अखिलेश सरकार के चार साल, बेमिसाल या बेहाल!
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अखिलेश सरकार का दावा है, ‘पूरे हुए वादे, अब हैं नए इरादे’, सपा कार्यकर्ता नारा दे रहे हैं, ‘कहो दिल से, अखिलेश फिर से’ खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ‘छठा बजट’ पेश करने का दावा कर रहे हैं, पर तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। सपा के चुनावी घोषणा पत्र के कई वादे अब भी ‘वादे’ ही हैं।
इन अधूरे वादों में कई ऐसे हैं जिसने 2012 के सियासी संग्राम में सपा को पूर्ण बहुमत के साथ सिंहासन तक पहुंचाया था। अब, सपा को 2017 के चुनावी समर में या तो इन अधूरे वादों पर सफाई देनी पड़ेगी या इन पर नए वादों का मुलम्मा चढ़ाना पड़ेगा।
सपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा राज के भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा बनाया था। उसकी जांच के लिए आयोग, मुसलमानों को दलितों की तरह सुविधाएं, किसानों को लाभकारी उपज के लिए किसान आयोग, राजकीय सुरक्षा बलों में मुसलमानों की भर्ती के विशेष अभियान जैसे तमाम वादे अभी ‘वादे’ ही बने हुए हैं।
महिलाओं को साड़ी, बुजुर्गों को कंबल, दसवीं पास छात्रों को टैबलेट, किसानों की जमीन लेने पर सर्किल रेट का छह गुना मुआवजा और दूसरे राज्यों के समान वैट के वादे भी पूरे नहीं हो पाए हैं।
मायाराज के भ्रष्टाचार की जांच के लिए आयोग नहीं
सपा ने कहा था कि बसपा सरकार के पांच साल के कार्यकाल में भ्रष्टाचार की जांच के लिए एक आयोग बनेगा। यह आयोग निश्चित समयसीमा में जांच करेगी। पर, सत्ता में आने के बाद सरकार न सिर्फ यह आयोग बनाना भूल गई, बल्कि बसपा से जुड़े नेताओं की लोकायुक्त की जांच रिपोर्ट पर भी कुंडली मार कर बैठ गई।
किसान आयोग का भी गठन नहीं
सपा ने किसान की उपज का लागत मूल्य तय करने के लिए आयोग के गठन का वादा किया था। कहा था, आयोग तीन माह में अपनी रिपोर्ट देगा। लागत मूल्य का 50 प्रतिशत जोड़कर जो राशि आएगी, उस आधार पर फसलों का समर्थन मूल्य तय होना था। सरकार इसी समर्थन मूल्य पर किसानों की उपज की खरीद सुनिश्चित करती। गन्ना, गेंहूं और धान की फसल से जुड़े किसानों को इससे बड़ी राहत मिलती। यह वादा भी अधूरा ही रहा।
भूमि अधिग्रहण पर छह गुना मुआवजा भी हवा में
सपा ने वादा किया था कि दो फसल देने वाली किसानों की जमीन का उद्योग व इन्फ्रास्ट्रक्चर डवलपमेंट के लिए अधिग्रहण पूर्णतया प्रतिबंधित रहेगा। इसका मुआवजा भी सर्किल रेट से छह गुना होगा।
उस क्षेत्र में उद्योग लगने पर किसान परिवार के एक युवक को नौकरी और बुजुर्ग दंपति को आजीवन पेंशन मिलेगी। स्थिति यह है कि सरकार अभी तक नीति ही नहीं तैयार कर पाई है। यही नहीं, प्रस्तावित नीति में छह गुना मुआवजे का प्रावधान भी गायब है।
मुसलमानों को दलितों की तरह आरक्षण का इंतजार
सच्चर कमेटी की सिफारिशों की रोशनी में सभी मुसलमानों को आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से अत्यधिक पिछड़ा मानते हुए दलितों की तरह अलग से आरक्षण देने का वादा किया था। इस पर भी कुछ नहीं हुआ।
राजकीय सुरक्षा बलों में मुसलमानों की भर्ती के कैंप भी नहीं
राजकीय सुरक्षा बलों में मुसलमानों की भर्ती के लिए विशेष कैंप लगाने का प्रावधान करने का वादा किया गया था। पर ऐसा हुआ नहीं।
बहुसदस्यीय तो छोड़िये, लोकायुक्त चयन में विवाद में रही सरकार
वादा किया गया था कि लोकायुक्त संस्था को न केवल मजबूत बनाया जाएगा बल्कि उसे बहु सदस्यीय भी बनाया जाएगा। पर, सरकार इस ओर कभी भी प्रयास करती नहीं दिखी। उल्टे लोकायुक्त चयन विवाद ने सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया। सुप्रीम कोर्ट तक फजीहत हुई।
महिलाओं व बुजुर्गों से किया वादा भी रहा अधूरा
सपा ने सरकार बनने पर बीपीएल की सभी महिलाओं को दो-दो साड़ी और बुजुर्गों को एक-एक कंबल देने का वादा किया था। सरकार बनी तो दो साल तक बजट में इसकी घोषणा की।
बजट का प्रावधान भी किया। मगर, वह न तो महिलाओं को साड़ी दे सकी न ही बुजुर्गों को कंबल। अब सरकार समाजवादी पेंशन को इस योजना का विकल्प साबित करने में जुटी है। देखना होगा, गरीबों, बुजुर्गों और महिलाओं को यह राग कितना भाता है।
एससी की सुविधाओं का इंतजार ही करती रहीं 17 पिछड़ी जातियां
सपा ने पिछड़ी जातियों में राजभर, निषाद, प्रजापति, मल्लाह, कहार, कश्यप, कुम्हार, धीमर, बिंद, भर, केवट, धीवर, बाथम, मछुआ, मांझी, तुरहा और गौड़ को अनुसूचित जाति में शामिल कर सभी सुविधाएं देने का वादा किया था।
इस मामले में केंद्र को चिट्ठी लिखने के सिवाय कोई और ठोस पहल नजर नहीं आई। सभी विभागों में भी इनको सुविधाएं मुहैया नहीं कराई जा सकीं। सरकार ने इन जातियों को मात्रात्मक आरक्षण का एक शासनादेश जरूर किया लेकिन ज्यादातर विभागों में इस पर अमल तक शुरू नहीं हो पाया है।
वैट घटाकर पड़ोसी राज्यों के बराबर करने का वादा भी भूले
जिन वस्तुओं पर व्यापार कर की दरें दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और बिहार से ज्यादा है, उन दरों को उनके समकक्ष किया जाएगा। सपा का यह वादा भी पूरा नहीं हुआ।
10वीं पास छात्रों को नहीं मिला टैबलेट
सपा ने सत्ता में आने पर कक्षा दस उत्तीर्ण छात्रों को को एक-एक टैबलेट देने का वादा किया था। सरकार ने शुरुआत में इस पर अमल का मन भी दिखाया। मगर, यह भी सिर्फ वादा ही रह गया।
2012 के विधानसभा चुनाव में ये वोटर तो नहीं थे, लेकिन अखिलेश की क्रांति रथ यात्रा जब घूम रही थी तब इनमें से तमाम अखिलेश जिंदाबाद के नारे लगाते नजर आते थे।
2017 में जब विधानसभा के चुनाव होंगे, तब 2012 में हाईस्कूल उत्तीर्ण करने वाले ये युवा स्नातक की पढ़ाई पूरी कर रहे होंगे। इस चुनाव में ये वोटर भी होंगे। इनकी भूमिका बेहद अहम होगी। सोशल मीडिया पर सबसे सक्रिय लोगों में इसी वय वर्ग के लोग माने जाते हैं।
ये काम शुरू तो किए.... बाद में पैर खींचे
मुस्लिम बालिकाओं का अनुदान शुरू करने के बाद बंद
10वीं पास मुस्लिम बालिकाओं को आगे की शिक्षा अथवा विवाह के लिए 30 हजार रुपये अनुदान का वादा किया था। सरकार बनी तो इस पर अमल के लिए ‘हमारी बेटी-उसका कल’ योजना शुरू की। मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप लगे तो तीसरे ही साल बंद कर दिया।
हर साल 12 हजार बेरोजगारी भत्ता देने का किया था वादा
वादा था कि सरकारी भर्ती की उम्र 35 साल होगी। 35 साल पूरा कर चुके युवाओं को हर साल 12 हजार रुपये बेरोजगारी भत्ता मिलेगा। सरकार ने भर्ती की उम्र 40 साल कर दी और एक साल बेरोजगारी भत्ता भी दिया। इसके बाद पंजीकृत बेरोजगारों के भत्ते की योजना बंद कर दी गई।
लैपटाप मेधावियों तक सीमित
सपा ने इंटरमीडिएट उत्तीर्ण सभी छात्रों को लैपटाप देने का वादा किया गया था। पहले साल दिया भी गया। मगर, अगले ही साल सरकार ने इसे मेधावी छात्रों तक सीमित कर दिया।
कन्या विद्याधन भी मेधावियों को ही
सपा के घोषणापत्र में कहा गया था कि हाईस्कूल तक शिक्षा प्राप्त कर चुकी लड़कियों को कन्या विद्याधन दिया जाएगा। सरकार ने पहले साल सभी के लिए यह योजना शुरू की। अगले साल से इसे मेधावियों तक सीमित कर दिया गया।