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यूपी चुनाव: 50 सीटों पर पुराने बसपाई ही देंगे 'हाथी' को चुनौती

Sun, 29 Jan 2017 02:42 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sun, 29 Jan 2017 02:42 AM IST
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 BSP's former leaders to challenge it in UP election.
बसपा सुप्रीमो मायावती - फोटो : amar ujala

एक-एक सीट के समीकरण साधने की जुगत में जुटी बसपा को करीब 50 सीटों पर बसपाई ही चुनौती देंगे। इन सीटों पर बसपा को उन लोगों से जूझना होगा जो कुछ महीने पहले तक पार्टी के साथ हुआ करते थे। इनमें तमाम ऐसे चेहरे आज हाथी के मुकाबिल हैं जो दुर्दिन में हाथी का परचम लहराने में सफल हुए थे।

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भाजपा में जाने से पहले पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य बसपा सुप्रीमो मायावती के बाद प्रमुख नेताओं में शुमार होते थे। वे अपनी परंपरागत सीट पडरौना से भाजपा प्रत्याशी के रूप में ताल ठोक रहे हैं।
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बसपा ने वहां नए प्रत्याशी को काफी पहले मौका दे दिया, लेकिन मौर्य के मैदान में आ जाने से चुनौती बढ़ गई है। पूर्व सांसद बृजेश पाठक कुछ महीने पहले तक बसपा के चुनिंदा नेताओं में शुमार होते थे। अब वे राजधानी लखनऊ में भाजपा प्रत्याशी हैं।

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इन्होंने भी बदल ली पार्टी

 BSP's former leaders to challenge it in UP election.

पूर्वांचल के बाहुबली बुजुर्ग नेता हरि शंकर तिवारी के बेटे विनय शंकर तिवारी को बसपा का टिकट देने की अटकलों के बीच चिल्लूपार गोरखपुर से सिटिंग विधायक राजेश त्रिपाठी भाजपा में चले गए थे। त्रिपाठी अब भाजपा उम्मीदवार हैं।

मायावती ने हाल में पूर्वांचल के तीन प्रत्याशियों के टिकट काटकर बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी के परिवार को दे दिए। इनमें एक पुराने प्रत्याशी को छोड़ दिया जाए तो बाकी दो के मैदान में आने की संभावना बढ़ गई है।

ये लोग काफी समय से बसपा कॉडर के बीच काम कर रहे थे। चर्चा है कि बसपा का कॉडर माफिया के प्रत्याशी बनाए जाने से बेचैन है। पार्टी की ओर से कॉडर को समझाने की कोशिशें तेज हो गई हैं।

दो दर्जन सिटिंग एमएलए छोड़ चुके हैं बसपा का साथ

 BSP's former leaders to challenge it in UP election.

कुछ दिन पहले गाजियाबाद व फतेहपुर में भी एक-एक प्रत्याशी चुनाव के ऐन मौके पर बदले गए। यहां चुनाव के लिए उतारे गए प्रत्याशियों को कॉडर के बीच पहुंचने का भी पर्याप्त समय नहीं मिल पा रहा है। इसके अलावा पार्टी के करीब दो दर्जन सिटिंग विधायक बसपा छोड़कर किसी न किसी दल का दामन थाम चुके हैं।

इनमें से ज्यादातर प्रत्याशी बन गए हैं। ये अर्से से बसपा के बेस वोट की सियासत करते रहे हैं। अब चुनाव के ठीक पहले बसपा को यहां नए चेहरे देने पड़े हैं। यही नहीं, को-ऑर्डिनेटर जैसी अहम भूमिका निभाने वाले कई नेता दूसरे दलों से भाग्य आजमा रहे हैं।

विश्लेषक बताते हैं कि दलों के सामने उन सीटों पर चुनौती ज्यादा बढ़ जाती है जहां काम के समय दूसरे लोग होते हैं और चुनाव के समय दूसरों को मौका देना पड़ता है।

इसमें पुराने लोग जो जिस वर्ग के बीच काम कर रहा होता है, दल छोड़ने के बावजूद व्यक्तिगत काम व व्यवहार के नाते उसका कुछ वोट बैंक तो वह प्रभावित ही कर लेता है। ऐसी सीटों पर चुनौती बढ़ जाती है।

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