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Lucknow News: चोटी नहीं मिली, साथियों संग जिंदगी जीतकर लौटीं पूर्वा
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पूर्वा धवन
सौरभ मिश्रलखनऊ। पहाड़ की चोटी फतह करने निकलीं राजधानी की पूर्वा धवन के लिए जिंदगी बचाकर लौटना ही सबसे बड़ी जीत बन गया। 6,512 मीटर ऊंचे भागीरथी-2 पर चढ़ाई के दौरान बर्फीले तूफान में पूर्वा समेत आठ पर्वतारोही कई दिन तक फंसे रहे। टेंट ढह गए, राशन खत्म हो गया और ठंड से हालत बिगड़ने लगी। साथियों ने पूर्वा का साथ नहीं छोड़ा। अब वह धीरे-धीरे स्वस्थ हो रही हैं।
पूर्वा 11 सितंबर को 5,900 मीटर ऊंचे रुद्रगिरि पहुंची थीं। इसके बाद 17 सितंबर को भागीरथी-2 अभियान शुरू हुआ। 26 सितंबर की रात टीम शिखर की ओर बढ़ी लेकिन 6,100 मीटर की ऊंचाई पर मौसम बिगड़ने से मुख्य गाइड सौरव रावत ने समझदारी दिखाते हुए वापस लौटने
का फैसला किया।
बेहोश हुईं, फिर हिम्मत जुटाकर चलीं
लगातार बर्फबारी के बीच कैंप-1 पहुंचने पर रसोई का टेंट टूट चुका था। अगले दिन उतरते समय सीने में दर्द बढ़ने से पूर्वा बेहोश हो गईं। साथियों ने उन्हें स्लीपिंग बैग में गर्म रखा। होश आने पर उन्होंने दोबारा चलना शुरू किया। भारी बर्फ के कारण दो-तीन घंटे का रास्ता तय करने में करीब 10 घंटे लगे। टीम ने एडवांस बेस कैंप में रात गुजारी और अगले दिन बर्फ पिघलाकर पानी पिया। नंदनवन में बेस कैंप बर्फ में दबा मिला। एक टेंट निकालकर आठों ने उसमें शरण ली। दो दिन इंतजार के बाद 30 सितंबर को टीम ने खुद नीचे उतरने का फैसला किया। गोमुख ग्लेशियर पार करने के बाद एनडीआरएफ और आईटीबीपी ने उन्हें बचाया। इस अभियान में शिखर तक पहुंचना संभव नहीं हुआ लेकिन टीम ने मुश्किल हालात में एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ा।
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बिगड़ गई थी पूर्वा की हालत, साथियों ने संभाला
इंदिरानगर सेक्टर-19 निवासी पूर्वा के हाथ-पैरों की उंगलियों में चिलब्लेन्स हो गए थे और फेफड़ों में एडिमा (सूजन) की शुरुआत हो गई थी। पैरों में इतना दर्द था कि उन्हें नीचे रखना मुश्किल था। टीम में पूर्वा इकलौती महिला पर्वतारोही थीं। टीम में पुणे के सुमाल्या, मुंबई के संकेत, गाइड सौरव रावत, आशुतोष, बुलवान और सहायक कर्मचारी हीरा और डीके थे। अभियान में शिखर तक पहुंचना संभव नहीं हुआ लेकिन सभी ने एक-दूसरे का साथ निभाया।
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पूर्वा 11 सितंबर को 5,900 मीटर ऊंचे रुद्रगिरि पहुंची थीं। इसके बाद 17 सितंबर को भागीरथी-2 अभियान शुरू हुआ। 26 सितंबर की रात टीम शिखर की ओर बढ़ी लेकिन 6,100 मीटर की ऊंचाई पर मौसम बिगड़ने से मुख्य गाइड सौरव रावत ने समझदारी दिखाते हुए वापस लौटने
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का फैसला किया।
बेहोश हुईं, फिर हिम्मत जुटाकर चलीं
लगातार बर्फबारी के बीच कैंप-1 पहुंचने पर रसोई का टेंट टूट चुका था। अगले दिन उतरते समय सीने में दर्द बढ़ने से पूर्वा बेहोश हो गईं। साथियों ने उन्हें स्लीपिंग बैग में गर्म रखा। होश आने पर उन्होंने दोबारा चलना शुरू किया। भारी बर्फ के कारण दो-तीन घंटे का रास्ता तय करने में करीब 10 घंटे लगे। टीम ने एडवांस बेस कैंप में रात गुजारी और अगले दिन बर्फ पिघलाकर पानी पिया। नंदनवन में बेस कैंप बर्फ में दबा मिला। एक टेंट निकालकर आठों ने उसमें शरण ली। दो दिन इंतजार के बाद 30 सितंबर को टीम ने खुद नीचे उतरने का फैसला किया। गोमुख ग्लेशियर पार करने के बाद एनडीआरएफ और आईटीबीपी ने उन्हें बचाया। इस अभियान में शिखर तक पहुंचना संभव नहीं हुआ लेकिन टीम ने मुश्किल हालात में एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ा।
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बिगड़ गई थी पूर्वा की हालत, साथियों ने संभाला
इंदिरानगर सेक्टर-19 निवासी पूर्वा के हाथ-पैरों की उंगलियों में चिलब्लेन्स हो गए थे और फेफड़ों में एडिमा (सूजन) की शुरुआत हो गई थी। पैरों में इतना दर्द था कि उन्हें नीचे रखना मुश्किल था। टीम में पूर्वा इकलौती महिला पर्वतारोही थीं। टीम में पुणे के सुमाल्या, मुंबई के संकेत, गाइड सौरव रावत, आशुतोष, बुलवान और सहायक कर्मचारी हीरा और डीके थे। अभियान में शिखर तक पहुंचना संभव नहीं हुआ लेकिन सभी ने एक-दूसरे का साथ निभाया।

पूर्वा धवन

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