यूपी चुनाव: दागियों के सहारे सत्ता का ख्वाब देख रही सपा
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यूं तो यूपी की सियासत अपराधीकरण के लिए ही जानी जाती है, लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में आपराधिक छवि के कारण डीपी यादव को सपा में शामिल न करने के अखिलेश यादव के फैसले से प्रदेश में बदलाव और बेहतरी की तरफ जाने की उम्मीद जगी थी।
मगर 2014 के लोकसभा चुनाव में ही यह उम्मीद टूटने लगी जब सपा ने बाहुबली अतीक अहमद समेत कई दागी नेताओं को मैदान में उतार दिया था। 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए भी सत्तारूढ़ दल जिस तरह दागियों पर दांव लगाने जा रहा है, उससे राजनीति में शुचिता की संभावना धूमिल नजर आ रही है।
जाहिर है सत्तारूढ़ दल से मुकाबले के लिए दूसरे दल भी आपराधिक छवि के नेताओं को चुनावी जंग में उतारने से गुरेज नहीं करेंगे।
सियासी दलों की ओर से दागियों के प्रति व्यामोह छोड़ देने की पहल के बावजूद पिछले विधानसभा चुनाव में भी प्रदेश के 403 विधायकों में से 189 दागी चुने गए थे। इनमें 98 के खिलाफ तो गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे। एडीआर के आंकड़े साफ तौर पर इस बात की गवाही देते हैं।
सूबे के 54 फीसदी मंत्री ऐसे जिन पर आपराधिक केस
नेशनल इलेक्शन वाच ने अखिलेश यादव सरकार बनने के बाद मंत्रियों के आपराधिक मामलों का विश्लेषण किया था। इनमें 54 फीसदी मंत्रियों ने अपने ऊपर आपराधिक मामले दर्ज होने का उल्लेख किया था। जिन 26 मंत्रियों ने आपराधिक मामले की जानकारी दी है, उनमें नौ के खिलाफ गंभीर केस दर्ज थे।
महबूब अली ने अपने शपथ पत्र में हत्या, अपहरण और डकैती समेत 15 मामले, रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया ने अपहरण, हत्या के प्रयास और डकैती समेत आठ मामले बताए थे। अन्य दागी मंत्रियों में विनोद कुमार उर्फ पंडित सिंह, अरविंद सिंह गोप रामकरन आर्य, जगदीश सोनकर आदि शामिल हैं।
पिछले कुछ समय से सत्ताधारी दल में दागियों को लेकर अंर्तद्वंद्व साफ नजर आया। पार्टी का एक धरा दागियों के साथ खड़ा दिख रहा था, तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की ओर से इसका मुखर विरोध हुआ।
इसके चलते मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के सपा में विलय की सार्वजनिक घोषणा के बाद इसे रद्द कर दिया गया। मुख्यमंत्री की सार्वजनिक मुखालफत के बाद विलय तो रद्द हो गया, लेकिन जल्द ही पार्टी के भीतर नए तरह का संघर्ष शुरू हो गया।
सत्य की नहीं सियासी असत्य की जीत हुई
आश्चर्यजनक रूप से सत्य की जीत के विपरीत सियासी असत्य फिलहाल जीता हुआ दिख रहा है। एक बार फिर सपा ने अपने फैसले पलटते हुए न केवल कौमी एकता दल के विलय को मंजूरी दे दी, बल्कि डीपी यादव को ठुकराकर अपराधियों के राजनीतिकरण के विरोध में खड़े इस दल ने भ्रष्टाचार में लिप्त और हत्यारोपी तक को उम्मीदवार घोषित कर दिया।
समाजवादी पार्टी ने पत्नी की हत्या के आरोपी अमनमणि त्रिपाठी, एनआरएचएम घोटाले के आरोपी विधायक मुकेश श्रीवास्तव को हाल ही में शामिल कर टिकट देने की घोषणा भी कर दी है।
इससे लगता है कि छवि के बजाए अब चुनाव जीतने का फॉर्मूला ही दलों के लिए अहम हो गया है। सपा की पारिवारिक लड़ाई में दागियों की एंट्री और तेज हो गई है।
सपा की हकीकत
2012 के विधानसभा चुनाव में भले ही बाहुबली डीपी यादव का टिकट ठुकराकर सपा ने एक अलग तरह का माहौल बनाया पर हकीकत ये है कि इसी चुनाव में आपराधिक चरित्र के कई उम्मीदवार साइकल पर सवार होकर विधानसभा पहुंचे।
आपराधिक मामलों में टॉप विधायक
सुशील सिंह : चंदौली जिले की सकलडीहा सीट से निर्दलीय विधायक सुशील सिंह ने अपने शपथ पत्र में 20 आपराधिक मामलों का उल्लेख किया है। इनंमें 12 केस हत्या से संबंधित हैं।
मुख्तार अंसारी : मऊ से कौमी एकता दल के विधायक मुख्तार अंसारी ने 15 आपराधिक मामलों का उल्लेख किया है। इनमें 8 मामले हत्या से संबंधित हैं।
रामवीर सिंह : फीरोजाबाद जिले की जसराना सीट से सपा विधायक रामवीर सिंह ने शपथ पत्र में हत्या के 8 मामलों समेत 18 आपराधिक मामले विचाराधीन होने का जिक्र किया है।
अलीम खान : बुलंदशहर से बसपा विधायक मो. अलीम खां ने विधानसभा चुनाव 2012 के शपथ पत्र में हत्या और बलात्कार के एक-एक मामले समेत तीन केस का उल्लेख किया था।
अजय राय : पिंडरा (वाराणसी) से कांग्रेस विधायक अजय राय हत्या के तीन मामलों समेत कुल 8 केस का उल्लेख किया था। विधायक बनने के बाद वह एनएसए में निरुद्ध रह चुके हैं।
उपेन्द्र तिवारी : फेफना से भाजपा विधायक उपेन्द्र ने अपने खिलाफ 11 आपराधिक मामले दर्ज होने का उल्लेख किया था। इनमें पांच मामले हत्या के थे।
टिकट देने में कोई दल पीछे नहीं
अपराधियों को संरक्षण देने में कोई दल पीछे नहीं है। एडीआर-नेशनल इलेक्शन वाच ने 2014 के लोकसभा चुनाव में सभी दलों के प्रत्याशियों की आपराधिक पृष्ठूभूमि का विश्लेषण किया। कुल 1259 प्रत्याशियों के विश्लेषण में 235 ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की जानकारी दी थी। यानी 19 फीसदी प्रत्याशी आपराधिक पृष्ठूभूमि के थे।
यह 2009 के लोकसभा चुनाव की तुलना में 3 फीसदी अधिक है। 2014 में 185 प्रत्याशियों (15 प्रतिशत) के खिलाफ गंभीर मामले दर्ज हुए थे। कोई भी राजनीतिक दल अपराधियों को टिकट देने में पीछे नहीं है?
लोकसभा चुनाव 2014 में आपराधिक छवि वाले उम्मीदवार
सपा--35
बसपा--35
भाजपा--28
कांग्रेस--27
आम आदमी पार्टी--16
जिन पर हत्या का आरोप
बसपा--8
भाजपा--3
सपा--3
कौमी एकता दल--2
निर्दलीय--1
नहीं टूट रहा राजनीति, अपराधियों व धनबल का गठजोड़
हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की तल्ख टिप्पणियों और फैसलों के बावजूद राजनीति, अपराधियों और धनबल का गठजोड़ टूट नहीं पा रहा है।
कानून की कमजोरियों का फायदा उठाकर राजनीतिज्ञ गंभीर आपराधिक मामलों को अदालतों में लंबे समय तक लटकाए रखते हैं। यूपी में 13 विधायकों और पांच सासदों के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास और अपहरण जैसे गंभीर केस 11 साल से लंबित हैं। कुछ मामले तो 28 साल तक पुराने हैं।
एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक राइट्स और इलेक्शन वाच की ताजा रिपोर्ट बताती है कि जिस प्रत्याशी का आपराधिक रिकार्ड जितना बड़ा है, उसकी संपति उतनी ही ज्यादा है। राजनीतिक दल उन्हें हाथों-हाथ लेते हैं।
...तो बदलनी पड़ेगी लोकतंत्र की परिभाषा
लोकप्रहरी के महासचिव और सेवानिवृत्त आईएएस अफसर एसएन शुक्ला राजनीति में बाहुबल और धनबल के इस्तेमाल के बढ़ते चलन को बेहद खतरनाक मानते हैं। उनका कहना है कि सभी राजनीतिक दल इसी गठजोड़ पर चलने लगे हैं। यही हाल रहा तो प्रजातंत्र की परिभाषा बदलनी पड़ेगी।
शुक्ल कहते हैं कि प्रदेश के 47 फीसदी विधायकों ने अपने आपराधिक रिकॉर्ड का ब्यौरा दिया है। यह संख्या थोड़ी और बढ़ी तो आपराधिक छवि वाले नेताओं का बहुमत हो जाएगा। अभी प्रजातंत्र को जनता द्वारा, जनता के लिए जनता की सरकार कहा जाता है।
यही हाल रहा तो अपराधियों द्वारा अपराधियों के लिए अपराधियों की सरकार बनने लगेगी। आपराधिक छवि वालों को संरक्षण और टिकट देने में सभी राजनीतिक दल चोर-चोर मौसेरे र्भाई की तरह हैं। यही वजह है कि अच्छे लोग राजनीति से अलग हो गए हैं।
पहले कुछ निर्दलीय और राजनीतिक दलों में भी भले लोग चुनकर आ जाते थे, लेकिन बाहुबल-धनबल का प्रभाव इतना ज्यादा हो गया है कि अच्छे लोगों का चुनाव जीतना आसान नहीं रहा। उन्होंने कहा कि राजनीति में बाहुबलियों के वर्चस्व के खिलाफ हर जिले में एक सीट पर अच्छी छवि वाले निर्दलीय उम्मीदवार का समर्थन किया जाएगा।