एफपीओ धान खरीद से बाहर, किसानों की आय बढ़ाने के प्रयासों को झटका
पिछले साल एफपीओ ने धान खरीदकर अच्छी पहचान बनाई थी और इससे किसानों को राहत भी मिली थी लेकिन अब किसान नाराज हैं।
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प्रदेश में समूह में खेती करने वाले कृषक उत्पादक संगठनों/ कंपनियों (एफपीओ/एफपीसी) को आय बढ़ाने के लिए कोविड महामारी के मुश्किल दौर में पहली बार धान खरीद की जिम्मेदारी दी गई। पर, गेहूं खरीद का मौका आया तो ऐसी शर्तें लगा दी गईं कि ज्यादातर एफपीओ खरीद व्यवस्था से बाहर हो गए। बाकी कसर नई धान खरीद नीति में पूरी कर दी गई। इस बार एफपीओ को धान खरीद व्यवस्था से ही बाहर कर दिया। इससे प्रदेश के एफपीओ और छोटे व लघु सीमांत किसानों की आय बढ़ाने के प्रयासों को झटका लगा है। किसानों में इस फैसले से जबर्दस्त नाराजगी है।
प्रदेश में तमाम एफपीओ निजी स्तर पर समूह में खेती व कई तरह के कृषि उत्पाद तैयार कर उसका कारोबार करते रहे हैं। कई ने अपने काम से प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर पर छाप छोड़ी है। लेकिन सरकारी स्तर पर इनके प्रोत्साहन की ठोस पहल पिछले वर्ष हुई। सरकार ने न सिर्फ एफपीओ को किसानों की आय बढ़ाने में मददगार मानते हुए एफपीओ नीति जारी की, बल्कि पहली बार 2020-21 में धान खरीद की जिम्मेदारी भी सौंपी। यह प्रयोग कारगर रहा। एफपीओ के काम की सराहना भी हुई।
लेकिन, इसके बाद जब गेहूं खरीद का मौका आया तो एक वर्ष पुराने पंजीकरण, 10 लाख की कार्यशील पूंजी जैसी कई ऐसी शर्तें जोड़ दी गई, जो धान खरीद में नहीं थी। इससे ज्यादातर एफ पीओ गेहूं खरीद व्यवस्था से बाहर हो गए। उस समय यह मामला उठा तो तत्कालीन खाद्य आयुक्त मनीष चौहान ने एफपीओ को पूरा अवसर देने का आश्वासन दिया। मगर, खाद्य आयुक्त बदले तो एफपीओ को खरीद व्यवस्था से ही बाहर कर दिया गया।
रामपुर कृषक फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी व पूर्वांचल पोल्ट्री उत्पादक कंपनी लि. सहित कई एफपीओ ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, प्रमुख सचिव खाद्य एवं रसद वीना कुमारी मीना और अपर मुख्य सचिव कृषि डॉ. देवेश चतुर्वेदी को प्रत्यावेदन भेजकर धान खरीद का अवसर दिलाने की मांग की है। मगर, किसी स्तर से कोई आश्वासन न मिलने से उनमें नाराजगी बढ़ रही है।
इस तरह किसानों की आय में होता है इजाफा
एफपीओ ज्यादातर लघु व सीमांत किसानों के समूह से बनते हैं। एफपीओ से खरीद होने से न सिर्फ सदस्य किसानों को धान बेचने में भागदौड़ से बचत होती है, बल्कि धान की पूरी कीमत भी मिल जाती है। खरीद से एफपीओ की जो आय होती है, उससे शेयरधारक किसानों को भी लाभांश प्राप्त होता है।
ये कहना है एफपीओ संचालकों का
हर एफपीओ में एक से दो हजार लघु-सीमांत किसान जुड़े हैं। इन किसानों के धान की मात्रा कम होने से इनकी बिक्री आसानी से नहीं हो पाती। इनका धान बिचौलियों के हाथों बिकता है जिससे इन्हें पूरी कीमत नहीं मिल पाती है। एफपीओ लघु व सीमांत किसानों से ही खरीद करती है। लेकिन एफपीओ को खरीद नीति से बाहर करने से यह समस्या फिर बढ़ जाएगी। एफपीओ के लिए काम केवल कागजी हैं। प्रमुख सचिव खाद्य न फोन उठाती हैं न ही मेल का संज्ञान लेती हैं।
- अमित वर्मा, निदेशक रामपुर कृषक फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी
एफपीओ किसानों की आय बढ़ाने के साथ उनको उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दिलाने का काम कर रहे हैं। पिछले वर्षों में मेरे समूह ने अच्छी मात्रा में खरीद की है जिससे समूह की आय में अच्छी वृद्धि हुई। धान खरीद से एफपीओ को बाहर किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण व किसान विरोधी है। एफपीओ को नीति में शामिल किया जाना चाहिए।
- वेदव्यास सिंह, निदेशक पूर्वांचल पोल्ट्री उत्पादक कंपनी लि.
केवल एफपीओ ही नहीं पूर्व में धान खरीद करने वाली कई एजेंसियों को धान खरीद से हटाया गया है। विभाग ने अपने सेंटर बढ़ाए हैं।
- वीना कुमारी मीना, प्रमुख सचिव खाद्य एवं रसद