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Lucknow News: राम मंदिर आंदोलन से निर्माण तक... हर पड़ाव के रहे साक्षी

Sun, 24 Aug 2025 09:02 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ Updated Sun, 24 Aug 2025 09:02 PM IST
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From Ram Mandir movement to its construction... he was a witness to every step
अयोध्या। रामनगरी की हवाओं में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा है। मंदिर आंदोलन के साक्षी, राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य, अयोध्या राजपरिवार के मुखिया और जनमानस में पप्पू भैया के नाम से प्रसिद्ध बिमलेंद्र मोहन मिश्र अब इस दुनिया में नहीं रहे। वह न सिर्फ राजपरिवार के उत्तराधिकारी थे, बल्कि राम मंदिर आंदोलन के उन दिनों की स्मृतियों में भी उनका नाम गहराई से दर्ज है।
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उन्होंने मंदिर आंदोलन के कई चरणों में सक्रिय भागीदारी निभाई। उनका व्यक्तित्व दो धाराओं का संगम था। एक ओर परंपरा और संस्कृति की छवि तो दूसरी ओर राजनीति की पगडंडी पर चलने का साहस। राजनीति में भी उन्होंने किस्मत आज़माई, 2009 में बसपा के टिकट पर सांसद का चुनाव लड़े। राजनीति ने उन्हें भले ही स्वीकार न किया हो, लेकिन आमजन के दिलों में ''पप्पू भैया'' बनकर बसे रहे। सहज व्यवहार, खुला हृदय और अपनापन ही उनकी असली पहचान थी। उनका व्यक्तित्व न केवल शाही गरिमा से परिपूर्ण था, बल्कि उनकी सादगी और समाजसेवा के प्रति समर्पण ने उन्हें जन-जन का प्रिय बना दिया था।
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वह अयोध्या रामायण मेला संरक्षक समिति के सक्रिय सदस्य थे और उत्तर प्रदेश सरकार की ऐतिहासिक भवनों के संरक्षण व पर्यटन को बढ़ावा देने वाली ‘हेरिटेज योजना’ की कार्यकारिणी में भी शामिल थे। उन्होंने अयोध्या में रामायण मेला जैसी सांस्कृतिक पहल को बढ़ावा दिया। साथ ही राजा जगदंबिका प्रताप नारायण सिंह एजुकेशन ट्रस्ट व विमला देवी न्यास फाउंडेशन के अध्यक्ष रहे। साकेत कॉलेज के निर्माण में उनकी अहम भूमिका थी। आज भी वर्षभर एक निर्धारित धनराशि साकेत काॅलेज के संचालन को राजपरिवार उन्हीं के नेतृत्व में देता रहा। खेलो में भी उनकी गहरी रुचि थी। उन्होंने राजसदन परिसर में ही एक क्रिकेट एकेडमी भी वर्षों तक संचालित कराई।
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बिमलेंद्र प्रताप मोहन मिश्र का राम जन्मभूमि आंदोलन से गहरा नाता रहा। कहा जाता है कि बाबरी विध्वंस के बाद रामलला की मूर्ति उनके घर से ही भेजी गई थी, जो उनकी भगवान राम के प्रति अटूट आस्था और समर्पण को दर्शाता है। सुप्रीम कोर्ट से मंदिर के हक में फैसले आने के बाद पीएम कार्यालय के निर्देश पर तत्कालीन कमिश्नर एमपी अग्रवाल ने श्रीराम जन्मभूमि के रिसीवर का चार्ज बिमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र को सौंपा था। इसके माध्यम से उन्होंने राम मंदिर निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह विहिप के बेहद करीबी रहे। मंदिर आंदोलन के समय ही राजा साहब ने शिलाओं की गढ़ाई के लिए रामघाट में भूमि विहिप को दान में दी थी।


अयोध्या की राजकुमारी सूरीरत्ना दो हजार वर्ष पूर्व दैवीय संदेश पाकर सुदीर्घ जलयात्रा से दक्षिण कोरिया पहुंची थी। जहां उनका विवाह राजा सूरो से हुआ और फिर उनका नाम रानी हो कर दिया गया। आज भी कोरिया में करक गोत्र के तकरीबन 60 लाख लोग स्वयं को राजा सूरो और अयोध्या की राजकुमारी का वशंज मानते हैं। अयोध्या के शाही परिवार और कोरिया के करक राजवंश का प्रतीक चिह्न एक समान है। ये हैं दो मछलियां। हर साल कोरिया का प्रतिनिधिमंडल रानी हो को श्रद्धांजलि अर्पित करने अयोध्या आता है। उनकी अगवानी राज सदन की ओर से ही की जाती है। इस दौरान भोज एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम की परंपरा वर्षों से निभाई जा रही है।
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