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यूपी : पूर्व मुख्य सचिव दीपक सिंघल ने कहा- आत्मनिर्भर भारत के लिए जरूरी है गांवों की आर्थिक मजबूती 

Sun, 24 Apr 2022 06:33 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sun, 24 Apr 2022 06:33 AM IST
सार

आजादी के 75 साल बाद भी देश की बहुसंख्यक आबादी (80 करोड़) का जीवन बचाने के लिए अगर सरकार को मुफ्त अनाज वितरण का सहारा लेना पड़े तो हमें आत्मचिंतन की जरूरत है। हमें यह भी सोचने की जरूरत है कि ब्रिटिश शासन की शुरुआत में दुनिया की जीडीपी में भारत का हिस्सा 45 फीसदी था। अब यह हिस्सेदारी एक अंक तक सिमट कर रह गई है।
 

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Deepak Singhal, former chief secretary in the Uttar Pradesh government, believes that economic strength of villages is necessary for self-reliant India
demo pic... - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते साल आत्मनिर्भर भारत बनाने के संकल्प के साथ आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष की शुरुआत की। इसके बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बीते महीने अहमदाबाद में हुई तीन दिवसीय अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में आत्मनिर्भर भारत बनाने का खाका पेश किया। संघ का मानना है कि आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए हमें भारत केंद्रित आर्थिक मॉडल तैयार करना होगा। इस मॉडल में ग्रामीण भारत और महिलाओं, मतलब देश की आधी आबादी की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।

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सवाल है कि वह कौन सा आर्थिक मॉडल है जिसमें आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना छिपी हुई है? ऐसी संकल्पना जिसका सपना महात्मा गांधी ने देखा था? आखिर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र आत्मनिर्भर होगा कैसे? इसके लिए क्या बदलाव लाने होंगे? मेरी समझ में आत्मनिर्भर भारत में सबसे बड़ी बाधा ठोस मॉडल नहीं होना है। आत्मनिर्भर भारत का रास्ता गांव से हो कर जाता है। 
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वही, ग्रामीण भारत जिसमें बहुमत आबादी रहती है। ऐसी बहुमत आबादी जो नए विचार, नई दृष्टि और नई योजना के अभाव में पिस रही है। ग्रामीण भारत में बुनियादी जरूरत मसलन शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार सहित कई अन्य समस्या आजादी के 75 वर्ष बाद भी जस की तस खड़ी है। आजादी के 75 साल बाद भी देश की बहुसंख्यक आबादी (80 करोड़) का जीवन बचाने के लिए सरकार को मुफ्त अनाज वितरण का सहारा लेना पड़े तो आत्मचिंतन की जरूरत है। यह भी सोचना पड़ेगा कि ब्रिटिश शासन में दुनिया की जीडीपी में भारत की 45% हिस्सेदारी अब एक अंक तक कैसे सिमट गई। प्रति व्यक्ति जीडीपी के आधार पर भारत की रैंक 150वीं है। देश की दस फीसदी आबादी 57 फीसदी राष्ट्रीय आय की मालिक है।
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 समस्या यह है कि देश की 80 फीसदी आबादी को राजनीतिक आजादी तो हासिल हो गई, मगर यह अब भी आर्थिक आजादी के लिए संघर्ष कर रही है। ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए भारतीय आर्थिक मॉडल का सार्थक रोडमैप तैयार करना होगा। इसका सबसे बेहतर तरीका ग्रामीण आर्थिक परिक्षेत्र मतलब रूरल इकनॉमिक जोन विकसित किया जाना है।

सवाल यह है कि ग्रामीण आर्थिक परिक्षेत्र का मॉडल क्या होगा? यह काम कैसे करेगा? देश के ग्रामीण क्षेत्रोंं मेंं 6600 विकास खंड (ब्लॉक) हैं। जरूरत 2 से 3 विकास खंडों को एक क्लस्टर बना कर विकसित किए जाने की है। इससे स्थानीय स्तर पर विकेंद्रीकृत ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। प्रत्येक क्लस्टर स्तर पर जीआईएस मैपिंग का प्रयोग करते हुए हर गांव में आधार कार्ड धारक के द्वारा किए जा रहे व्यवसाय, भूमि की उपलब्धता, कृषि एवं इसके सहायक साधन मसलन पशुपालन, मुर्गीपालन, मछलीपालन, हैंडलूम, हैंडीक्राफ्ट, सूक्ष्म-लघु उद्योग आदि से जुड़े प्रारंभिक आंकड़े एकत्रित करने होंगे। बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार व्यवस्था, इंटरनेट, बैंकिंग सुविधा की जमीनी स्थिति का आकलन करना होगा। 

इसके बाद चिह्नित क्लस्टर के लिए 200 से 300 एकड़ भूमि चिह्नित कर यहां शहरी क्षेत्र जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी। प्लग एंड प्ले मिनी टाउनशिप विकसित करनी होगी। इसी क्षेत्र में कोल्ड स्टोरेज, भंडारण क्षमता, लॉजिस्टिक सुविधा से संबंधित इन्फ्रास्ट्रक्चर के साथ सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योग विकसित करने होंगे। बैकवर्ड-फाॅरवर्ड लिंकेज की सुविधा से राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बाजार से ग्रामीण बाजार को जोड़ने की जरूरत है। कृषि क्षेत्र को नई और आधुनिक तकनीक के साथ ऐसी फसल को उपजाने के लिए प्रेरित करना होगा, जिसकी मांग बाजार में सबसे ज्यादा है। सब्जी, दूध, फल बर्बाद होने से बचाना होगा।

इन सारे पहलुओं को ईमानदारी से लागू करने के लिए एक समक्ष प्रशासनिक ढांचा बनाना होगा। जाहिर तौर पर आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की राह में सबसे बड़ी बाधा ठोस और तर्कसंगत मॉडल का अभाव है। राजनीतिक दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी भी बड़ी बाधा है। सुखद तथ्य यह है कि इस समय देश का नेतृत्व ऐसे व्यक्ति के हाथ में है, जिनकी दृढ़ इच्छाशक्ति का लोहा दुनिया मान रही है। जरूरत इस दृढ़ इच्छाशक्ति का उपयोग एक ठोस मॉडल को जमीन पर उतारने के लिए उपयोग करना है। आत्मनिर्भर भारत का सपना ग्रामीण भारत को मजबूत किए बिना संभव ही नहीं है।

औद्योगिक नीति-2017 : वृहद और मेगा श्रेणी के 60 निवेश प्रस्ताव मंजूर
प्रदेश में औद्योगिक निवेश एवं रोजगार प्रोत्साहन नीति-2017 के तहत अब तक वृहद और मेगा श्रेणी में निवेश के 60 प्रस्तावों को सहमति पत्र (लेटर ऑफ कंफर्ट) जारी हो चुका है। इससे दोनों श्रेणियों में कुल 15,969 करोड़ रुपये के निवेश की कार्ययोजना है। इस नीति के तहत आए कुल 125 आवेदनों में 28 प्रस्ताव रद्द हो चुके हैं, जबकि 7 प्रस्ताव रद्द होने की प्रक्रिया में हैं। दरअसल, राज्य सरकार शीघ्र ही औद्योगिक निवेश के लिए नई नीति लाने जा रही है। 


इससे पहले 13 जुलाई 2017 को औद्योगिक निवेश एवं रोजगार प्रोत्साहन नीति लागू की गई थी। इस नीति के तहत लघु एवं मध्यम, वृहद और मेगा श्रेणी के उद्योगों के लिए सुविधा देने की व्यवस्था की गई। इस नीति के तहत वृहद श्रेणी में बुंदेलखंड व पूर्वांचल क्षेत्र में 100 करोड़ रुपये तक पूंजीगत निवेश वाले औद्योगिक उपक्रम रखे गए। वहीं, मध्यांचल व पश्चिमांचल में यह सीमा 150 करोड़ रुपये और गौतमबुद्धनगर व गाजियाबाद में 200 करोड़ रुपये तक की रखी गई है। 

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