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सुसाइड नोट में लिखी उसकी आखिरी ख्वाहिश नहीं हो सकी पूरी

Fri, 10 Jan 2014 09:54 AM IST
अनिल त्रिपाठी/ अमर उजाला,लखनऊ
अनिल त्रिपाठी/ अमर उजाला,लखनऊ Updated Fri, 10 Jan 2014 09:54 AM IST
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suicide in lucknow

उसे कोई गंभीर बीमारी नहीं थी लेकिन न जाने क्यों उसने मान लिया कि अब वह ठीक नहीं हो सकती। उसे अपनी मासूम बेटी और पति से बेपनाह मुहब्बत थी लेकिन उसे लगता था उसकी जिंदगी बोझ बन गई है।

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उसने अपनी जिंदगी खत्म करने का फैसला कर लिया। उसे अपनी मासूम बेटी की चिंता थी। लिहाजा उसने अपने साथ उसे भी फांसी के फंदे से लटका लिया। मगर अचानक रस्सी टूट गई और मासूम बच्ची बाल-बाल बच गई।
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मूलरूप से रायबरेली के सरेनी निवासी धर्मेंद्र कुमार बाराबंकी के हैदरगढ़ के एक प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक हैं। धर्मेंद्र वृंदावन योजना कॉलोनी में पत्नी मोनिका (32) व डेढ़ वर्षीय मासूम बेटी श्रेया के साथ रहते हैं।
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मोनिका को सर्वाइकल की बीमारी थी। पुलिस के मुताबिक, बुधवार शाम धर्मेंद्र के घर लौटने पर पत्नी मोनिका ने उन्हें दूध लेने के लिए बाजार भेजा। धर्मेंद्र दूध लेकर घर लौटे तो कमरे का दरवाजा बंद मिला।

धर्मेंद्र ने आवाज दी लेकिन कमरे से कोई हरकत नहीं हुई। झांक कर देखा तो पत्नी मोनिका फंदे से लटक रही थी। धर्मेंद्र ने दरवाजा खोला तो मासूम बच्ची श्रेया बिस्तर पर पड़ी थी।

उसके गले में फंदा कसा था। उसने तत्काल फंदा खोला। सूचना पर इंस्पेक्टर पीजीआई अजीत सिंह चौहान समेत कई पुलिसकर्मी भी मौके पर पहुंच गए। पुलिस की मदद से धर्मेंद्र ने बच्ची को नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया।

इंस्पेक्टर की मानें तो मोनिका ने रस्सी से मासूम बेटी के साथ खुद फांसी लगाई थी। मगर, रस्सी कमजोर होने से टूट गई जिससे बच्ची की जान बच गई। श्रेया के गले पर चोट के निशान भी मिले हैं।

‘धर्मेंद्र मुझे माफ कर देना’
फंदे पर लटकने से पूर्व मोनिका ने अपने पति धर्मेंद्र को संबोधित एक सुसाइड नोट लिखा है जिसमें उसने अपनी पीड़ा व्यक्त की है। उसने लिखा कि, ‘मैं अपनी बीमारी से तंग आकर आत्महत्या कर रही हूं।

मेरी मौत की जिम्मेदार मैं खुद हूं। मैं हमेशा बीमार रहती हूं। पता नहीं मुझे क्यूं लग रहा है कि मुझे पैरालिसिस हो जाएगा। मेरी मेमोरी भी कुछ कम हो गई है। मुझे अब कुछ याद नहीं रहता।

कुछ दिन बाद क्या होगा?यह सोचकर डर लगता है। मैं ऐसा जीवन नहीं जीना चाहती हूं। इसलिए मैं यह कदम उठा रही हूं। अपने साथ अपनी बेटी को भी ले जा रही हूं।

क्योंकि, मां के न होने पर बच्चे का क्या होता है? इसका एहसास मुझे और धर्मेंद्र दोनों को है। हम दोनों ने ही यह दुख सहा है। मैं नहीं चाहती कि मेरी बेटी भी दुख सहे।

हमें मालूम है कि आप हम दोनों को बहुत प्यार करते हैं। इसलिए मुझे माफ कर दीजिएगा। मैं यह कदम उठाते वक्त पत्थर सी हो गई हूं। मेरी इच्छा है कि मेरे मरने के बाद मेरी आंखें दान कर दी जाए। जिससे किसी के जीवन में उजाला हो सके।’


आंख नहीं हो सकी दान

जिम्मेदार अफसरों की लापरवाही से मोनिका की अंतिम इच्छा भी पूरी नहीं हुई। दरअसल, मोनिका ने सुसाइड नोट में अपनी आंखें दान करने का जिक्र किया था।

इस पर धर्मेंद्र ने एसडीएम, नायब तहसीलदार व इंस्पेक्टर पीजीआई समेत तमाम अफसरों को इसकी जानकारी दी। नायब पंकज शर्मा सत्रह घंटे बाद पहुंचे। तब तक शव पोस्टमार्टम के लिए भेजा जा चुका था।

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