लड़खड़ाई हाथी की चाल, बसपा ने खोया जनाधार
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दो साल पहले हुए विधान सभा चुनावों में बसपा की ताकत लगातार कम होती गई। लोक सभा चुनाव 2014 में अभी तक के परिणाम देख यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या पार्टी नेतृत्व ने उससे सबक लेते हुए सांगठनिक मजबूती पर ध्यान नहीं दिया?
अपनी मजबूती पर इतराना कहें या दूरदर्शिता का अभाव की लखनऊ में ही पार्टी प्रत्याशी नकुल दुबे चुनाव अभियान के दौरान थके-हारे नजर आए। इतना ही नहीं पूरे प्रचार अभियान में वह अकेल ही जूझते रहे।
काडर से पहचान
चुनाव पंडित मानते हैं कि बसपा के पास काडर अब भी बड़ी ताकत है। अभी भी एक बड़ा वर्ग वह है जो हाथी निशान देखकर वोट देता है। इस चुनाव में भी प्रत्याशी कोई रहा हो, काडर ने पूरा जोर लगाया।
मायावती जहां सभा करने पहुंचीं वहां और जहां नहीं गईं वहां भी काडर अपने काम में लगा रहा। बावजूद इसके पार्टी का प्रदर्शन यदि नहीं सुधर सका तो निश्चित तौर पर इसे रणनीतिक असफलता ही माना जाएगा।
सियासी जंग से बाहर हुई पार्टी
दोपहर ढाई बजे तक की मतगणना रिपोर्ट देखें तो बसपा कहीं नजर नहीं आती है। कुल अस्सी सीटों में करीब 72 सीटों पर भाजपा का कब्जा हो चुका है। वहीं सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी सात सीटों के साथ कांग्रेस पर बढ़त बनाए हुए है।
अभी तक की मतगणना में बहुजन समाज पार्टी को 19.9 प्रतिशत सीट मिली है। वोटों के इस धुव्रीकरण में जहां भाजपा को जहां नियोजित प्रचार अभियान का फायदा मिला। जबकि विशेषज्ञ मानते हैं कि मीडिया और जनता से संवाद की कमी ने बीएसपी को पीछे ढकेला।