यूपी के विधानसभा चुनाव में कौन होगा भाजपा का 'ट्रंप कार्ड'
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वैसे तो सूबे के चुनाव में अभी साल भर से ज्यादा का वक्त है। इससे पहले पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम में चुनाव होने हैं, पर यूपी के चुनाव की चर्चा अभी से तेज हो गई है। आमजन की जिज्ञासा सबसे ज्यादा भाजपा को लेकर है।
लोगों के मन में 2017 में यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा के प्रयोग को लेकर कई सवाल हैं। नजरें इस बात पर टिकी हैं कि दिल्ली की तर्ज पर यूपी में किसी चेहरे को आगे करके चुनाव लड़ा जाएगा या बिहार की तरह बिना किसी चेहरे के या किसी नए फॉर्मूले के साथ भाजपा मैदान में उतरेगी।
राजनीतिक विश्लेषक अभी तक यही मानकर चल रहे थे कि दिल्ली में किरन बेदी को आगे करके चुनाव लड़ने का प्रयोग बुरी तरह विफल होने से भाजपा की प्राथमिकता झारखंड, महाराष्ट्र व हरियाणा की तरह यूपी में भी बिना किसी चेहरे के ही चुनाव मैदान में उतरने की होगी।
पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व प्रदेश प्रभारी ओम माथुर और प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने कई मौकों पर प्रत्यक्ष रूप से यह बात कही भी कि उप्र में मोदी ही हमारा चेहरा होंगे। लेकिन बिहार चुनाव में पार्टी की हार के बाद इसे लेकर भी नई रणनीति की अटकलें तेज हैं।
इसलिए पैदा हुई हिचक
बिहार में यह प्रयोग जिस तरह धड़ाम हुआ है, उसके बाद भगवा टोली के यूपी में मोदी के नाम पर ही चुनाव लड़ने के इरादों को लेकर असमंजस होना स्वाभाविक है।
पार्टी के लोगों को भी लगने लगा है कि कोई एक ही व्यक्ति ट्रंप कार्ड के सहारे हर बाजी नहीं जीत सकता। सिर्फ एक चेहरे के सहारे किसी भी सियासी दल को हर जगह सफलता मिलना काफी मुश्किल है।
राजनीति शास्त्री प्रो. एसपीएम त्रिपाठी कहते हैं कि सिर्फ मोदी की मेहनत, नाम, काम और चेहरे के बूते देश के सभी सूबाई चुनाव में कमल खिलाने का ख्वाब देखना रणनीति के लिहाज से उचित नहीं है। यह मोदी के साथ भी अन्याय है। बिहार में यह दिखा भी।
मोदी ने तो पूरी तरह समर्पित होकर अपना काम किया, लेकिन बाकी क्षत्रप उदासीन रहे या रस्म अदायगी करते दिखे। इससे मोदी की क्षमता को लेकर कार्यकर्ताओं व जनता में असमंजस पैदा हो सकता है। उनका आत्मविश्वास डगमगा सकता है।
तरह-तरह की अटकलें
बिहार चुनाव के बाद उप्र के सियासी गलियारों में भाजपा की भविष्य की रणनीति को लेकर तरह-तरह की अटकलें लग रही हैं। कोई पुराने फॉर्मूले पर यूपी के किसी पुराने नेता को आगे करके चुनाव मैदान में उतरने की संभावनाएं देख रहा है तो किसी को अब भी स्मृति ईरानी या मनोहर परिकर को यूपी वाले नेता के रूप में नेतृत्व सौंपकर सूबे की सत्ता पर कमल खिलाने का सपना दिख रहा है।
कोई दिल्ली में किरन बेदी वाला प्रयोग विफल होने के कारणों की अलग व्याख्या करके ऐसे प्रयोग को पूरी तरह असफल नहीं मान रहा है। इनका तर्क है कि दिल्ली में नुकसान का कारण चेहरा नहीं बल्कि बेदी का बाहरी होना था। पार्टी समर्थकों और कार्यकर्ताओं के भीतर ही उनके कामकाज को लेकर संदेह पैदा हो गया।
बेदी के रूप में किसी बाहरी को अपने ऊपर थोपने के संदेश ने भी पार्टी की समस्या बढ़ाई। इसी कारण पराजय मिली। इसके बजाय अगर पार्टी के किसी चेहरे को आगे करके चुनाव लड़ा जाता तो परिणाम इतने खराब न होते।
इसी तरह बिहार में भी बाहरी नेताओं, दलबदलुओं व दूसरे दलों का सहारा लेने को कार्यकर्ताओं ने बुरा माना। वे या तो उदासीन होकर घर बैठ गए या भाजपा समर्थक दल के किसी उम्मीदवार या दलबदलू को वोट देने के बजाय दूसरे को वोट दे दिया।