'प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए जारी हैं केंद्र की कोशिशें'
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केंद्रीय सामाजिक न्याय अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने कहा कि केंद्र सरकार प्रमोशन में आरक्षण की बहाली के लिए प्रयासरत है। यूपी सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के सामने सही जानकारी रखी होती तो दलितों को प्रमोशन मेंआरक्षण पर रोक न लगती।
न्यायालय ने नौकरियों में दलितों की मौजूदा हिस्सेदारी के साथ उनके पिछड़े होने सहित कुछ बिंदुओं पर जानकारी मांगी थी, लेकिन प्रदेश सरकार ने जान-बूझकर न्यायालय के सामने सही तथ्य नहीं रखे।
केंद्र सरकार इस समस्या का हल निकालने की कोशिश कर रही है। इससे पहले केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने डॉ. अंबेडकर के देश के प्रति योगदान को याद करते हुए आरक्षण को सामाजिक और राजनीतिक जरूरत बताया।
दोनों मंत्री शुक्रवार को यहां इंदिरानगर में भारत जन ज्ञान-विज्ञान समिति के अंबेडकर रिसर्च सेंटर और पुस्तकालय के उद्घाटन अवसर पर बोल रहे थे।
पूर्ववर्ती सरकारों की गलती से अंबेडकर बने एक वर्ग के दुश्मन
गहलोत ने कहा कि अंबेडकर आस्तिक थे, नास्तिक नहीं। दुर्भाग्य से उनके बहुत से अनुयायी उन्हें नास्तिक मान बैठे, जिससे अंबेडकर की गलत छवि प्रचारित हो गई।
आजादी के बाद केंद्र में बनी सरकारों ने अंबेडकर की सही सोच और उनके विचारों को लोगों तक पहुंचाने में रुचि नहीं ली। इन सरकारों की गलती से अंबेडकर एक वर्ग के लिए भगवान बन गए, लेकिन दूसरे वर्ग के लिए उनकी छवि दुश्मन जैसी बन गई जबकि वह ऐसे नहीं थे।
जातिवादी नहीं, राष्ट्रवादी थे अंबेडकर
राजनाथ ने कहा कि अंबेडकर जातिवादी नहीं थे। वे सच्चे राष्ट्रवादी थे। मोदी सरकार ने अंबेडकर को सही संदर्भों में लोगों के बीच पहुंचाने का काम शुरू किया है।
अंबेडकर से जुड़े स्थलों के विकास और दिल्ली में अंतराष्ट्रीय स्टडी सेंटर का निर्माण भी इसी कोशिश की कड़ी है। कार्यक्रम को समिति के अध्यक्ष पूर्व आईएएस हरिश्चंद्र व परदेशी बौद्ध ने भी संबोधित किया।
आधुनिक भारत के शिल्पी थे नेहरू
राजनाथ सिंह ने कहा, देश के विकास में महात्मा गांधी की तरह देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के योगदान को कभी भी नकारा नहीं जा सकता। वे आधुनिक भारत के शिल्पी थे। उन्होंने और अंबेडकर ने मिलकर देश के विकास की नींव रखी।
वंदे मातरम के दौरान बैठे रहे लोग
राजनाथ और गहलोत के स्वागत के बाद संचालक ने कहा कि अब एक गीत होगा। इसके बाद वंदे मातरम का गायन होने लगा, लेकिन मंचासीन अतिथियों ने खड़े होने की जरूरत ही नहीं समझी। सभागार में भी ज्यादातर लोग कुर्सियों पर ही बैठे रहे।