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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   BJP candidate for legislative council election.

UP BJP: जोड़तोड़ व मनीगेम का रास्ता साफ

Sat, 17 Jan 2015 11:33 PM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 17 Jan 2015 11:33 PM IST
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BJP candidate for legislative council election.

‘जोड़तोड़ व खरीद-फरोख्त से हासिल की गई सत्ता को मैं चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूंगा।’ वर्ष 1996 में लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी का यह वाक्य सभी को याद होगा।

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दिल्ली विधानसभा के पिछले चुनाव में भाजपा ने इसी तर्क के साथ सरकार बनाने से इन्कार कर दिया था, पर लगता है कि समय के साथ भाजपा भी बदल गई। न उसे अब जोड़तोड़ से परहेज रह गया है और न सिद्धांतों से समझौता करने में कोई गुरेज।
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अनुशासन का दावा तो बहुत पीछे छूट गया है। विधान परिषद चुनाव में विधायकों की जरूरी संख्या न होते हुए भी दूसरा उम्मीदवार उतारना इसका ताजा प्रमाण है।

भाजपा के पास सिर्फ 41 विधायक हैं। इस आधार पर वह एक ही उम्मीदवार को जिता सकती है, पर पार्टी ने दो उम्मीदवार उतारकर जोड़तोड़ व विधायकों की खरीद-फरोख्त का रास्ता खोल दिया है।
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इनमें लक्ष्मण आचार्य को तो केंद्रीय संसदीय बोर्ड ने घोषित किया है, जबकि दयाशंकर सिंह का नामांकन बाद में कराया गया। स्वाभाविक रूप से भाजपा को सबसे पहले आचार्य की सीट निकालने के लिए प्रथम वरीयता के वोटों के लिए 32 विधायकों का कोटा उन्हें आवंटित करना ही पड़ेगा।

इसके बाद पार्टी के पास सिर्फ नौ वोट ही बचेंगे। दयाशंकर की सीट निकालने के लिए उसे 23 वोटों का इंतजाम करना होगा।

इस तरह तय होगा सौदा

BJP candidate for legislative council election.

वैसे तो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी दावा करते हैं कि परिणाम सार्थक आएंगे। विधायक अंतरात्मा की आवाज पर वोट करेंगे, पर सच यही है कि दयाशंकर के लिए वोट के बदले दूसरे दलों के विधायक कुछ न कुछ कीमत जरूर चाहेंगे। यह कीमत विधानसभा के 2017 में होने वाले चुनाव में भाजपा के टिकट का वादा भी हो सकती है।

वोट बचाने व जुटाने की चुनौती: भाजपा के दूसरा उम्मीदवार उतारने से सभी दलों के सामने अपने वोट बचाने और जुटाने की दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है। रणनीतिकारों को जहां अपने वोट में सेंधमारी न होने देने के लिए मशक्कत करनी पड़ेगी, वहीं इस पर भी नजर रखनी होगी कि आपात स्थिति में दूसरे दल के कौन-कौन विधायक उनके काम आ सकते हैं।

इससे जोड़तोड़ और अनुशासनहीनता को बढ़ावा मिलेगा। इसकी तोहमत भाजपा पर लगेगी जो खुद को अनुशासित और राजनीतिक शुचिता का पालन करने वाली पार्टी कहते नहीं थकती।

दांव पर साख : पार्टी के एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कहते हैं कि सवाल यह नहीं है कि भाजपा की हार होगी या जीत। सबसे बड़ा सवाल साख का है, जो जीतने पर भी बचती नहीं दिख रही है। परिणाम अगर इसके विपरीत आए तो वैसे भी नहीं बचनी है।

जीत गए तो भी भाजपा कभी जोड़तोड़ व खरीद-फरोख्त की राजनीति का विरोध नहीं कर पाएगी। दूसरे दलों के वोट देने वाले विधायकों को पार्टी में महत्व व टिकट देकर इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। यह कीमत कार्यकर्ताओं की बलि ही होगी।

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