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Lucknow News: 25 माह बाद चार्जशीट, 24 साल बाद फैसला
Sun, 24 Mar 2024 04:35 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
Updated Sun, 24 Mar 2024 04:35 AM IST
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लखनऊ। बीकेटी थाने में पुलिस हिरासत में हुई वीरेंद्र सिंह की हत्या का फैसला आने में 24 साल लग गए। पहले तो पुलिस ने दो साल से अधिक समय के बाद केस में चार्जशीट दाखिल की और फिर मुकदमे के ट्रायल के दौरान कभी किसी आरोपी की मौत तो कभी आरोपियों की गैरहाजिरी से सुनवाई में देरी हुई। इन सबके बावजूद अभियोजन और पीड़ित परिवार के प्रयासों से 24 साल बाद दोषी आठ पुलिसकर्मियों को भ्रष्टाचार निवारण की विशेष न्यायाधीश सोमप्रभा ने सजा सुनाई।
बीकेटी के नौवाखेड़ा निवासी वीरेंद्र सिंह को 23 अगस्त को बीकेटी थाने के पुलिसकर्मी घर से पकड़कर ले गए थे। उनके भाई विशंभर से वीरेंद्र को छोड़ने के एवज में एक हजार रुपये लिए गए और अगले दिन चार हजार रुपये लेकर आने को कहा गया था। अगले दिन विशंभर थाने पहुंचे तो पता चला कि वीरेंद्र की हवालात में मौत हो गई।
पुलिस ने वीरेंद्र की मौत को आत्महत्या बताया। वहीं, विशंभर ने भाई की हत्या का आरोप लगाते हुए 24 अगस्त 2000 को एफआईआर दर्ज कराई। इस मामले में सिपाही राम प्रभाव शुक्ल, अवध नाथ चौहान, गुलाब चंद्र, चंद्र किरण राठौर और रामपुर बेहड़ा निवासी बाबू पासी को आरोपी बनाया था।
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पुलिस ने मामले की विवेचना और आरोपियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति लेने में दो साल लगा दिए। 25 अक्तूबर 2002 को दरोगा अब्दुल रहमान, अरशद अली, हेड कांस्टेबल राम प्रसाद प्रेमी, उदय नारायण शुक्ल, सिपाही चंद्र किरण राठौर, गुलाब चंद्र, नरेंद्र सिंह, प्रिय कुमार त्रिपाठी, अनिल मिश्र, मनोहर लाल, राम प्रभाव शुक्ल, अवध नाथ चौहान, मुल्लू राम और स्थानीय निवासी बाबू पासी के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई। आठ नवंबर 2002 को न्यायालय ने चार्जशीट का संज्ञान लेकर आरोपियों को कोर्ट में तलब किया था।
आरोपी राम प्रभाव शुक्ल, अवध नाथ चौहान, मुल्लू राम और दरोगा अरशद अली कोर्ट में हाजिर नहीं हुए। इसके चलते मामले की सुनवाई अटकी रही। कोर्ट ने घटना के लगभग 13 साल बाद 18 अक्तूबर 2013 को इन चारों आरोपियों की फाइल को अलग करते हुए सुनवाई शुरू की। बाद में चारों आरोपियों के कोर्ट में हाजिर हो जाने पर सभी आरोपियों की एकसाथ सुनवाई शुरू की गई। दौरान आरोपी चंद्र किरण, प्रिय कुमार त्रिपाठी, मनोहर लाल, अरशद अली, अब्दुल रहमान और बाबू पासी की अलग-अलग समय पर मौत हो गई। इन आरोपियों की फाइल समाप्त/अलग करने की प्रक्रिया के चलते भी सुनवाई बाधित रही। मामले में अभियोजन की ओर से कुल 14 गवाह पेश किए गए। अभियोजन की गवाही खत्म होने के बाद कोर्ट ने चार अक्तूबर 2021 को आरोपियों के बयान दर्ज किए। इस तरह 24 साल बाद 22 मार्च को कोर्ट ने आठ आरोपियों को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई।
भरोसा तो था इंसाफ मिलेगा, पर फैसला आते-आते सालों लग गए
वीरेंद्र सिंह के मित्रों और रिश्तेदारों ने शनिवार सुबह उनके छोटे बेटे बीकेटी के देवरी रुखरा निवासी अशोक सिंह उर्फ मोनू को फोन करके सजा होने की जानकारी दी। उनके चाचा राकेश सिंह ने कहा कि उन्हें कोर्ट से उम्मीद थी कि वीरेंद्र के हत्यारे पुलिसकर्मियों को सजा जरूर मिलेगी लेकिन इंतजार लंबा हो गया। पिता के हत्यारों को सजा की बात करते हुए मोनू की आंखें नम हो गईं। वो कहते हैं कि पिता का चेहरा याद नहीं है। घटना के वक्त वो पांच साल के थे लेकिन मां ज्ञानदेवी बताती थीं कि किस तरह झूठे मामले में फंसाकर उनकी बेरहमी से पिटाई करके पुलिस ने लॉकअप में लटका दिया था। घटना के करीब दो साल बाद बाराबंकी स्थित मायके में ज्ञानवती की मौत हो गई थी। इसके बाद वीरेंद्र के दोनों बेटे हितेश सिंह उर्फ सोनू और अशोक सिंह उर्फ मोनू को उनके छोटे चाचा राकेश सिंह बीकेटी के देवरी रुखारा स्थित लोहारनपुरवा ले आए थे। अशोक के परिवार में पत्नी चांदनी और छोटी सी बेटी शिवांगी है, जबकि हितेश उर्फ सोनू चारबाग में रहते हैं। मोनू अब चाचा के साथ ही पान की दुकान चलाकर परिवार का गुजारा करते हैं। नौवा खेड़ा स्थित पुराने घर में रहने वाले वीरेंद्र के रिश्तेदार अंबर सिंह ने जब सुना कि कोर्ट ने सजा सुना दी है तो शनिवार को वो पास के हनुमान मंदिर पहुंचे और प्रसाद चढ़ाया। कहा कि उन्हें विश्वास था कि एक दिन न्याय जरूर मिलेगा।
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बीकेटी के नौवाखेड़ा निवासी वीरेंद्र सिंह को 23 अगस्त को बीकेटी थाने के पुलिसकर्मी घर से पकड़कर ले गए थे। उनके भाई विशंभर से वीरेंद्र को छोड़ने के एवज में एक हजार रुपये लिए गए और अगले दिन चार हजार रुपये लेकर आने को कहा गया था। अगले दिन विशंभर थाने पहुंचे तो पता चला कि वीरेंद्र की हवालात में मौत हो गई।
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पुलिस ने वीरेंद्र की मौत को आत्महत्या बताया। वहीं, विशंभर ने भाई की हत्या का आरोप लगाते हुए 24 अगस्त 2000 को एफआईआर दर्ज कराई। इस मामले में सिपाही राम प्रभाव शुक्ल, अवध नाथ चौहान, गुलाब चंद्र, चंद्र किरण राठौर और रामपुर बेहड़ा निवासी बाबू पासी को आरोपी बनाया था।
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पुलिस ने मामले की विवेचना और आरोपियों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति लेने में दो साल लगा दिए। 25 अक्तूबर 2002 को दरोगा अब्दुल रहमान, अरशद अली, हेड कांस्टेबल राम प्रसाद प्रेमी, उदय नारायण शुक्ल, सिपाही चंद्र किरण राठौर, गुलाब चंद्र, नरेंद्र सिंह, प्रिय कुमार त्रिपाठी, अनिल मिश्र, मनोहर लाल, राम प्रभाव शुक्ल, अवध नाथ चौहान, मुल्लू राम और स्थानीय निवासी बाबू पासी के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई। आठ नवंबर 2002 को न्यायालय ने चार्जशीट का संज्ञान लेकर आरोपियों को कोर्ट में तलब किया था।
आरोपी राम प्रभाव शुक्ल, अवध नाथ चौहान, मुल्लू राम और दरोगा अरशद अली कोर्ट में हाजिर नहीं हुए। इसके चलते मामले की सुनवाई अटकी रही। कोर्ट ने घटना के लगभग 13 साल बाद 18 अक्तूबर 2013 को इन चारों आरोपियों की फाइल को अलग करते हुए सुनवाई शुरू की। बाद में चारों आरोपियों के कोर्ट में हाजिर हो जाने पर सभी आरोपियों की एकसाथ सुनवाई शुरू की गई। दौरान आरोपी चंद्र किरण, प्रिय कुमार त्रिपाठी, मनोहर लाल, अरशद अली, अब्दुल रहमान और बाबू पासी की अलग-अलग समय पर मौत हो गई। इन आरोपियों की फाइल समाप्त/अलग करने की प्रक्रिया के चलते भी सुनवाई बाधित रही। मामले में अभियोजन की ओर से कुल 14 गवाह पेश किए गए। अभियोजन की गवाही खत्म होने के बाद कोर्ट ने चार अक्तूबर 2021 को आरोपियों के बयान दर्ज किए। इस तरह 24 साल बाद 22 मार्च को कोर्ट ने आठ आरोपियों को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई।
भरोसा तो था इंसाफ मिलेगा, पर फैसला आते-आते सालों लग गए
वीरेंद्र सिंह के मित्रों और रिश्तेदारों ने शनिवार सुबह उनके छोटे बेटे बीकेटी के देवरी रुखरा निवासी अशोक सिंह उर्फ मोनू को फोन करके सजा होने की जानकारी दी। उनके चाचा राकेश सिंह ने कहा कि उन्हें कोर्ट से उम्मीद थी कि वीरेंद्र के हत्यारे पुलिसकर्मियों को सजा जरूर मिलेगी लेकिन इंतजार लंबा हो गया। पिता के हत्यारों को सजा की बात करते हुए मोनू की आंखें नम हो गईं। वो कहते हैं कि पिता का चेहरा याद नहीं है। घटना के वक्त वो पांच साल के थे लेकिन मां ज्ञानदेवी बताती थीं कि किस तरह झूठे मामले में फंसाकर उनकी बेरहमी से पिटाई करके पुलिस ने लॉकअप में लटका दिया था। घटना के करीब दो साल बाद बाराबंकी स्थित मायके में ज्ञानवती की मौत हो गई थी। इसके बाद वीरेंद्र के दोनों बेटे हितेश सिंह उर्फ सोनू और अशोक सिंह उर्फ मोनू को उनके छोटे चाचा राकेश सिंह बीकेटी के देवरी रुखारा स्थित लोहारनपुरवा ले आए थे। अशोक के परिवार में पत्नी चांदनी और छोटी सी बेटी शिवांगी है, जबकि हितेश उर्फ सोनू चारबाग में रहते हैं। मोनू अब चाचा के साथ ही पान की दुकान चलाकर परिवार का गुजारा करते हैं। नौवा खेड़ा स्थित पुराने घर में रहने वाले वीरेंद्र के रिश्तेदार अंबर सिंह ने जब सुना कि कोर्ट ने सजा सुना दी है तो शनिवार को वो पास के हनुमान मंदिर पहुंचे और प्रसाद चढ़ाया। कहा कि उन्हें विश्वास था कि एक दिन न्याय जरूर मिलेगा।