए ये मकान बनवाए थे। हैरान करने वाली बात यह है कि इन घरों में शौचालय, रसोई जैसी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं दी गईं। ये मकान उपयोग में नहीं आए तो एलडीए ने वर्ष 2012 में इन्हें तोड़कर मल्टी स्टोरी बिल्डिंग बनाने का प्रस्ताव पास कर दिया। याची का कहना है कि ऐसे योजना बनाने वाले अफसरों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। इनके कामों से गरीबों को मकान तो मिले नहीं, उल्टे सरकारी धन की बर्बादी हुई। कोर्ट ने मामले में राज्य सरकार समेत एलडीए से जवाब मांगा था कि इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं? साथ ही क्या इनके खिलाफ कोई कार्रवाई की गई? अदालत ने यह भी पूछा था कि क्यों न इसके जिम्मेदार कर्मचारियों के खिलाफ दीवानी, विभागीय व आपराधिक कार्रवाई शुरू की जाए? कोर्ट के इस आदेश के तहत जवाब तो दाखिल किया गया, लेकिन जिम्मेदार अफसरों के नाम नहीं बताए गए।
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2002 में बने मकान, 2009 में तोड़ने का प्रस्ताव
एलडीए ने वर्ष 2002 में इन मकानों का निर्माण पूरा कराया था। 2009 में इन्हें ध्वस्त करने का प्रस्ताव तैयार होकर बोर्ड बैठक में पहली बार पहुुंचा। साल 2012 में इन मकानों को तोड़कर मल्टी स्टोरी बनाने का प्रस्ताव पास हुआ। एलडीए मामले में लापरवाही बरतने वाले इंजीनियरों एवं अफसरों की शासन को रिपोर्ट भेज चुका है। हालांकि, अब तक जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं हो सकी है। इससे पहले हंसखेड़ा व केसरीखेड़ा में गरीबों के मकान बनने के बाद एलडीए ने आवंटन भी किया था। यहां काफी गरीब परिवार रहते भी थे। इनमें अधिकतर रिक्शा चालक ही थे। हालांकि, जर्जर होने के कारण रहने वालों के लिए जानलेवा साबित होने का अंदेशा हुआ तो मकान गिरा दिए गए।
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खड़े हैं समाजवादी एंक्लेव
मकानों को तोड़ने का सिलसिला 2014 तक चला। इस दौरान मुकेश मेश्राम, राजीव गंगवार, मृत्युंजय कुमार, डॉ. रजनीश दुबे, भुवनेश कुमार, एमपी अग्रवाल आदि वीसी तैनात रहे। ध्वस्तीकरण का आदेश भी बोर्ड बैठक में हुआ था। प्राधिकरण ने गरीबों के घर ढहाने के बाद हंसखेड़ा एवं केसरीखेड़ा की खाली जमीन पर समाजवादी एन्क्लेव योजना के तहत एमआईजी, एलआईजी के फ्लैट बनाने का सपना दिखाया। हालांकि, इसमें भी पंजीकरण कराने वालों का सपना पूरा नहीं हो सका। समाजवादी एन्क्लेव खड़े हैं, मगर पंजीयन कराने वाले फ्लैट नहीं पा सके। उधर, रेरा ने भी समय से इस योजना के पूरा न होने के कारण पंजीयन को निरस्त कर दिया है।