खुलासा: सपा सरकार में जमकर हुआ सरकारी खजाने का दुरुपयोग
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यूपी की आर्थिक स्थिति भले ही डांवाडोल हो, लेकिन पिछले पांच साल के दौरान सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों में जमकर सरकारी खजाने का दुरुपयोग किया गया। इसकी पुष्टि कैग की रिपोर्ट में हुई है।
रिपोर्ट के मुताबिक राजकीय निर्माण निगम के अधिकारियों और डिस्कॉम्स (विद्युत वितरण कंपनियों) ने ठेकेदारों को अनुचित लाभ पहुंचाया। रिपोर्ट में दोनों उपक्रमों द्वारा संचालित परियोजनाओं में बरती गई अनियमितताओं के खुलासे के साथ ही खर्च के तरीकों पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
आर-एपीडीआरपी में देरी से से हुआ 2323 करोड़ का नुकसान
सूबे के 168 शहरों में बिजली आपूर्ति व्यवस्था में व्यापक सुधार के लिए केंद्र की योजना ‘पुनर्गठित-त्वरित विद्युत सुधार कार्यक्रम’ (आर-एपीडीआरपी) के क्रियान्वयन के लिए 7,971.48 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए थे। इसमें से डिस्कॉम्स ने 3,764.72 करोड़ रुपये ही खर्च किए।
दो भागों में क्रियान्वित की जाने वाली इस योजना केलिए केंद्र सरकार द्वारा ऋण के तौर पर 4,110.70 करोड़ रुपये दिए गए थे। हालांकि शर्त यह थी कि अगर निर्धारित समय में योजना के भाग-1 को 100 प्रतिशत पूरा करने और भाग-दो के कार्यों का 50 फीसदी काम पूरा कर लिया जाएगा तो यह ऋण अनुदान में तब्दील कर दिया जाएगा। इसके बावजूद डिस्कॉम्स यह काम पूरा नहीं कर पाया। इस वजह से 2,332.58 करोड़ रुपये अनुदान में तब्दील नहीं हो पाया। इससे सरकारी खजाने को नुकसान हुआ है।
शहरों के गो-लाइव होने से भी हुआ नुकसान
आर-एपीडीआरपी के तहत कार्यों के पूरा हुए बगैर ही योजना से संबंधित शहरों को ‘गो-लाइव’ घोषित कर दिया गया, जिससे डिस्कॉम्स की बिजली का नुकसान 23.38 से 34.92 प्रतिशत तक की सीमा से बढ़कर 33.04 से 45.95 प्रतिशत तक पहुंच गया। इस वजह से सरकार को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।
निविदा में देरी से लगी 134.33 करोड़ की चपत
योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए आमंत्रित निविदा को फाइनल करने में मध्यांचल विद्युत वितरण निगम द्वारा काफी विलंब से करने की बात सामने आई है।
कैग रिपोर्ट के मुताबिक इससे सरकारी खजाने को 134.33 करोड़ का नुकसान हुआ है। इसी तरह पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम द्वारा ठेकेदार को मिली बैंक गारंटी का सत्यापन कराए बगैर ही उसे स्वीकार कर लिया गया। बाद में जांच हुई तो वह बैंक गारंटी फर्जी निकली। इससे सरकार को 14.32 करोड़ रुपये की चपत लगी।
आरएनएन के ठेकेदारों को अधिक दर पर काम देकर लगाया 78.55 करोड़ का चूना
उप्र पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड व डिस्कॉम ने राजकीय निर्माण निगम को विद्युत उपकेन्द्रों में केबल बिछाने से संबंधित 1,155.12 करोड़ की लागत के88 काम दिए थे।
इनमें 8 कामों का कैग ने परीक्षण किया तो पाया कि राजकीय निर्माण निगम के अधिकारियों ने निजी ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के लिए निर्धारित प्रक्रिया की अनदेखी करते हुए उच्च दरों पर काम का आवंटन कर दिया जिसकी वजह से सरकारी खजाने को 78.55 करोड़ की चपत लगी।
88 में से दो काम तो बिना निविदा के ही दे दिए गए, जबकि 81 काम बिना निविदा प्रक्रिया की अनदेखी करके दे दिए गए। अधिकारियों ने इन ठेकेदारों से ही ऊंची दरों पर सामग्री की आपूर्ति भी कराई, जिसके लिए खजाने से 3.71 करोड़ रुपये का अधिक भुगतान किया गया।
इकाइयों को काम आवंटन में नियमों की अनदेखी
आएनएन की अपनी ही इकाइयों के बीच काम के आवंटन में भी अधिकारियों ने लापरवाही बरती। नियमानुसार एक इकाई प्रभारी का भौगोलिक कार्यक्षेत्र 80 किमी. के भीतर ही होना चाहिए, लेकिन 143 कार्यों का आवंटन ऐसे इकाइयों को कर दिया गया जिनकी कार्यस्थल से दूरी 101 से लेकर 504 किमी तक रही। लिहाजा इन कार्यों की नियमित निगरानी नहीं होने से समय से काम पूरा नहीं हो पाया।
अनियमित तरीक से किया गया अग्रिम भुगतान
केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) के दिशानिर्देशों की अनदेखी करते हुए यूपीआरएनएन में कई कार्यों के लिए अनियमित तरीक से अग्रिम भुगतान कर दिया गया।
आठ इकाइयों के परियोजना प्रभारियों ने उपकेन्द्रों में केबल बिछाने केलिए कराए जा रहे निर्माण कार्यों के लिए ठेकेदारों को 142.03 करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान निर्धारित नियम व शर्तों को ताक पर रखकर दे दिया गया। इससे ठेकेदारों को ब्याज के तौर पर 21.90 करोड़ का अनुचित लाभ पहुंचाया गया है।
इनमें भी बरती गई अनियमितता
-निविदा प्रकिया का पालन नहीं किया गया
-कार्यों को पूरा करने में देरी से हुआ नुकसान
-विलंब से कार्य पूरा न करने वाले ठेकेदारों से क्षतिपूर्ति न लेना
-खराब कार्यकौशल की वजह से भी हुई आर्थिक क्षति
-जरूरत से अधिक निर्माण सामग्री खरीदी गई
-सेवा कर में कटौती करके भी जमा नहीं किया गया
-वैट के नाम पर अधिक राशि की कटौती