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जानें, क्यों दिख रहा है भाजपा के बुजुर्गों में यूपी का दर्द

Sat, 14 Nov 2015 09:39 AM IST
कुमार भवेश चंद्र/अमर उजाला, लखनऊ
कुमार भवेश चंद्र/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 14 Nov 2015 09:39 AM IST
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Challenges of BJP in Uttar Pradesh.

बिहार में चुनाव नतीजे आने के बाद से भाजपा नेतृत्व पर उठ रहे सवालों के बीच बुजुर्ग नेताओं में पार्टी की नई कार्यशैली को लेकर भी गहरी चिंता है। बीजेपी के जिन चार दिग्गजों ने एक सुर में पार्टी में आम सहमति के सवाल और नेतृत्व की कार्यशैली को लेकर चिंता और गुस्सा दिखाया है, उनमें प्रदेश के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी भी शामिल हैं।

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जोशी अपनी राष्ट्रीय पहचान के बावजूद प्रदेश भाजपा के प्रमुख नाम हैं और इस नाते भी उनकी बातों और चिंताओं का पार्टी की प्रदेश इकाई के लिए खास मायने हैं। दरअसल पिछले लोकसभा चुनाव के पहले से ही प्रदेश भाजपा की कार्यशैली में एक खास तरह का बदलाव दिखने लगा था। आम सहमति का सवाल भी धीरे-धीरे लगभग गौण सा हो गया।
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चुनावी रणनीति से लेकर टिकट बंटवारे तक में प्रदेश के दिग्गज नेता हाशिए पर ही रहे। अमित शाह और उनकी टीम के फैसलों पर तब कोई सवाल इसलिए नहीं खड़े हुए क्योंकि तब पूरे देश में मोदी का ज्वार महसूस किया जा रहा था और सभी उम्मीदें उसी नाम से जुड़ी थीं।
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2014 के नतीजे आने के बाद भी इस स्थिति में बदलाव नहीं आया क्योंकि तब तक मोदी यूपी का चेहरा बन चुके थे और प्रदेश में भाजपा को सबसे बड़ी जीत हासिल हुई। पार्टी के जिन दिग्गजों को चुनाव के दौरान हाशिए पर करते हुए नए प्रयोगों पर चुपचाप मुहर लगाने के लिए विवश किया गया था, उनमें से कुछ को वजीफे के तौर पर आरामतलब जिंदगी का तोहफा दिया गया तो कुछ केंद्रीय मंत्रिपरिषद का हिस्सा बनाए गए हैं।

अखिलेश व मायावती से करना होगा मुकाबला

Challenges of BJP in Uttar Pradesh.

यह बात और है कि सरकार में उनकी निजी हैसियत और ताकत को लेकर सवाल उठते रहते हैं। वे दिग्गज हैं, अनुभवी है लेकिन प्रदेश में पार्टी की नई रणनीति तय करने में उनकी भूमिका होगी या नहीं, इस पर भी सवाल है।

प्रदेश में पार्टी ने बुजुर्गों की एक अनुभवी पीढ़ी को जिस तरह से तितर-बितर कर दिया है, बड़ा सवाल यह है कि नए परिप्रेक्ष्य में नया नेतृत्व नई चुनौतियों का सामना करने को कितना तैयार है?

2017 में आम चुनाव का सामना करने से पहले पार्टी को अपना नया अध्यक्ष भी चुनना है। और अगर पार्टी तय करती है कि प्रदेश का अगला चुनाव किसी चेहरे को आगे करके लड़ा जाए तो यह सवाल भी बेहद अहम रहने वाला है। क्या पार्टी के पास मौजूदा नेताओं की सूची में ऐसा चेहरा है जो मौजूदा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती का मुकाबला कर सके।

यह बात तो भाजपा को अच्छी तरह मालूम है कि यूपी के सिंहासन की लड़ाई में उसे इन्हीं दो चेहरों से दो-दो हाथ करना होगा। कहने की जरूरत नहीं कि भाजपा के पास ऐसे चेहरों की कमी नहीं थी, लेकिन 2014 के चुनाव में जहां पार्टी को लोकसभा में अविश्वसनीय जीत दिलाई, वहीं प्रदेश में नेतृत्व कर सकने वाले चेहरों की अनदेखी की वजह से उनकी चमक लगातार कम होती गई। 2014 की ऐतिहासिक जीत के अतिउत्साह में पार्टी ने उन चेहरों को प्रदेश का चेहरा रहने ही नहीं दिया।

2014 से बिल्कुल अलग होगा 2017 का चुनाव

Challenges of BJP in Uttar Pradesh.

पार्टी कुछ नए चेहरों को प्रदेश में आगे करने की कोशिश जरूर करती रही, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में जांचा और परखा के फॉर्मूले को पूरी तरह नजर अंदाज कर दिया। अब प्रदेश में बीजेपी के पास जांचा और परखा की कसौटी पर कसे जाने वाले चेहरों की घोर कमी दिख रही है।

अगर ये चेहरा दिख भी रहा है तो मौजूदा नेतृत्व उसकी ओर पलट कर देखना पसंद नहीं करता। पार्टी की वर्तमान कार्यशैली को लेकर बुजुर्गों की चिंता इसी दुविधा से जूझती दिखती है।

2017 का चुनाव 2014 के चुनाव से बिल्कुल अलग रहने वाला है। तब मोदी की लहर थी जो आज नहीं है। बिहार चुनाव के बाद सत्ताधारी दल में एक अलग तरह का आत्मविश्वास है। विकास के मुद्दे पर भाजपा का एकाधिकार भी समाप्त हो चुका है।

यूपी में अखिलेश सरकार भी विकास के दावे के साथ मैदान में उतरने का एलान कर चुकी है। उसके पास पांच साल में किए गए कई काम गिनाने के लिए हैं। ऐसे में भाजपा के लिए यह लड़ाई एकतरफा नहीं। नए उभार के साथ बसपा भी चुनौती देने को तैयार है।

भाजपा के लिए यूपी का चुनाव बिहार से भी ज्यादा अहम रहने वाला है, क्योंकि एक तो यह प्रदेश बड़ा है और यहां जीत और हार के मायने भी बड़े होंगे। यूपी के बाद सबसे बड़ी लड़ाई 2019 में ही लड़ी जाएगी। भाजपा के बुजुर्गों की चिंता शायद यही है।

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