यूपी में फिर होगा 'सच का सामना', मुलायम मोदी तैयार
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सूबे में भले ही अभी विधानसभा की 12 सीटों के उपचुनाव के तारीखों की घोषणा न हुई हो परंतु राजनीतिक दलों ने इसकी तैयारी शुरू कर दी है।
सपा ने प्रभारी बना दिए हैं तो भाजपा ने भी 16 जुलाई को पदाधिकारियों की बैठक बुलाई है। जिसमें इस मुद्दे पर भी बातचीत होनी है। बसपा ने चुनाव न लड़ने का ऐलान कर उपचुनाव की सियासी लड़ाई को भाजपा, सपा और कांग्रेस के बीच समेट दिया है।
पर, लोगों का मानना है कि सूबे के मौजूदा सियासी परिदृश्य में कांग्रेस से किसी बड़े धमाके की उम्मीद करना आसमान से तारे तोड़ लाने जैसा ही है।
जाहिर है कि उपचुनाव में लड़ाई सीधे भाजपा व सपा के बीच ही होने की उम्मीद है। ऐसी स्थिति में उपचुनाव के नतीजे सिर्फ हार-जीत तय नहीं करेंगे बल्कि प्रदेश की भावी सियासी तस्वीर की बानगी भी देंगे।
कांग्रेस के लिए कोई मौका नहीं
नतीजों से पता चलेगा कि सूबे के मतदाताओं पर लोकसभा चुनाव की तरह भाजपा का ही रंग सवार है अथवा वह कुछ उतरा है।
रेल किराए और पेट्रोलियम पदार्थों में बढ़ोतरी से लोगों में मोदी का जादू घटा है अथवा जस का तस बरकरार है।
समाजवादी पार्टी का यह दावा कहां तक सच है कि लोकसभा चुनाव नतीजों को विधानसभा नतीजों की कसौटी नहीं माना जा सकता।
कॉंग्रेस के प्रति लोगों में गुस्सा बरकरार है अथवा कुछ कम हुआ है। पिछड़े, अनुसूचित जाति और मुस्लिम मतदाताओं का मूड क्या कुछ कह रहा है।
सच्चाई आएगी सामने
लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद ज्यादातर राजनीतिक समीक्षकों का निष्कर्ष रहा था कि अनुसूचित जातियों के वोट में भाजपा ठीक-ठाक सेंधमारी करने में सफल रही है।
जिसका प्रमाण लोकसभा की 17 आरक्षित सीटों पर भाजपा की जीत है। उपचुनाव में बसपा के मैदान में न होने से इस निष्कर्ष की हकीकत भी सामने आ जाएगी।
साथ ही यह भी पता चल जाएगा कि सपा-बसपा का यह दावा सही था कि उनकी हार का प्रमुख कारण मुस्लिम मतों में बंटवारा रहा अथवा भाजपा का यह दावा कि लोकसभा चुनाव परिणामों ने तुष्टीकरण की नीति को खारिज कर दिया है।
मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की ताकत को खत्म कर दिया है। भाजपा की जीत जातिवादी राजनीति करने वाली पार्टियों की समाप्ति की शुरुआत है।
बढ़ सकती हैं बसपा की मुश्किलें
माना जा रहा है कि बसपा ने रणनीतिक वजह से उपचुनाव न लड़ने का ऐलान किया है। लोकसभा चुनाव के नतीजों से मिले संकेतों के चलते उसने यह फैसला किया।
वह अपने मतदाताओं के बीच यह संदेश नहीं जाने देना चाहती है कि अनुसूचित जाति का वोट उससे छिटक रहा है। राजनीतिक समीक्षक इसे ठीक नहीं मान रहे हैं।
इनका कहना है कि यह फैसला उसे उल्टा पड़ सकता है। भाजपा अगर अनुसूचित जाति के वोटों को पूरी तरह अपने पाले में खींचने में कामयाब रही तो भविष्य में वह इस वोट को आसानी से बसपा के खाते में आसानी से नहीं जाने देगी।
जिसकी वह तैयारी भी करती दिख रही है। ऐसी स्थिति में बसपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
कसौटी पर सपा की शक्ति
लोकसभा चुनाव के बाद सपा और बसपा दोनों ने अपनी हार के लिए मुस्लिम वोटों में बंटवारे को जिम्मेदार ठहराया था। इस बार ऐसी स्थिति नहीं रहेगी। स्वाभाविक रूप से भाजपा के विरुद्ध उसके सामने समाजवादी पार्टी ही मजबूत विकल्प है।
बावजूद इसके उसकी शक्ति कसौटी पर है। पहली बात तो यह है कि 2012 में जब सपा ने सूबे में अपना झंडा फहराया था। तब आज जैसी स्थिति नहीं थी। बसपा सरकार के खिलाफ लोगों को रुझान सपा के पक्ष में था। सपा को न सिर्फ पिछड़ी जातियों के बल्कि अन्य जातियों के वोट भी मिले थे। आज ऐसी स्थिति नहीं है।
कानून-व्यवस्था और महिलाओं के साथ दुराचार की घटनाएं ही नहीं घट रही हैं बल्कि सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने वाली घटनाएं भी बदस्तूर जारी हैं। मुरादाबाद के कांठ की घटना सूबे में मुजफ्फरनगर जैसी ही तपिश महसूस कराती दिख रही है।
स्वाभाविक है कि मुस्लिम वोट मिलने के बावजूद उपचुनाव में सपा की शक्ति कसौटी पर रहने वाली है। खासतौर से पिछड़ी जातियों के वोट को लेकर। लोकसभा चुनाव में सभी का निष्कर्ष रहा था कि भाजपा ने सिर्फ अति पिछड़ी जातियों में नहीं बल्कि सपा के वोट बैंक यादव मतदाताओं में भी सेंध लगाई है। इसकी सच्चाई भी सामने आ जाएगी।
चिंता से मुक्ति भाजपा को भी नहीं
पर, भाजपा भी पूरी तरह चिंतामुक्त नहीं रह सकती। यह बात तो ठीक है कि जिन 12 सीटों का उपचुनाव होना है। उनमें समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी के पास कोई सीट नहीं थी।
भाजपा को 11 और अपना दल को एक सीट मिली थी। भाजपा को 11 सीटें तब मिली थीं जब उसके दुर्दिन चल रहे थे। आज वह पहले से बेहतर स्थिति में है।
बावजूद इसके यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि तब भाजपा सरकार में नहीं थी। उपचुनाव नवंबर तक होने हैं। तब तक केंद्र सरकार को छह महीने हो जाएंगे। उस स्थिति में इन चुनाव में मतदाता केंद्र सरकार के फैसलों को भी ध्यान में रखेंगे।
ऊपर से सपा सरकार ने जिस तरह इन चुनावों को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना रखा है, उसके चलते भी भाजपा के सामने मुश्किलें आ सकती हैं। ऐसे में जो भी नतीजे आएंगे वह नए सियासी संदेश देने व समीकरण बताने वाले होंगे।