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लविविः डेथ ऑफ संस्कृत शीर्षक पर छिड़ा विवाद
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लखनऊ विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग द्वारा बृहस्पतिवार को आयोजित एक व्याख्यान के शीर्षक ‘इंडियन परसपेक्टिव द राइज ऑफ मॉडर्न वर्नाकुलर्स एंड डेथ ऑफ संस्कृत : रीडिंग ईश्वर चंद विद्यासागर’ पर विवाद छिड़ गया।
विश्वविद्यालय के शिक्षक संघ ग्रुप पर संस्कृत शिक्षकों ने कड़ी आपत्ति जताई तो बहस छिड़ गई। मामला बढ़ता देख अंग्रेजी विभाग ने व्याख्यान को स्थगित कर दिया।
विभाग ने उक्त शीर्षक पर वर्दवान यूनिवर्सिटी, पश्चिम बंगाल की अंग्रेजी विभाग की नंदिनी भट्टाचार्या का व्याख्यान आयोजित किया था।
बृहस्पतिवार सुबह शिक्षक संघ ग्रुप पर जब विभाग की ओर से कार्यक्रम का ब्रोशर डाला गया तो संस्कृत विभाग के शिक्षकों ने इसके शीर्षक पर आपत्ति दर्ज कराई।
उनकी आपत्ति शीर्षक में शामिल शब्द ‘डेथ ऑफ संस्कृत’ पर थी। उनका कहना था कि संस्कृत कब मृत हो गई। उन्होंने कहा कि संस्कृत जननी है।
पता नहीं कितनी भाषा व सभ्यता इससे निकली हैं। आज भी देश ही नहीं विदेशों में संस्कृत पर काम हो रहा है, नए-नए शोध हो रहे हैं। लोगों को इससे काफी नई जानकारी मिल रही है।
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उन्होंने कहा कि ‘ऐसा लग रहा है कि आयोजक किसी विशेष प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर इस प्रकार का दुराग्रहपूर्ण आयोजन कर रहे हैं। इसके बाद इस पर बहस छिड़ गई।
कुछ शिक्षकों ने कार्यक्रम को तुरंत रोकने की मांग की तो कुछ इस पर स्पष्टीकरण भी दे रहे थे। वहीं, कुछ शिक्षकों ने कहा कि ‘यदि किसी की माता जीवित है और हम उसके लिए शोक सभा का आयोजन करें तो क्या करना चाहिए’? इसके समर्थन में शिक्षकों ने कहा कि ‘दुखद।
यह हमारी सबको सुनने और बोलने का अधिकार देने व्यापक संस्कृति की आंशिक मृत्यु है।’ काफी देर चली बहस के बाद विभाग ने कार्यक्रम को स्थगित कर दिया। वहीं इस मुद्दे पर आयोजन कर रहे अंग्रेजी विभाग की हेड डॉ. रानू उनियाल से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने न फोन रिसीव किया न मेसेज का जवाब दिया।
मेल भेजकर वक्ता ने बताया खेद
दूसरी तरफ लेक्चर की वक्ता वर्दवान यूनिवर्सिटी, पश्चिम बंगाल की अंग्रेजी विभाग की नंदिनी भट्टाचार्या ने प्रो. रानू उनियाल को मेल भेजकर कहा कि टॉपिक से संस्कृत को ठेस पहुंचाने की मंशा नहीं थी। अलबत्ता यह 2001 के एक टाइटल का खंडन करते हुए लेक्चर आयोजित किया गया था। मैं इस पर दुख व्यक्त करती हूं, अगर इसे लेकर कोई मिस अंडरस्टैंडिंग हुई है।
सीएम को किया ट्वीट
संस्कृत के शिक्षकों में इसे लेकर इतनी नाराजगी हो गई कि थोड़ी ही देर में यह मामला विश्वविद्यालय से बाहर पहुंच गया। बाबा दौलत गिरी संस्कृत महाविद्यालय के शिक्षक ने इस कार्यक्रम के ब्रोशर के साथ सीएम को ट्वीट करते हुए लिखा कि ‘संस्कृत भाषा के प्रति ऐसी दूषित मानसिकता के लोगों को आप द्वारा ही दंडित किया जा सकता है। इनके खिलाफ कठोर कार्यवाही होनी चाहिए।’
वैदिक काल को छोड़िए, आधुनिक समय में भी संस्कृत पर काफी काम हो रहा है। कई शोध हो रहे हैं, किताबें लिखी जा रही हैं। इस तरह के शब्द का प्रयोग करना ठीक नहीं है। संस्कृत से ही हमारी संस्कृति है। संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। इससे कई साहित्य निकले हैं।
- प्रयाग नारायण मिश्र, शिक्षक, संस्कृत विभाग
विश्वविद्यालय प्रशासन ने पिछले वर्ष ही नियम बनाया था कि कोई भी विभाग सेमिनार, संगोष्ठी आदि का आयोजन डीन एकेडमिक्स की अनुमति से ही करेगा। उक्त कार्यक्रम बिना डीन एकेडमिक्स की अनुमति के हो रहा था। इसलिए उसे स्थगित कर दिया गया है।
- डॉ. दुर्गेश श्रीवास्तव, प्रवक्ता, लविवि
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विश्वविद्यालय के शिक्षक संघ ग्रुप पर संस्कृत शिक्षकों ने कड़ी आपत्ति जताई तो बहस छिड़ गई। मामला बढ़ता देख अंग्रेजी विभाग ने व्याख्यान को स्थगित कर दिया।
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विभाग ने उक्त शीर्षक पर वर्दवान यूनिवर्सिटी, पश्चिम बंगाल की अंग्रेजी विभाग की नंदिनी भट्टाचार्या का व्याख्यान आयोजित किया था।
बृहस्पतिवार सुबह शिक्षक संघ ग्रुप पर जब विभाग की ओर से कार्यक्रम का ब्रोशर डाला गया तो संस्कृत विभाग के शिक्षकों ने इसके शीर्षक पर आपत्ति दर्ज कराई।
उनकी आपत्ति शीर्षक में शामिल शब्द ‘डेथ ऑफ संस्कृत’ पर थी। उनका कहना था कि संस्कृत कब मृत हो गई। उन्होंने कहा कि संस्कृत जननी है।
पता नहीं कितनी भाषा व सभ्यता इससे निकली हैं। आज भी देश ही नहीं विदेशों में संस्कृत पर काम हो रहा है, नए-नए शोध हो रहे हैं। लोगों को इससे काफी नई जानकारी मिल रही है।
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उन्होंने कहा कि ‘ऐसा लग रहा है कि आयोजक किसी विशेष प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर इस प्रकार का दुराग्रहपूर्ण आयोजन कर रहे हैं। इसके बाद इस पर बहस छिड़ गई।
कुछ शिक्षकों ने कार्यक्रम को तुरंत रोकने की मांग की तो कुछ इस पर स्पष्टीकरण भी दे रहे थे। वहीं, कुछ शिक्षकों ने कहा कि ‘यदि किसी की माता जीवित है और हम उसके लिए शोक सभा का आयोजन करें तो क्या करना चाहिए’? इसके समर्थन में शिक्षकों ने कहा कि ‘दुखद।
यह हमारी सबको सुनने और बोलने का अधिकार देने व्यापक संस्कृति की आंशिक मृत्यु है।’ काफी देर चली बहस के बाद विभाग ने कार्यक्रम को स्थगित कर दिया। वहीं इस मुद्दे पर आयोजन कर रहे अंग्रेजी विभाग की हेड डॉ. रानू उनियाल से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने न फोन रिसीव किया न मेसेज का जवाब दिया।
मेल भेजकर वक्ता ने बताया खेद
दूसरी तरफ लेक्चर की वक्ता वर्दवान यूनिवर्सिटी, पश्चिम बंगाल की अंग्रेजी विभाग की नंदिनी भट्टाचार्या ने प्रो. रानू उनियाल को मेल भेजकर कहा कि टॉपिक से संस्कृत को ठेस पहुंचाने की मंशा नहीं थी। अलबत्ता यह 2001 के एक टाइटल का खंडन करते हुए लेक्चर आयोजित किया गया था। मैं इस पर दुख व्यक्त करती हूं, अगर इसे लेकर कोई मिस अंडरस्टैंडिंग हुई है।
सीएम को किया ट्वीट
संस्कृत के शिक्षकों में इसे लेकर इतनी नाराजगी हो गई कि थोड़ी ही देर में यह मामला विश्वविद्यालय से बाहर पहुंच गया। बाबा दौलत गिरी संस्कृत महाविद्यालय के शिक्षक ने इस कार्यक्रम के ब्रोशर के साथ सीएम को ट्वीट करते हुए लिखा कि ‘संस्कृत भाषा के प्रति ऐसी दूषित मानसिकता के लोगों को आप द्वारा ही दंडित किया जा सकता है। इनके खिलाफ कठोर कार्यवाही होनी चाहिए।’
वैदिक काल को छोड़िए, आधुनिक समय में भी संस्कृत पर काफी काम हो रहा है। कई शोध हो रहे हैं, किताबें लिखी जा रही हैं। इस तरह के शब्द का प्रयोग करना ठीक नहीं है। संस्कृत से ही हमारी संस्कृति है। संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। इससे कई साहित्य निकले हैं।
- प्रयाग नारायण मिश्र, शिक्षक, संस्कृत विभाग
विश्वविद्यालय प्रशासन ने पिछले वर्ष ही नियम बनाया था कि कोई भी विभाग सेमिनार, संगोष्ठी आदि का आयोजन डीन एकेडमिक्स की अनुमति से ही करेगा। उक्त कार्यक्रम बिना डीन एकेडमिक्स की अनुमति के हो रहा था। इसलिए उसे स्थगित कर दिया गया है।
- डॉ. दुर्गेश श्रीवास्तव, प्रवक्ता, लविवि