पंचायत चुनाव: भाजपा की तैयारियों पर किसान आंदोलन भारी, कार्यकर्ताओं को फिलहाल संवाद व संपर्क के टिप्स
भाजपा की पंचायत चुनाव की तैयारियों पर किसानों का आंदोलन भारी पड़ रहा है। अचानक शुरू हुए आंदोलन के लगातार तेज होने से पार्टी के रणनीतिकारों के सामने पहले बनी रणनीति में बदलाव की चुनौती खड़ी हो गई है। इन्हें लग रहा है कि इस मामले पर कोई समाधान निकले बिना पंचायत के चुनाव में उतरना नुकसानदेह साबित हो सकता है।
भाजपा के प्रदेश पदाधिकारियों की बैठक में भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई। इसमें फिलहाल पंचायतों के परिसीमन, आरक्षण और मतदाता सूची की पुनरीक्षण के कामों पर ध्यान देने के साथ लोगों से निजी तौर पर संपर्क -संवाद के टिप्स दिए गए।
पंचायत चुनाव की औपचारिक घोषणा सरकार को करनी है पर भाजपा में जिस तरह की चर्चा है, उससे इस चुनाव के जल्द होने की संभावना नहीं दिखाई दे रही है। संगठन के जिम्मेदार लोगों का मानना है कि खेती-किसानी से जुड़े मुद्दों का इन चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। ऐसे में इनकी अनदेखी कर चुनाव में जाना घाटे का सौदा हो सकता है।
इसका विरोधी पार्टियां भी राजनीतिक इस्तेमाल कर सकती हैं। वे भाजपा के लोगों को गांवों में घेरने के लिए किसानों की नाराजगी की आड़ में कुछ ऐसा भी कर सकती है, जिससे मुसीबत बढ़ सकती है।
भाजपा के सामने ये भी समस्या
किसानों के आंदोलन का मुद्दा पूरी तरह शांत किए बिना पंचायत चुनाव में उतरना भाजपा के लिए अच्छा नहीं रहेगा। क्योंकि गांवों के विकास के लिए केंद्र व प्रदेश सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं जैसे उज्ज्वला गैस कनेक्शन, कोरोना काल में मुफ्त अनाज व गांव में लोगों को रोजगार, हर घर नल, गरीबों को निशुल्क बिजली कनेक्शन, प्रवासी श्रमिकों को सहायता जैसे कामों से पार्टी को हासिल हुए समर्थन पर भी संकट खड़ा हो जाएगा। वहीं, कार्यकर्ताओं को किसानों से जुड़े मुद्दों पर लोगों के सामूहिक सवालों का जवाब देना पड़ेगा, इसके लिए भी तैयारी जरूरी है।
ये है रणनीति
लोकसभा चुनाव से लेकर विधानसभा चुनाव तक भाजपा की जीत का एक प्रमुख कारण सरकार की योजनाओं का लाभ सीधे लोगों के खाते में पहुंचाने और उनसे संवाद का प्लेटफार्म तैयार करने में सफलता हासिल कर लेना है। भाजपा नहीं चाहती है कि कोई ऐसी चूक हो, जिससे तमाम मेहनत के बाद पार्टी के पक्ष में बना माहौल बिगड़ जाए। इसलिए भाजपा की कोशिश है कि मंडल व जिलों की बैठकों और व्यक्तिगत संपर्क व संवाद के जरिये किसान आंदोलन के ताप को धीरे-धीरे ठंडा किया जाए। साथ ही केंद्र व प्रदेश सरकार की तरफ से गांव, ग्रामीण और किसानों के लिए किए कामों का विवरण तैयार कराकर लोगों को बताया जाए। सीधे चुनाव को लेकर अभियान तब शुरू किया जाए, जब किसानों का मुद्दा पूरी तरह सुलझ जाए।