यूपी का रण : पश्चिम में करो या मरो की स्थिति, मुद्दों की धार मंद, वार आमने-सामने
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
विस्तार
पहले चरण में यूपी के 11 जिलों की 58 सीटों पर 10 फरवरी को मतदान होना है। पिछले चुनाव में इन सीटों पर भाजपा की आंधी चली थी। इस बार जबरदस्त टक्कर है। सपा-रालोद गठबंधन हुंकार भर रहा है, तो भाजपा ने भी साख को बरकरार रखने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा गृहमंत्री अमित शाह बार-बार यहां आकर मतदाताओं को साध रहे हैं। हर तरह का प्रयोग किया जा रहा है। सभी दल ध्रुवीकरण से लेकर अन्य सभी दांवपेचों का इस्तेमाल कर रहे हैं। बसपा भी सोशल इंजीनियरिंग में जुटी हुई है। इस जद्दोजहद में सुरक्षा और कृषि कानून के मुद्दे तो जोर-शोर से उठ रहे हैं, पर अन्य अहम मुद्दे कहीं पीछे छूट रहे हैं। अब तो हर दांवपेच आजमाए जा रहे हैं। भाजपा जहां सुरक्षा के मुद्दे को बड़ा बनाए हुए है, तो सपा-रालोद गठबंधन किसानों के मुद्दों को उठाने की भरपूर कोशिश कर रहा है।
मुद्दों पर बंटे हुए हैं मतदाता
दोपहर का समय है। मेरठ की दक्षिण विधानसभा सीट के गांव परतापुर में हम पहुंचे तो चुनावी चौपाल जमी हुई थी। यहां मिले संजय कुमार सवाल उछालते हैं, क्या किसी आंदोलन को प्यार से खत्म नहीं कराया जाना चाहिए था? साथ में बैठे अजय ने जवाब दिया, अंादोलन तो खत्म हो गया। मांग भी मान ली। अब लकीर पीटने से क्या फायदा? अजय ने विषयांतर करते हुए सवाल उठाया, सरेआम छेड़छाड़ के मामलों को भूल गए क्या? अब चैन से रहना रास नहीं आ रहा? तो टिंकू ने कहा, ऐसा कुछ नहीं है। सरकार बिना वजह इसे हवा दे रही है। शेखर शर्मा बोल उठे, विकास को भी थोड़ा याद कर लो। वैसे तो सरकार ने प्रदेश भर में गुंडों को सबक सिखाया और चुनाव में यही मुद्दा सबसे बड़ा है।
टिकट पर भी मुखर हैं लोग
शाम का समय है। खतौली विधानसभा क्षेत्र के गांव मंसूरपुर में हम पहुंचे तो लोग चुनावी चर्चा में मशगूल मिले। इन्हीं में से लव चौधरी कहते हैं, किसानों के मुद्दे बड़े हैं। पर, वे गठबंधन के कई सीटों पर गैर जाटों को टिकट दिए जाने पर नाराजगी जताते हैं। लव कहते हैं, सिवालखास में जाट उम्मीदवार को ही रालोद से टिकट मिलना चाहिए था। हालांकि, वह यह भी जोड़ते हैं कि गठबंधन मजबूती से लड़ रहा है। वहीं, अनिल कहते हैं कि लड़ाई बराबरी की है। भाजपा भी यहां कमजोर नहीं है। सबके अपने-अपने समीकरण हैं।
कैराना में सबने झाेंकी ताकत
पिछले चुनाव में प्रदेश भर में भाजपा की आंधी चली थी, पर कैराना का चक्रव्यूह भाजपा नहीं भेद पाई थी। सपा के नाहिद हसन से भाजपा की मृगांका सिंह को हार का सामना करना पड़ा था। इस बार भाजपा ने कैराना में पूरी ताकत लगा दी है। पिछले दोनों उम्मीदवार आमने-सामने हैं। बसपा के राजेंद्र उपाध्याय और कांग्रेस के मो. अखलाक भी पूरी ताकत लगाए हुए हैं। माना जा रहा है कि भाजपा और सपा के बीच सीधा मुकाबला है। पर, बसपा और कांग्रेस के उम्मीदावारों की मजबूती सीधे मुकाबले वाले दिग्गजों की हार-जीत का आधार तय कर रही है।
सरधना में कांटे की टक्कर
मेरठ की सरधना सीट इस बार हॉट बनी हुई है। यहां भाजपा के मौजूदा विधायक संगीत सोम और सपा के अतुल प्रधान के बीच सीधी टक्कर है। बसपा ने संजीव धामा और कांग्रेस ने रिहानुद्दीन को मैदान में उतारा है। 2017 में बसपा ने हाजी याकूब कुरैशी के पुत्र इमरान कुरैशी को चुनाव लड़ाया था। इस बार वे चुनावी मैदान में नहीं हैं। इसका फायदा अतुल प्रधान को मिलता दिख रहा है। वहीं, संजीव धामा के मैदान में उतरने के फायदे और नुकसान दोनों तरफ दिख रहे हैं।
थानाभवन में कड़ा मुकाबला
थानाभवन विधानसभा सीट पर भी इस बार मुकाबला है। भाजपा से गन्ना मंत्री सुरेश राणा फिर से चुनावी मैदान में हैं। रालोद ने उनके सामने अशरफ अली को रण में उतारा है। बसपा ने यहां दलित-मुस्लिम कार्ड खेला है और जहीर मलिक को टिकट दिया है। सैनी भाजपा के परंपरागत वोट माने जाते रहे हैं, पर उन्हें साधने के लिए कांग्रेस ने सत्यम सैनी को चुनावी मैदान में उतार दिया है। अशरफ अली को मुस्लिम वोटों में जहीर मलिक से कड़ी चुनौती मिल रही है। ऐसे में मुकाबला कड़ा हो गया है।
सिवालखास पर सबकी नजर
मेरठ की सिवालखास सीट इस चुनाव में एकाएक चर्चा में आ गई। हुआ यूं कि जैसे ही रालोद-सपा गठबंधन से रालोद के चुनाव चिह्न पर सपा के पूर्व विधायक गुलाम मोहम्मद का टिकट पक्का हुआ, इसका विरोध शुरू हो गया। यहां रालोद के पुराने कार्यकर्ता डॉ. राजकुमार सागवान को टिकट देने की मांग चल रही थी, पर ऐसा नहीं होने से जाटों की नाराजगी सामने आई। भाजपा ने यहां से जिला पंचायत अध्यक्ष रहे मनिंदरपाल को रण में उतारा है, जो अन्य जातियों के साथ-साथ खास तौर पर जाटों को साधने की पूरी कवायद कर रहे हैं। इस सीट की धमक दूर तक है। इस पर सबकी निगाहें हैं।
बड़ा बदलाव : इस बार किसी खास बंधन में नहीं हैं दलित
अहम बात यह है कि इस बार पश्चिम में दलित किसी दल विशेष के साथ बंधे नजर नहीं आ रहे हैं। माना जाता है कि दलितों पर बसपा की मजबूत पकड़ है। इस बार भी सबसे ज्यादा दलित वोट बसपा को ही जाते नजर आ रहे हैं, लेकिन उन दलितों की भी अच्छी खासी तादाद है जो अन्य दलाें की ओर जा रहे हैं। गांव पोहल्ली में मिले दलितों से जब हमने इसको लेकर सवाल किए तो लोगों ने कहा, किसी एक दल विशेष का क्या करें। जो हमारे दुख-सुख में खड़ा रहे, हम उन्हें ही वोट देंगे। इसका लाभ कहीं भाजपा को मिल रहा है तो कहीं रालोद-सपा गठबंधन को।
ये मुद्दे तो हैं, पर इनकी चर्चा मंद पड़ गई
कुछ मुद्दे ऐसे भी हैं जिनकी चुनाव के शुरुआत में खूब चर्चा हुई। पर, अब इन मुद्दों की तपिश वैसी नहीं दिख रही।अब तो चुनाव सुरक्षा के मुद्दे आैर ध्रुवीकरण की तरफ जाता नजर आ रहा है।
महंगाई : शुरू में महंगाई का मुद्दा चरम पर रहा था। विपक्षियों ने इसपर सरकार को खूब घेरा। खासकर डीजल-पेट्रोल के दामों को लेकर। कहा जाता रहा कि महंगाई किसानों की मुश्किलें बढ़ा रही है। कीटनाशक, उर्वरक के दामों से फसलों की लागत बढ़ने का भी मुद्दा काफी समय तक गर्म रहा। पर, चुनावी गर्मी बढ़ते ही चर्चाओं में महंगाई का मुद्दा मंदी का मारा हो गया है।
रोजगार : विपक्षी दलों केएजेंडे में रोजगार बड़ा मुद्दा था। सरकार पर लगातार आरोप लगे कि युवाओं को नौकरियां नहीं मिलीं। स्थानीय स्तर पर कोई नई फैक्टरी नहीं लगाई गई। जो कुछ रोजगार था वह कोरोना काल में चला गया, पर सरकार ने मदद नहीं की। पर, चुनावी शोर में इसको लेकर भी कम आवाजें सुनाई दे रही हैं।
छुट्टा पशु : कई सालों से छुट्टा पशुओं का मुद्दा गूंजता रहा। हालांकि, सरकार ने गौशालाएं बनाकर भरपाई करने की कोशिश की। कहा कि प्रति गोवंश प्रति माह 930 रुपये सरकार देगी और कोई भी गोवंश का भरण-पोषण कर सकता है, पर लोगों ने इसे नाकाफी बताया। आलम यह रहा कि छुट्टा पशुओं का मुद्दा बढ़ता ही गया। ध्रुवीकरण के दौर में यह मुद्दा भी अब उतना नहीं सुनाई दे रहा।
स्वास्थ्य सेवाएं : जिला अस्पतालों की बदतर स्थितियां खूब मुद्दा बनीं। कोरोना काल में हालात बिगड़ तो सरकार पर ठीकरा फोड़ा गया। स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का खूब शोर रहा, पर जब चुनाव सिर पर आए तो इस मुद्दे का शोर अब कुछ कम सुनाई दे रहा है।
गन्ना बकाया भुगतान एवं मूल्य : चुनावी शोर में गन्ना बकाया एवं मूल्य का मुद्दा कहीं दबता नजर आ रहा है। पहले गन्ने का मुद्दा खूब जोर-शोर से उठ रहा था। किसानों का पिछले सत्र का बकाया अब तक शत-प्रतिशत चुकाया नहीं गया है। किसान गन्ने का मूल्य कम बता रहे हैं। सरकार ने 25 रुपये की वृद्धि की पर किसानों ने इसे नाकाफी ही बताया।