आठ योजनाएं जिनसे 2017 में बजेगा सपा का डंका
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
राज्य सरकार की महत्वपूर्ण परियोजनाएं अधूरी रहने की सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव की चिंता अनायास नहीं है। सूबे में शिलान्यास व नई घोषित की गई परियोजनाओं की भरमार है। सरकार का कार्यकाल जैसे-जैसे बीत रहा है, इसमें तेजी आती जा रही है, मगर शुरू की गई परियोजनाएं तेजी से पूरी नहीं हो पा रहीं। जैसे-जैसे वक्त बीत रहा है, उनके अधूरे ही छूटने का खतरा बढ़ता जा रहा है।
जानकार बताते हैं कि अपनी सरकार की अधूरी परियोजनाओं का बसपा शासनकाल में हश्र देख चुके मुलायम वैसी नौबत नहीं आने देना चाहते। दूसरा, काम पूरे होंगे तभी चुनाव में फायदा भी होगा। सियासत में यही सवाल सबसे बड़ा है, लेकिन अगर ये योजनाएं पूरी हो गईं तो सपा 2017 में कमाल कर सकती है।
पहली योजना: सीजी सिटी, मुखड़ा ही हो जाए साकार
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सत्ता संभालने के बाद राजधानी में सीजी सिटी का सपना बुना। यहां बंगलूरू व हैदराबाद की तरह आईटी सिटी, ट्रिपल आईटी, कैंसर संस्थान व दुग्ध डेयरी सहित कई प्रोजेक्ट शामिल किए गए। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम भी यहीं पास में बन रहा है।
चकगंजरिया में सीजी सिटी बनाने की राह में कई कानूनी दांवपेंच भी आए। सरकार को इसका रास्ता बनाते-बनाते काफी समय बीत गया। आईटी सिटी के लिए निवेशक मिला तो सरकार की आधी चिंता दूर हो गई। यहां की ज्यादातर परियोजनाओं का शिलान्यास हो चुका है।
सीजी सिटी के ज्यादातर प्रोजेक्ट 2017 या उसके बाद पूरे होने वाले हैं। सरकार का प्रयास है कि पूरा प्रोजेक्ट न सही, आईटी सिटी का कम से कम मुखड़ा ही चुनाव के पहले तैयार हो जाए।
चुनाव से पहले इन योजनाओं का पूरा होना जरूरी
दूसरी योजना: मेट्रो प्रोजेक्ट का पूरा होना
लखनऊ मेट्रो मुख्यमंत्री की दूसरी महत्वाकांक्षी परियोजना है। शहर की यातायात व्यवस्था में सुधार के लिहाज से तैयार इस परियोजना से मेट्रोमैन श्रीधरन का जुड़ना सबसे बड़ी उपलब्धि रही। शिलान्यास होने के साथ ही इसका काम भी शुरू हो चुका है।
आम लोगों के लिए मेट्रो मार्च 2017 तक शुरू होने की संभावना है, मगर इसके पहले तीन महीने का ट्रायल होना है। सरकार चाहती है कि काम इतनी तेजी से हो कि चुनाव के पहले कम से कम ट्रायल तो शुरू हो जाए। हालांकि रणनीतिकारों ने दिसंबर 2016 तक मेट्रो चला देने का वादा किया है।
तीसरी योजना: आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे
आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे अखिलेश सरकार की तीसरी सबसे महत्वकांक्षी परियोजना मानी जाती है। सरकार पश्चिमी यूपी का पूरा सियासी गणित इस एक्सप्रेस-वे से सधता हुआ देख रही है। इसे पहले पीपीपी मोड में चलाने की योजना बनाई गई, मगर कोई निवेशक नहीं मिला।
ऐसे में सरकार ने इसे अपने बजट से बनाने का फैसला कर डाला। इसके लिए 15000 करोड़ के बजट के बंदोबस्त में सरकार को कई दूसरी योजनाओं से हाथ खींचना पड़ा।
पूर्व सीएम मायावती के यमुना एक्सप्रेस वे के जवाब में तैयार आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस वे का शिलान्यास कराने में ही सरकार का आधा वक्त बीत गया। अब मुलायम किसी भी कीमत पर इसे सितंबर 2016 तक पूरा करवाना चाहते हैं। यानी चुनाव से कम से कम छह महीने पहले।
ये तीन योजनाएं तो हैं बेहद महत्वपूर्ण
चौथी योजना: संगम सिटी ट्रांस गंगा
सरकार ने ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के तहत अर्ली बर्ड प्रोजेक्ट के रूप में संगम सिटी विकसित करने का प्लान बनाया है, लेकिन पूर्वांचल की तरक्की के लिहाज से इलाहाबाद में 1200 एकड़ में विकसित होने वाली यह इंटीग्रेटेड इंडस्ट्रियल टाउनशिप परियोजना बैठकों के आगे नहीं बढ़ पाई है। इसी तरह उन्नाव-कानपुर के बीच ट्रांस गंगा परियोजना भी बैठकों, प्रजेंटेशन और दावों से आगे नहीं बढ़ पाई है।
पांचवी योजना: घाटमपुर बिजली परियोजना
बस नींव की ईंट घाटमपुर में 1320 मेगावाट के प्रोजेक्ट का मुख्यमंत्री ने जून 2012 में शिलान्यास किया था। राज्य विद्युत उत्पादन निगम ने कोल इंडिया की सहायक संस्था नेवेल लिग्नाइट लि. को यह काम सौंपा था। इसके लिए एमओयू भी हो चुका है, लेकिन शिलान्यास के बाद यह प्रोजेक्ट एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाया है।
छठी योजना: दुग्ध डेयरी
पहले सरकारी, बाद में सहकारी का सहारा
मुख्यमंत्री ने सितंबर 2012 में बड़े धूमधाम से चक गंजरिया में सरकारी दुग्ध डेयरी का शिलान्यास किया था। सरकारी बजट से इसे शुरू करने का प्रस्ताव था, लेकिन पांच लाख लीटर दूध के प्रसंस्करण की क्षमता वाली यह डेयरी शुरू ही नहीं हो पाई।
इससे एक बात साफ हो गई कि योजना के निर्माण व क्रियान्वयन को लेकर नौकरशाही कितनी गफलत में थी। सालभर से ज्यादा समय बर्बाद होने के बाद अमूल को दुग्ध प्रसंस्करण इकाई लगाने का मौका दिया गया, जिसने काम शुरू कर दिया है। 2017 के पहले यह पूरा हो जाए तो बड़ी बात होगी।
इन दो पर हुआ काम तो सपा की राह होगी आसान
सातवीं योजना: अल्पसंख्यक छात्रों के लिए कोचिंग
सरकार ने अल्पसंख्यक छात्रों के लिए 4.35 करोड़ रुपये की लागत से राजधानी लखनऊ में आईएएस-पीसीएस कोचिंग संस्थान खोलने का फैसला किया था। यहां एक साथ 300 छात्र-छात्राएं प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग कर सकेंगे। पहले चरण में 150 छात्र-छात्राओं को मौका दिया जाना है, लेकिन ढाई साल तो योजना बनाने में ही बीत गए। अब तक इसकी शुरुआत नहीं हो पाई है।
आठवीं योजना: बैट्री चालित रिक्शा योजना
बस प्रयोग की स्कीम सरकार ने रिक्शाचालकों को बैट्री चालित मुफ्त रिक्शा देने का ऐलान किया था। इसकी काफी तारीफ हुई थी। मुख्यमंत्री ने समारोहपूर्वक इस योजना का शुभारंभ भी कर दिया। अपने आवास से ट्रायल के लिए 60-70 रिक्शाचालकों को बैट्री चालित रिक्शे दिए भी।
सरकार ने बजट में इसके लिए 500 करोड़ रुपये से अधिक का बंदोबस्त भी कर दिया, मगर यह योजना आगे बढ़ नहीं पाई। अभी तक यह टेंडर में ही उलझी हुई है। रिक्शाचालक अक्सर पूछते मिल जाते हैं कि उन्हें बैट्री चालित रिक्शा मिल पाएगा भी या नहीं।
सरकार गई तो अधूरे छोड़ दिए गए थे मुलायम के कई काम
- मुलायम सिंह की सरकार में बड़ी संख्या में पुल, ओवरब्रिज का निर्माण अधूरा छूट गया था। उनके बाद आई बसपा सरकार ने उनमें से कई के लिए बजट ही नहीं दिया। लोक निर्माण मंत्री शिवपाल सिंह यादव इसके लिए बसपा सरकार पर निशाना साधते रहते हैं।
- मुलायम ने नोएडा में हज हाउस के निर्माण की योजना बनाई थी। बसपा सरकार ने आते ही इसे पीछे धकेल दिया। अखिलेश सरकार ने इसकी राह में आई अड़चनें दूर कीं और काम शुरू कराया।
ढाई साल जैसे गफलत में रही नौकरशाही
शासन के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि ढाई साल तो सिर्फ बड़ी-बड़ी योजनाएं समझने, बनाने और बजट का बंदोबस्त बनाने में ही बीत गए। नौकरशाही काफी गफलत में रही। उसने कई परियोजनाओं को क्रियान्वित करने के ऐसे-ऐसे रास्ते समझाए जो संभव ही नहीं थे। बैठकें खूब हुईं, लेकिन नतीजे कम निकले।
इस बीच इतना समय बर्बाद हुआ कि अब आगे के लिए एक-एक दिन भारी पड़ने वाले हैं। हालांकि वे यह भी जोड़ते हैं कि इधर छह महीने में बहुत तेजी से काम हुए हैं। एक्सप्रेस वे का शिलान्यास इसी छह महीने की मेहनत का नतीजा है।
लखनऊ मेट्रो का शिलान्यास भी दिन-रात एक कर किए गए प्रयास का फल है। सीजी सिटी की अड़चनें भी दूर हुई हैं। ऐसे में अब माहौल बना है। मुलायम सिंह यादव के खुद आगे आने के बाद न सिर्फ अफसर, बल्कि खुद सीएम भी ज्यादा सक्रिय हुए हैं।
ऐसे में काम तेजी से बढ़ने की उम्मीद है। हालांकि बहुत समय बर्बाद हो चुका है। इसका कहीं न कहीं तो असर दिखेगा ही।