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...तो क्या भाजपा के लिए सियासी एजेंडा भर है आपातकाल

Sat, 25 Jun 2016 02:02 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 25 Jun 2016 02:02 AM IST
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BJP forgets promises made for emergency victims.
- फोटो : amar ujala

वर्ष 1975 में देश में 25 जून की ही रात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की थी। 41 साल गुजर गए। उस समय जो जवान थे, वे आज बुजुर्गों की कतार में हैं। जो बच्चे थे, वे अधेड़ हो गए। जो बुजुर्ग थे, वे दुनिया से विदा हो गए।

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कई को ताज मिला, लेकिन ज्यादातर गुमनामी में जीवन काट गए। कई को दवाइयों की जरूरत पड़ने लगी और सहारे की भी। आर्थिक संकट से जूझने की क्षमता भी जवाब दे गई। मुलायम सिंह यादव ने जब अपनी सरकार में आपातकाल के इन लड़ाकों को लोकतंत्र सेनानी का दर्जा दिया, इनके लिए पेंशन, मुफ्त बस यात्रा सहित अन्य सुविधाओं की घोषणा की तो इनकी उम्मीदें परवान चढ़ीं।
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दो साल पहले जब केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी तो आपातकाल के लड़ाकों का उत्साह बढ़ा कि नरेंद्र मोदी उनके लिए कुछ न कुछ जरूर करेंगे। मोदी उसी विद्यार्थी परिषद से निकलकर आए हैं, जिसके 1973 में धनबाद के अधिवेशन में सबको सस्ती और अच्छी शिक्षा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे पर युवा आंदोलन खड़ा करने की योजना बनी थी।
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यही युवा आंदोलन पुलिस की गोली से हुई आठ छात्रों की मौत और बाद में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के अगुवाई करने से पूरे देश में आपातकाल के विरुद्ध लड़ाई का वातावरण बना।

आपातकाल कांग्रेस को घेरने का एकमात्र साधन

BJP forgets promises made for emergency victims.
दिनेश अग्निहोत्री - फोटो : amar ujala

विद्यार्थी परिषद व संघ से जुड़े दिनेश अग्निहोत्री कहते हैं कि भाजपा हर साल 25 जून को काले दिन के रूप में मनाती रही है। अब तो केंद्र की मोदी सरकार को किसी के विरोध की चिंता भी नहीं है क्योंकि लोकसभा में भाजपा के खुद के सांसदों की संख्या इतनी है जो उन्हें काम करने की पूरी आजादी दे देती है।

लोकतंत्र सेनानियों की तरफ से कई ज्ञापन दिए गए, पैरवी की, लेकिन कुछ नहीं हुआ। ऐसे में आपातकाल के लड़ाकों के दिमाग में यह सवाल कौंधने लगा है कि आपातकाल क्या भाजपा के लिए महज सियासी एजेंडा भर है कांग्रेस को घेरने और अलोकतांत्रिक ठहराने के लिए। वे कहते हैं, लोकतंत्र सेनानियों को पैसा या सुविधा नहीं चाहिए, पर पहचान और सम्मान तो मिलना ही चाहिए।

आपातकाल के लड़ाकों को इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी इसलिए भी ज्यादा खटक रही है क्योंकि भाजपा ने समय-समय पर चुनावी घोषणा पत्र में आपातकाल के लड़ाकों को स्वतंत्रता सेनानियों के बराबर का दर्जा देने का वादा किया। मोदी की पहल पर जयप्रकाश नारायण की जयंती पर पिछले साल अक्तूबर में दिल्ली में कार्यक्रम हुआ। इसमें मोदी ने आपातकाल के दौरान तत्कालीन सरकार के अत्याचारों को सहने वालों के योगदान का उल्लेख किया था।

साथ ही कल्याण सिंह व ओम प्रकाश कोहली सहित कई ऐसे लोगों को सम्मानित भी किया था जो आपातकाल के दौरान जेल गए थे। इसी कार्यक्रम में उन्होंने वेंकैया नायडू के संयोजकत्व में एक समिति का गठन करने की घोषणा की।

इसमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के पांच बार राष्ट्रीय अध्यक्ष और पांच बार महामंत्री रहे राजकुमार भाटिया, खादी ग्रामोद्योग आयोग के पूर्व चेयरमैन डॉ. महेश शर्मा और लखनऊ के राजेंद्र तिवारी सहित नौ लोगों को लोगों को रखा गया था, लेकिन आज तक समिति की एक भी बैठक नहीं हुई।

अब तो कोई मजबूरी नहीं होनी चाहिए

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राजेंद्र तिवारी - फोटो : amar ujala

विद्यार्थी परिषद के पुराने कार्यकर्ता और भाऊराव देवरस के सहयोगी राजेंद्र तिवारी का कहना है कि हम लोग जब बतौर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को याद दिलाते थे कि इमरजेंसी के दौरान संघर्ष करने वालों की काफी बुरी दशा है तो वे कहते थे कि 24 दलों की सरकार है। चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा हूं, पर अब तो विशुद्ध रूप से भाजपा के बहुमत वाली सरकार है। अब तो कोई मजबूरी नहीं होनी चाहिए।

आपातकाल के दौरान क्या-क्या कष्ट नहीं सहे, लेकिन जब केंद्र में बैठे कुछ लोग यह कहें कि उत्तर प्रदेश सरकार तो सुविधाएं दे ही रही है, तब क्या कहूं।

बात सुविधाओं की नहीं, सम्मान व स्वाभिमान की है। हम चाहते हैं कि मोदी सरकार को कुछ ऐसा जरूर करना चाहिए जिससे देश की नौजवान पीढ़ी उस आंदोलन को जाने व समझे।

मोदी सरकार नहीं सुनेगी तो कौन सुनेगा

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सूर्य कुमार - फोटो : amar ujala

स्व. प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के सहयोगी सूर्य कुमार का कहना है कि उच्च न्यायालय ने पिछले दिनों एक फैसले में कहा था कि आपातकाल के विरुद्ध लड़ने वालों को सम्मान देना इसलिए भी जरूरी है जिससे भावी पीढ़ी को यह प्रेरणा मिले कि लोकतंत्र की रक्षा के प्रति लापरवाही किस तरह एक तानाशाह और तानाशाही प्रवृत्ति को जन्म दे देती है।

इस समय तो केंद्र में लोकतंत्र सेनानियों की सरकार है। अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र, वेंकैया नायडू जैसे कई नेता इस सरकार में शामिल हैं।

खुद मोदी गुजरात में जेल में बंद लोगों के पास अखबार व पत्र पहुंचाते थे। अगर इस सरकार में मीसा और डीआईआर झेलने वालों की नहीं सुनी जाएगी तो कब सुनी जाएगी।

पैसा न दे, पाठ्यक्रम में ही शामिल कर दे

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बृजकिशोर मिश्र - फोटो : amar ujala

आपातकाल लोकतंत्र रक्षक सेनानी समिति के अध्यक्ष बृजकिशोर मिश्र का कहना है कि 1975 में मैं 20 साल का था। लखनऊ विवि में स्नातक की पढ़ाई कर रहा था। कन्नौज में अपने गांव महोई गया था। वहीं छिबरामऊ के एसडीएम ने मुझे बम फोड़ने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। लगभग 19 महीने जेल में रहा। मीसा लगा।

मोदीजी की सरकार बनी तो उम्मीद जगी थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। पैसा नहीं दे सकते, लेकिन आपातकाल के संग्राम को पाठ्यक्रम में तो रख सकते हैं।

बचपन में  किसी गुड़ की भट्ठी पर हम बच्चों को भट्ठी में ईंधन झोंकने की एवज में गुड़ नहीं मिलता था तो हम कहा करते थे, ‘राम करै गुड़ लपटा (भगवान करे इस बार अच्छा गुड़ न बने) होय।’ लगता है कि  अपने इन पुराने मित्रों की सरकार के लिए भी हमें ऐसा ही बोलना पड़ेगा।

वाराणसी जाकर मोदी को दिलाएंगे याद

BJP forgets promises made for emergency victims.
निर्मल सिंह - फोटो : amar ujala

सामाजिक कार्यकर्ता निर्मल सिंह कहते हैं कि पता नहीं संघर्ष के बाद सत्ता में पहुंचने वाले भी आपातकाल के काले इतिहास और अत्याचार को कैसे भूल गए। अरुण जेटली भी काफी दिनों तक जेल में रहे। वे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुख्य सलाहकार भी हैं।

ऐसा तो हो नहीं सकता कि सत्ता की चकाचौंध में वे अपनी और अपने साथियों की जेल की त्रासदी भूल गए हों। पैसा न दें। सुविधाएं न दें, पर कम से कम इतिहास में स्थान तो दे ही सकते हैं। यह काम तो केंद्र सरकार के ही अधिकार में है। हम लोग कुछ और तो कर नहीं सकते, पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव क्षेत्र में जाकर उन्हें आपातकाल के लड़ाकों के लिए कुछ करने की याद तो दिला ही सकते हैं।

पत्रकार व आरएसएस के पुराने कार्यकर्ता देवी प्रसाद गुप्ता का कहना है कि हम लोग किसी पैकेज के चक्कर में जेल नहीं गए थे, बल्कि इस प्रेरणा से गए थे कि इस देश में तानाशाही प्रवृत्ति वाली कांग्रेस के खिलाफ जागृति आनी चाहिए। विरोध की शक्ति पैदा होनी चाहिए।

देश में आज भी लोकतंत्र को कमजोर करने वाली ताकतें पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। मोदी कुछ न करें, कम से शिक्षा में तो इस मुद्दे को जोड़ ही सकते हैं जिससे भावी पीढ़ियों को प्रेरणा मिले।

क्या इसे ही सियासत कहते हैं
इलाहाबाद विवि छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष व पूर्व राज्यमंत्री बृजेश शर्मा का कहना है कि तमाम ऐसे लोग हैं जिनको आपातकाल की त्रासदी ने तोड़ दिया। बहुत सारे लोगों को आज भी प्रदेश सरकार की ओर से घोषित सुविधाएं नहीं मिल रही हैं। मेरे कई साथी इस समय केंद्र में वरिष्ठ मंत्री हैं। वे खुद भी आपातकाल में जेल गए थे। मैं तो प्रदेश का पहला मीसा बंदी हूं।

उम्मीद थी कि हमारे पुराने साथी सत्ता में आने के बाद इन लोगों की कुछ न कुछ सुध लेंगे, पर दो साल में निराशा ही हाथ लगी। कभी-कभी तो लगता है कि सियासत क्या यही है कि ऊपर पहुंचो तो नीचे वालों को भूल जाओ। संघर्ष ही नहीं, साथियों को भी भूल जाओ।

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