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Lucknow News: सपनों को मिला सम्मान का आंगन, किसी अभिभावक से कम नहीं है सामूहिक विवाह योजना
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सामूहिक विवाह समारोह में पति बलराम के साथ राधा कुमारी।
समीउद्दीन नीलू
लखनऊ। कुछ घरों में बेटियों की शादी तारीखों से नहीं, हालातों से तय होती है। कभी पिता का साया उठ जाता है, कभी रोटी की जद्दोजहद बड़ी हो जाती है। ऐसे में सपनों की डोली अक्सर चौखट पर ही रुक जाती है लेकिन सोमवार को हुए मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह समारोह में उन सपनों ने भी चलना सीख लिया, जिन्हें अभाव ने वर्षों से जकड़ रखा था। यह सिर्फ जोड़ियों के बनने का दिन नहीं था। यह उन मांओं की आंखों से बहते डर के थमने का दिन था, उन बेटियों की खामोश उम्मीदों के बोलने का दिन था और उन पिताओं की कमी को भरने का दिन था, जो अब सिर्फ यादों में रह गए हैं।
लखीमपुर के धौरहरा निवासी अरविंद कुमार जब गोसाईंगंज की उर्मिला कुमारी के साथ सात फेरे ले रहे थे तो उर्मिला की मुस्कान में राहत साफ झलक रही थी। पिता के निधन के बाद परिवार पर जिम्मेदारियों का बोझ इस कदर बढ़ा कि शादी का सपना बोझ लगने लगा था। उर्मिला धीमी आवाज में कहती हैं कि पिता होते तो शायद इतना मुश्किल नहीं होता... लेकिन इस योजना ने उनका खालीपन कुछ कम कर दिया।
काकोरी ब्लॉक के ग्राम सैफलपुर की राधा कुमारी की आंखें भी नम थीं। पिता की मौत और दिव्यांग भाई की जिम्मेदारी ने उसे समय से पहले ही बड़ा बना दिया था। अच्छे माहौल में विवाह की उम्मीद टूट चुकी थी। उन्नाव के हसनगंज मुन्नीखेड़ा निवासी बलराम के साथ विवाह के बाद राधा ने कहा कि आज मुझे ऐसा लगा, जैसे मेरे पिता कहीं यहीं मौजूद हों। मंत्रियों, विधायकों और अधिकारियों का आशीर्वाद पाकर दिल को सुकून मिला।
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ऐशबाग के मोहल्ला बक्कास की कहकशा बानो और सीतापुर रोड की मुस्कान बानो की कहानी भी संघर्ष की ही गवाही देती है। कहकशा का निकाह मोहम्मद तौहीद से और मुस्कान का विवाह मोहम्मद तालिब से हुआ। दोनों परिवारों की रोजी-रोटी मजदूरी से चलती है। एक साल पहले रिश्ता तय हो गया था लेकिन हर गुजरते दिन के साथ निकाह दूर होता जा रहा था। मुस्कान ने कहा कि हर बार तारीख बढ़ती थी तो दिल डर से भर जाता था। अब डर नहीं, बस शुक्रिया है। कहकशा बोली, ये सिर्फ निकाह नहीं था, ये हमारी जिंदगी को सम्मान के साथ शुरू करने का मौका था।
भरोसे का प्रतीक है उपहार में मिला सामान
सामूहिक विवाह समारोह में मिले उपहार सिर्फ सामान नहीं थे, वे उस भरोसे का प्रतीक थे कि कोई है, जो मजबूरी में फंसे सपनों को थाम लेता है। यह समारोह साबित कर गया कि सरकार जब अभिभावक बन जाए,
तो बेटियां खुद को अकेला नहीं समझतीं और तब शहनाइयां सिर्फ मंडप में नहीं, टूटती उम्मीदों के भीतर भी गूंज उठती हैं।
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लखनऊ। कुछ घरों में बेटियों की शादी तारीखों से नहीं, हालातों से तय होती है। कभी पिता का साया उठ जाता है, कभी रोटी की जद्दोजहद बड़ी हो जाती है। ऐसे में सपनों की डोली अक्सर चौखट पर ही रुक जाती है लेकिन सोमवार को हुए मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह समारोह में उन सपनों ने भी चलना सीख लिया, जिन्हें अभाव ने वर्षों से जकड़ रखा था। यह सिर्फ जोड़ियों के बनने का दिन नहीं था। यह उन मांओं की आंखों से बहते डर के थमने का दिन था, उन बेटियों की खामोश उम्मीदों के बोलने का दिन था और उन पिताओं की कमी को भरने का दिन था, जो अब सिर्फ यादों में रह गए हैं।
लखीमपुर के धौरहरा निवासी अरविंद कुमार जब गोसाईंगंज की उर्मिला कुमारी के साथ सात फेरे ले रहे थे तो उर्मिला की मुस्कान में राहत साफ झलक रही थी। पिता के निधन के बाद परिवार पर जिम्मेदारियों का बोझ इस कदर बढ़ा कि शादी का सपना बोझ लगने लगा था। उर्मिला धीमी आवाज में कहती हैं कि पिता होते तो शायद इतना मुश्किल नहीं होता... लेकिन इस योजना ने उनका खालीपन कुछ कम कर दिया।
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काकोरी ब्लॉक के ग्राम सैफलपुर की राधा कुमारी की आंखें भी नम थीं। पिता की मौत और दिव्यांग भाई की जिम्मेदारी ने उसे समय से पहले ही बड़ा बना दिया था। अच्छे माहौल में विवाह की उम्मीद टूट चुकी थी। उन्नाव के हसनगंज मुन्नीखेड़ा निवासी बलराम के साथ विवाह के बाद राधा ने कहा कि आज मुझे ऐसा लगा, जैसे मेरे पिता कहीं यहीं मौजूद हों। मंत्रियों, विधायकों और अधिकारियों का आशीर्वाद पाकर दिल को सुकून मिला।
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ऐशबाग के मोहल्ला बक्कास की कहकशा बानो और सीतापुर रोड की मुस्कान बानो की कहानी भी संघर्ष की ही गवाही देती है। कहकशा का निकाह मोहम्मद तौहीद से और मुस्कान का विवाह मोहम्मद तालिब से हुआ। दोनों परिवारों की रोजी-रोटी मजदूरी से चलती है। एक साल पहले रिश्ता तय हो गया था लेकिन हर गुजरते दिन के साथ निकाह दूर होता जा रहा था। मुस्कान ने कहा कि हर बार तारीख बढ़ती थी तो दिल डर से भर जाता था। अब डर नहीं, बस शुक्रिया है। कहकशा बोली, ये सिर्फ निकाह नहीं था, ये हमारी जिंदगी को सम्मान के साथ शुरू करने का मौका था।
भरोसे का प्रतीक है उपहार में मिला सामान
सामूहिक विवाह समारोह में मिले उपहार सिर्फ सामान नहीं थे, वे उस भरोसे का प्रतीक थे कि कोई है, जो मजबूरी में फंसे सपनों को थाम लेता है। यह समारोह साबित कर गया कि सरकार जब अभिभावक बन जाए,
तो बेटियां खुद को अकेला नहीं समझतीं और तब शहनाइयां सिर्फ मंडप में नहीं, टूटती उम्मीदों के भीतर भी गूंज उठती हैं।