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कभी सीआरपीएफ का जवान था, आज हथियारों का तस्कर
अनिल त्रिपाठी/लखनऊ
Updated Mon, 30 Sep 2013 11:59 AM IST
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सीआरपीएफ का बर्खास्त सिपाही फर्जी लाइसेंस बनाकर असलहे दिलाने का गैंग चला रहा था।
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इस गिरोह से यूपी के फर्रुखाबाद, कन्नौज, एटा, हरदोई के अलावा नगालैंड और पंजाब के कई जिलों के जिलाधिकारियों के फर्जी हस्ताक्षर से बने फर्जी लाइसेंस व भारी मात्रा में हथियार भी बरामद किए गए हैं।
गिरोह का खुलासा तब हुआ जब सर्विलांस सेल, क्राइम ब्रांच व विभूतिखंड पुलिस की संयुक्त टीम ने कमता मोड़ के पास से साथी समेत सीआरपीएफ के बर्खास्त सिपाही को दबोच लिया।
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पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर एक रिवॉल्वर, 11 बंदूकें, 11 फर्जी असलहा लाइसेंस, 6 अर्ध निर्मित लाइसेंस, स्लाइड मशीन, छह मोहरें, 43 कारतूस बरामद किए।
पकड़े गए आरोपियों ने कुबूला कि अभी तक 100 से अधिक असलहा लाइसेंस बना चुके हैं। आरोपियों ने फर्जीवाड़े में एक जिलाधिकारी के असलहा बाबू से मिलीभगत की भी जानकारी दी है। पुलिस इसकी छानबीन कर रही है।
एएसपी क्राइम रवींद्र सिंह के मुताबिक, हसनगंज के डालीगंज निवासी व पेशे से व्यवसायी गौतम चौहान ने हरदोई के हरपाल कस्बा निवासी राजकुमार सिंह व उसके साथी हरदोई के ही धर्मशाला रोड नवीपुरवा निवासी सुमित श्रीवास्तव को 25 हजार रुपये में रिवॉल्वर का लाइसेंस बनवाने का ठेका दिया।
सीआरपीएफ से बर्खास्त सिपाही राजकुमार ने मात्र तीन दिन में असलहा लाइसेंस बनवाकर गौतम को सौंप दिया। इतने कम समय में असलहे का लाइसेंस बनकर मिलने पर गौतम को शक हुआ और उसने पुलिस से संपर्क साधा।
एसएसपी के आदेश पर सर्विलांस सेल के प्रभारी नागेंद्र चौबे ने जांच की। जांच में लाइसेंस फर्जी पाए जाने पर दोनों आरोपियों के विरुद्ध मुकदमा पंजीकृत कर छानबीन शुरू की गई।
पड़ताल में पुलिस को जानकारी मिली कि सीआरपीएफ का बर्खास्त सिपाही राजकुमार अपने दोस्त व प्रिंटिंग प्रेस चलाने वाले सुमित श्रीवास्तव के साथ मिलकर लंबे समय से फर्जी असलहा लाइसेंस बनाने का गोरखधंधा कर रहा है।
एसएसपी ने सर्विलांस सेल प्रभारी, क्राइम ब्रांच के स्वॉट टीम के प्रभारी राजेश पाल सिंह और विभूतिखंड एसओ पंकज कुमार सिंह की टीमें बनकर धरपकड़ के आदेश दिए।
पुलिस ने सर्विलांस की मदद से आरोपियों की खोजबीन शुरू की। इस बीच, रविवार को मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने विभूतिखंड के कमता मोड़ के पास से दोनों को दबोच लिया।
पुलिस ने आरोपियों के पास फैक्ट्री निर्मित दो बंदूकें बरामद कीं। जांच में पुलिस को बंदूक के लाइसेंस फर्जी मिले। पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर एक रिवॉल्वर समेत 11 बंदूकें, 11 फर्जी असलहा लाइसेंस, 6 अर्ध निर्मित लाइसेंस, स्लाइड मशीन, छह मोहरें, 43 कारतूस बरामद कर लिए।
जब्त किए गए लाइसेंस पंजाब के संगरूर, नगालैंड के दीयापुर, यूपी के फर्रुखाबाद, कन्नौज, एटा व हरदोई के जिलाधिकारी के फर्जी हस्ताक्षर कर जारी किए गए हैं।
आरोपियों ने फर्जीवाड़े में एक जिलाधिकारी के असलहा बाबू का नाम भी कुबूला है। पुलिस को असलहा लाइसेंस बनवाने में कई अन्य प्रभावशाली लोगों की संलिप्तता मिली है। पुलिस गहराई से उनकी भूमिका की पड़ताल कर रही है।
वर्ष 1991 से कर रहा फर्जीवाड़ा
पुलिस की मानें तो वर्ष 1991 में राजकुमार सीआरपीएफ में आरक्षी पद पर पंजाब के बरनाला के 120 बटालियन में नियुक्त हुआ था।
नौकरी जॉइन करने के बाद से ही बरनाला के वर्मा गन हाउस के संपर्क में आ गया और असलहा लाइसेंस बनाने की विधा हासिल की।
उसके बाद वर्ष 1997 में राज कुमार के अवकाश से वापस न लौटने पर सीआरपीएफ ने भागोड़ा घोषित कर नौकरी में अनुशासनहीनता बरतने के चलते सेवा से बर्खास्त कर दिया। फिर बर्खास्त सिपाही फर्जी लाइसेंस बनवाने के फर्जीवाड़े में लग गया।
उसने पंजाब के संगरूर के जिलाधिकारी के कूटरचित हस्ताक्षर कर 20 लोगों के फर्जी लाइसेंस बनाए और उन्हें एक गन हाउस से डबल व सिंगल बैरल बंदूक दिलाए।
पुलिस की मानें तो आरोपी ने पंजाब के संगरूर, नगालैंड के दीयापुर, यूपी के फर्रुखाबाद, कन्नौज, एटा व हरदोई से 100 से अधिक लाइसेंस बनाकर बेचे हैं।
15 से 25 हजार वसूलता था एक लाइसेंस का
बर्खास्त सिपाही एक लाइसेंस का 15 से 25 हजार रुपये वसूलता था। पुलिस की मानें तो आरोपी लाइसेंस लेने वाले धारक को अपने जाल में फंसाने के बाद रुपये का जोड़तोड़ करते थे।
लाइसेंस बनवाने वाले की जेब देखकर उनसे रकम की बात की जाती थी। मास्टर माइंड का कहना है कि लाइसेंस बनवाने के नाम पर लोग मोटी रकम देने को भी तैयार हो जाते थे।
वर्ष 1997 में फंसा था
पुलिस की मानें तो वर्ष 1997 में हरदोई सदर पुलिस ने फर्जी असलहा लाइसेंस बनवाने वाले गिरोह का भंडाफोड़ फर्जी असलहा लाइसेंस समेत 10 बंदूकें बरामद की थीं।
उस मामले में पुलिस ने बर्खास्त सिपाही की बुआ व मामा के बेटे को गिरफ्तार कर जेल भेजा था। हालांकि नामजद होने के बाद भी उसे नहीं दबोच सकी थी।
बाद में, बर्खास्त सिपाही ने न्यायालय के समक्ष समर्पण कर निचली अदालत से उसी दिन जमानत करा ली थी। बताया जा रहा है कि इस प्रक्रिया में एक रिटायर्ड न्यायिक अफसर की प्रमुख भूमिका रही।
इसके बदले में बर्खास्त सिपाही ने अफसर को एक ऑर्डिनेंस फैक्ट्री निर्मित रिवॉल्वर गिफ्ट की थी। इसके बाद दिल्ली भाग गया और कइयों के लाइसेंस बनवाए।
लीला प्रिंटर्स में स्लाइड मशीन से तैयार करते थे मोहर
पुलिस की मानें तो राजकुमार असलहा लाइसेंस बनवाने के लिए सुमित श्रीवास्तव के लीला प्रिंटर्स से मोहर बनवाता था। मोहर तैयार करने के लिए सुमित स्लाइड मशीन का प्रयोग करता था।
राजकुमार के कहने पर वह सिर्फ इस बात की जानकारी करता था कि किस अफसर की मोहर बननी है। उसके बाद वह आधे घंटे में मोहर तैयार कर देता था। पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर कई मोहरें व स्लाइड मशीन बरामद की है।
ऐसे करते थे फर्जीवाड़ा
सर्विलांस सेल के प्रभारी की मानें तो बर्खास्त सिपाही राजकुमार लाइसेंस बनवाने के लिए ग्रामीण व कम पढ़े लिखे लोगों को अपने जाल में फंसाता था।
वह लाइसेंस बनवाने की प्रक्रिया के बारे में बताने के साथ ही वह संबंधित जनपद के जिलाधिकारी, असलहा बाबू व अन्य अफसरों से संबंध होने के दावे करता।
झांसे में आने पर राजकुमार रुपये वसूलता और एक सप्ताह में लाइसेंस बनाकर उन्हें सौंप देता। लाइसेंस पकड़ में न आए, इसलिए राजकुमार का प्रयास होता था कि असलहा अपने परिचित गन हाउस वालों से दिलाए।