'भागवत व मोदी के बयानों से बिहार में हारी भाजपा'
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बिहार चुनाव में भाजपा के स्टार प्रचारक रहे दिल्ली से सांसद मनोज तिवारी ने माना कि आरक्षण की समीक्षा वाले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान से एनडीए को नुकसान हुआ।
इससे बिहार में विपक्ष को बैठे-बैठाए एनडीए के खिलाफ एक बड़ा मुद्दा मिल गया। विपक्षी पार्टियां पूरी तरह जातिगत राजनीति पर उतर आईं। जातिगत समीकरणों के गणित ने एनडीए का खेल बिगाड़ दिया।
बुधवार की दोपहर मनोज ने ‘अमर उजाला कार्यालय’ में बातचीत में बिहार चुनाव को लेकर दिल खोलकर बातें कीं। मनोज ने प्रधानमंत्री मोदी के डीएनए वाले बयान को भी बिहार की हार के लिए एक कारण बताया।
मनोज ने बताया कि उन्होंने बिहार चुनाव में कुल 146 जनसभाएं की। 29 विधानसभा क्षेत्रों में वे दो बार गए। इनमें से 26 सीटों पर एनडीए को कामयाबी मिली। कहा कि मेरा निजी तौर पर मानना है कि जाति के साथ-साथ आर्थिक रूप से कमजोर तबके को भी आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए।
संघ प्रमुख का बयान भी इसी परिप्रेक्ष्य में आया था, जिसकी गलत व्याख्या की गई। संघ प्रमुख की मंशा गलत नहीं थी, मगर मुद्दा उछालने का यह समय सही नहीं था। विपक्षी दल इस बयान को तोड़-मरोड़कर अपने हित में प्रयोग करने में कामयाब रहे। पार्टी की यह रणनीतिक चूक थी।
असहिष्णुता और पुरस्कार वापसी वैश्विक साजिश
भाजपा सांसद ने कहा कि कुछ लोगों का कहना है कि देश में असहिष्णुता बढ़ रही है। बोलने की आजादी भी छीनी जा रही है। नाराज लोग अपना पुरस्कार लौटा रहे हैं। यह सबकुछ अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा है।
संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद का भारत स्थायी सदस्य न बन सके, इसके लिए भारत की वैश्विक स्तर पर छवि खराब की जा रही है। कहा कि कलबु़र्गी का मामला हो या एखलाक का, दोनों ही मसला राज्य सरकारों और कानून व्यवस्था से ज़ुड़ा है, मगर गुस्सा लोग केंद्र सरकार से जता रहे हैं और पुरस्कार लौटा रहे हैं। विरोध का यह तरीका मेरी समझ से परे है।
मोदी का डीएनए वाला बयान
बिहार चुनाव में एनडीए की करारी हार के लिए पीएम मोदी के ‘डीएनए’ वाले बयान को भी एक कारण बताया जा रहा है। इस सवाल पर मनोज का कहना था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंशा गलत नहीं थी। उनका उद्देश्य बिहार को उसका महत्व बताना था। लेकिन, विपक्ष ने उनके इस बयान को बिहारियों के स्वाभिमान पर चोट बताया और उसका खूब प्रचार किया। निश्चित रूप से यह मुद्दा ऐसा था कि जो एनडीए के खिलाफ गया।
हार के लिए प्रदेश संगठन का कमजोर प्रबंधन जिम्मेदार
पार्टी सांसद मनोज ने कहा कि बिहार में भाजपा इसलिए हारी क्योंकि प्रदेश संगठन का चुनावी प्रबंधन बेहद लचर था। प्रदेश इकाई ने राष्ट्रीय नेताओं को सही जानकारी ही नहीं दी। इसके मुकाबले महागठबंधन का पूरा अभियान योजनाबद्ध तरीके से चला। वहीं बिहारी बाबू शत्रुघन सिन्हा की नाराजगी की भी पार्टी को भारी कीमत चुकानी पड़ी। चुनाव अभियान के दौरान उनके बयानों से पार्टी की न केवल किरकिरी हुई बल्कि हार का भी मुंह देखना पड़ा।
मोदी में है बिहार को बदलने की तड़प
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार चुनाव में 30 रैलियां केवल इसलिए की, क्योंकि वे बिहार को बदलना चाहते हैं। उनके दिल में बिहार को लेकर तड़प है।
मोदी विकास की होड़ में बिहार को सबसे आगे देखना चाहते हैं। पीएम का मानना है कि यूपी और बिहार को आर्थिक और सामाजिक रूप से ताकतवर बनाए बिना समृद्ध भारत की कल्पना नहीं की जा सकती।
पढ़ाई, कमाई और दवाई था भाजपा का मुद्दा
बिहार के युवा को अच्छी शिक्षा मिले, घर में ही रोजगार का जरिया मिले और स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हों, ऐसा करने के वादे के साथ एनडीए बिहार के चुनावी समर में उतरा था, मगर जाति कार्ड ने पूरा खेल बिगाड़ दिया। दाल की एक प्रजाति (अरहर) को जान बूझकर महंगा किया गया।
भाजपा शासित राज्यों में दाल की कालाबाजारी के खिलाफ अभियान चला, छापेमारी हुई मगर यूपी और बिहार की सरकारों ने इसके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। इसके पीछे भी सियासी साजिश थी।
चुनाव खत्म होते ही दाल की कीमतों में गिरावट आ गई। मनोज ने कहा कि दाल की महंगाई चुनावी मुद्दा तो नहीं था मगर सियासी साजिश जरूर थी।