गजब! ये महिला 14 साल से खा रही थी बाल
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बलरामपुर के लालपुर विशुनपुर निवासी एक महिला कंघी के बाद टूटे बालों को खा लेती थी। 14 साल पुरानी इस आदत से वह साल भर से पेट दर्द की बीमारी से ग्रसित हो गई।
बलरामपुर और गोंडा में कई डॉक्टरों से इलाज कराया, लेकिन लाभ नहीं हुआ। बहराइच में अल्ट्रासाउंड होने पर उसके पेट में ट्राइको वेजार ट्यूमर का पता चला तो चिकित्सक सकते में आ गए।
सोमवार देर शाम बुद्धा हास्पिटल में महिला के पेट का आपरेशन हुआ तो बाल के दो बड़े-बड़े गुच्छे निकले। बलरामपुर जिले के थाना ललिया अंतर्गत ग्राम लालपुर विशुनपुर गांव निवासी छोटका (25) पत्नी ओंकार प्रसाद को साल भर से पेट दर्द, मिचली और चक्कर आने की शिकायत थी।
बलरामपुर जिला अस्पताल में इलाज के बाद भी उसे लाभ नहीं हुआ। निजी चिकित्सकों का भी इलाज चला, लेकिन स्थिति और बिगड़ती गई। यहां तक कि महिला का वजन घटकर महज 43 किलो रह गया।
पूरी तरह ब्लॉक मिली आंत
इस पर परिवारीजन दो माह पहले छोटका को गोंडा में निजी चिकित्सकों के यहां ले गए। लेकिन वहां भी चिकित्सक सिर्फ पेट दर्द और कमजोरी का इलाज करते रहे। निराश होकर ओंकार पत्नी छोटका को रविवार को लेकर बहराइच पहुंचा।
यहां उसने बुद्धा अस्पताल में डॉक्टर राकेश चौधरी को दिखाया तो उन्होंने अल्ट्रासाउंड करवाया। डॉक्टर रमेश वर्मा ने अल्ट्रासाउंड में महिला के पेट में ट्राइकोबेजार (बाल के गुच्छे) होने की पुष्टि की।
इस पर डॉक्टर चौधरी ने महिला के पेट का आपरेशन करने का निर्णय लिया। सोमवार देर शाम विशेषज्ञ शल्य चिकित्सकों ने महिला के पेट का आपरेशन किया तो उसकी आंत पूरी तरह ब्लाक मिली।
आंत को काटा गया तो उसमें से बाल के दो बड़े-बड़े गुच्छे निकले। एक गुच्छे का वजन 1 किलो 275 ग्राम। जबकि दूसरे गुच्छे का वजन 1 किलो 340 ग्राम था। आपरेशन लगभग दो घंटे चला। डॉ. चौधरी ने बताया कि आपरेशन के बाद महिला पूरी तरह स्वस्थ है।
मानसिक बीमारी है ट्राइकोबेजार
जिले के मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. एसके वर्मा से जब ट्राइकोबेजार के मामले में बात की गई तो उन्होंने कहा कि यह बीमारी मानसिक होती है।
जिसमें किशोरावस्था से महिलाएं और पुरुष बीमारी की चपेट में आकर अपने बालों को ही खाने लगते हैं। यही बाल धीरे-धीरे आंत में जमा होकर ब्लाकेज की स्थिति बनाते हैं। जिससे पेट दर्द, उल्टी, खून की कमी की स्थिति बनती है।
पागलपन व कम आईक्यू वाले लोग करते हैं हरकत
डॉ. एसके वर्मा ने बताया कि बाल खाना सामान्य प्रक्रिया नहीं है। पागलनपन व कम आईक्यू वाले लगभग 10 हजार मरीजों में से एक मानसिक रोगी ऐसी हरकत करता है। जिससे उसकी जिंदगी सही परीक्षण के अभाव में कभी-कभी खतरे में पड़ जाती है।