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यूपी चुनावी मोड में, भाजपा दिख रही अंधी सुरंग में

Fri, 25 Mar 2016 03:17 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 25 Mar 2016 03:17 PM IST
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 BJP prepration for UP assembly election.

भाजपा नेता 2017 के चुनावी संग्राम में भले ही बहुमत की सरकार बना लेने का दावा कर रहे हों लेकिन पिछले 17 महीनों से पार्टी अनिर्णय और अनिश्चय के भंवर में फंसी दिख रही है। संगठनात्मक ढांचा बनाने का काम भी पूरा नहीं हो पाया है।

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प्रदेश भाजपा अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी कब तक इस पद पर रहेंगे, यह शायद उन्हें भी नहीं मालूम। पार्टी चार महीनों से उनके उत्तराधिकारी की तलाश में है लेकिन शीर्ष नेतृत्व किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पाया है। आमतौर पर शुभ कामों के लिए वर्जित माने जाने वाले एक महीने का खरमास भी प्रारंभ हो चुका है। लगता है, यह काम फिलहाल अटक गया है।
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चार महीनों से हो रही अध्यक्ष की तलाश
2017 में जीत दिलाने के लिए चेहरे की तलाश में चार महीने से जुटी भाजपा घनचक्कर हो गई है। शीर्ष नेतृत्व प्रदेश अध्यक्ष के लिए किसी नए चेहरे पर सहमति नहीं बना पाया है। इस दौरान आंवला से पार्टी विधायक धर्मपाल का नाम चला।
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उनके पक्ष में कल्याण सिंह जैसे नेता के विकल्प के रूप लोध वोटों की लामबंदी का तर्क सामने आया, पर नाम घोषित नहीं हो पाया। पूरी तरह से सांगठनिक व्यक्ति को अध्यक्ष पद पर बैठाने की नीति के साथ महामंत्री स्वतंत्र देव सिंह का नाम भी चला लेकिन उनके नाम पर भी सहमति नहीं बनी।

मुख्यमंत्री पद के लिए कोई पिछड़ा हो सकता है दावेदार

 BJP prepration for UP assembly election.

कहा जाने लगा कि पिछड़े वोटों को केंद्रित करके अध्यक्ष तलाशने के बजाय इस पद पर किसी अगड़े को लाया जाए। पिछड़ों के लिए आगे मुख्यमंत्री का विकल्प छोड़कर उन्हें साथ रखा जा सकता है। लखनऊ के महापौर डॉ. दिनेश शर्मा और नोएडा से सांसद डॉ. महेश शर्मा के नाम भी उछले, लेकिन उन पर भी सहमति नहीं बनी।

मनोज सिन्हा व कठेरिया का नाम भी चला
करीब दो महीने से रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा को डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी के उत्तराधिकारी के रूप में लाने की चर्चा चल रही है, लेकिन रणनीतिकार उनके नाम पर भी सहमति नहीं बना पा रहे।

बीच-बीच में केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री रामशंकर कठेरिया का नाम भी दलित चेहरे को अध्यक्ष बनाकर दलितों को लुभाने के तर्क के साथ चलता है लेकिन मुकाम पर पहुंचने से पहले नेपथ्य में चला जाता है।

बताया जाता है कि अमित शाह की पसंद यदि कोई है तो वह प्रदेश प्रभारी ओम माथुर को नहीं भा रहा। जो माथुर को उचित लगता है, वह शाह को पसंद नहीं। जिस नाम पर दोनों की सहमति होती है, वह गृहमंत्री राजनाथ सिंह की टेबल पर आकर अनफिट लगने लगता है।

नए नेतृत्व का संदेश, लेकिन पुरानों में भी उलझे

 BJP prepration for UP assembly election.
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह - फोटो : getty images

पार्टी एक तरफ युवा जोश और नया नेतृत्व का संदेश देने की कोशिश करती है, पर अध्यक्ष के लिए किसी नए नाम पर सहमति नहीं बना पा रही है।

कभी राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह तो कभी गृहमंत्री राजनाथ सिंह को सूबे के चुनावी संग्राम की कमान देने की चर्चा पार्टी के भीतर से उठती है। इससे भी पता चलता है कि पार्टी अंधी सुरंग में फंसी है।

17 जिलों में नहीं बनी पूरी कमेटी
प्रदेश में सदस्यता अभियान 13 नवंबर 2014 को शुरू हुआ। तब से 17 महीने गुजर गए। सपा और बसपा उम्मीदवारों की तलाश काफी हद तक निपटा चुके हैं, पर भाजपा नेता 17 जिलों में भी पूरा संगठन नहीं खड़ा कर पाए। 58 जिला-महानगरों में ही अध्यक्ष बन पाए हैं। शेष 32 में अध्यक्ष बनना बाकी है।

यह हालत तब है जब इस बार चुनाव न कराके जिलों में नामांकन करने वाले सभी दावेदारों के नाम मंगाकर दिल्ली से तय करके भेजे गए हैं। जिला समितियों के लिए भी अब तक घोषित अध्यक्षों से नामों की सूची मंगा ली गई है लेकिन समितियों की घोषणा नहीं हो पा रही है।

नए पुराने के बीच उलझे रणनीतिकार

 BJP prepration for UP assembly election.

प्रदेश भाजपा का कायाकल्प करने में कई पुरानों को तो हाशिए पर पहुंचा दिया गया लेकिन उनके विकल्प की तलाश में संगठन के नए रणनीतिकार अटके दिखते हैं।

पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ओमप्रकाश सिंह लंबे अरसे से सक्रिय कार्यक्रमों से दूर हैं। विनय कटियार व सूर्यप्रताप शाही की पार्टी में कोई भूमिका नहीं है, पर इनकी जगह यूपी के किसी नेता का नाम अभी इस रूप में नहीं उभर पाया है जिसका संगठन के फैसलों में कोई महत्व हो।

कभी-कभार डॉ. रमापति राम त्रिपाठी का नाम चुनाव अभियान समिति के नए अध्यक्ष के रूप में चर्चा में आता है, मगर पार्टी अभी कोई स्पष्ट निर्णय नहीं कर पाई है।

अध्यक्ष बन नहीं पाया, सीएम के चेहरे की चर्चा

 BJP prepration for UP assembly election.

भाजपा भले ही नए अध्यक्ष की तलाश पूरी नहीं कर पा रही लेकिन मुख्यमंत्री के चेहरे के साथ चुनावी मैदान में जाने की चर्चा शुरू हो गई है। हिंदुत्ववादी छवि के सहारे वोटों के ध्रुवीकरण के तर्क के साथ महंत आदित्यनाथ का नाम सामने आया है।

कहा गया कि  राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह आदित्यनाथ जैसे हिंदूवादी चेहरे के साथ चुनावी मैदान में उतरना चाहते हैं ताकि हिंदुओं को लामबंद किया जा सके।

इसी बीच, केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी का नाम मायावती से निपटने और सूबे को महिला मुख्यमंत्री देने के लिए चर्चा में आया। वरुण गांधी का भी नाम बीच-बीच में उभरता है।

पूछने पर प्रदेश प्रभारी ओम माथुर कहते हैं कि भाजपा किसी चेहरे को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करके चुनाव में नहीं उतरेगी लेकिन यह जोड़कर कि अंतिम फैसला संसदीय बोर्ड करेगा, यह भी बता देते हैं कि पार्टी के भीतर कोई नीति अभी तय नहीं हो पाई है।

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