‘डॉलर ही किस्मत लिखेंगे, रिश्वत के नजराने होंगे...’ नहीं रहे पद्मश्री शायर बेकल उत्साही
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राज्यसभा के पूर्व सांसद और जाने-माने कवि बेकल उत्साही का शनिवार सुबह दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में निधन हो गया। वह 88 वर्ष के थे।
बलरामपुर के रहने वाले बेकल पद्मश्री और यशभारती जैसे सम्मानों से सम्मानित किए जा चुके थे।
शुक्रवार को वह दिल्ली स्थित आवास के बाथरूम में गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गए थे।
ब्रेन हैमरेज के बाद उन्हें दिल्ली स्थित राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती करवाया गया। हालत गंभीर होने पर उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था। शनिवार सुबह उनकी मौत हो गई।
मोहम्मद शफी खान यूं बने बेकल उत्साही
एक बार वह देवा शरीफ मजार पर गए वहां के हाफिज ने उन्हें देखकर एक कहावत बोली, बेदम गया बेकल आया। उसी दिन से मोहम्मद शफी खान ने अपना नाम बदलकर बेकल रख लिया।
1952 पंडित जवाहर लाल नेहरू एक कार्यक्रम में शामिल होने गोंडा पहुंचे। वहां बेकल ने ‘किसान भारत का’ कविता का पाठ करके नेहरू का स्वागत किया।
कविता से प्रभावित होकर नेहरू ने कहा, ये हमारा उत्साही शायर है। इसके बाद से ही उनका नाम बेकल उत्साही हो गया।
आगे देखें बेकल उत्साही की कुछ मशहूर गजलें...
डॉलर ही किस्मत लिखेंगे, रिश्वत के नजराने होंगे
इक दिन ऐसा भी आएगा होंठ-होंठ पैमाने होंगे
मंदिर-मस्जिद कुछ नहीं होंगे घर-घर में मयख़ाने होंगे
जीवन के इतिहास में ऐसी एक किताब लिखी जाएगी
जिसमें हक़ीक़त औरत होगी मर्द सभी अफ़्साने होंगे
राजनीति व्यवसाय बनेगी संविधान एक नाविल होगा
चोर उचक्के सब कुर्सी पर बैठ के मूँछें ताने होंगे
एक ही मुंसिफ़ इंटरनैट पर दुनिया भर का न्याय करेगा
बहस मोबाइल ख़ुद कर लेगा अधिवक्ता बेग़ाने होंगे
ऐसी दवाएँ चल जाएँगी भूख प्यास सब ग़ायब होगी
नये-नवेले बूढे़ होंगे,बच्चे सभी पुराने होंगे
लोकतंन्त्र का तंत्र न पूछो प्रतियाशी कम्प्यूटर होंगे
और हुकूमत की कुर्सी पर क़ाबिज़ चंद घराने होंगे
गाँव-खेत में शहर दुकाँ में सभी मशीनें नौकर होंगी
बिन मुर्ग़ी के अन्डे होंगे बिन फ़सलों के दाने होंगे
छोटे-छोटे से कमरों में मानव सभी सिमट जाएँगे
दीवारें ख़ुद फ़िल्में होंगी,दरवाज़े ख़ुद गाने होंगे
आँख झपकते ही हर इंसा नील-गगन से लौट आएगा
इक-इक पल में सदियाँ होंगी,दिन में कई ज़माने होंगे
अफ़्सर सब मनमौजी होंगे,दफ़्तर में सन्नाटा होगा
जाली डिग्री सब कुछ होगी कालेज महज़ बहाने होंगे
बिन पैसे के कुछ नहीं होगा नीचे से ऊपर तक यारो
डालर ही क़िस्मत लिक्खेंगे रिश्वत के नज़राने होंगे
मैच किर्किट का जब भी होगा काम-काज सब ठप्प रहेंगे
शेयर में घरबार बिकेंगे मलिकुल-मौत सरहाने होंगे
होटल-होटल जुआ चलेगा अविलाओं के चीर खिचेंगे
फ़ोम-वोम के सिक्के होंगे डिबियों बीच ख़ज़ाने होंगे
शायर अपनी नज़्में लेकर मंचों पर आकर धमकेंगे
सुनने वाले मदऊ होंगे संचालक बेमाने होंगे
बेकल इसको लिख लो तुम भी महिला-पुरुष में फ़र्क न होगा
रिश्ता-विश्ता कुछ नहीं होगा संबंधी अंजाने होंगे
‘जब से हम तबाह हो गए...’
जब से हम तबाह हो गये
तुम जहांपनाह हो गये
हुस्न पर निखार आ गया
आईने सियाह हो गये
आंधियों को कुछ पता नहीं
हम भी गर्द-ए-राह हो गये
दुश्मनों को चिट्ठियां लिक्खो
दोस्त ख़ैर-ख्वाह हो गये।
नए ज़माने में अब ये कमाल होने लगा
कि क़त्ल कर के भी क़ातिल निहाल होने लगा
मिरी तबाही का बाइस जो है ज़माने से
उसी को अब मिरा काहे ख़याल होने लगा
हवा-ए-इश्क़ ने भी गुल खिलाए हैं क्या क्या
जो मेरा हाल था वो तेरा हाल होने लगा
शब-ए-फ़िराक़ वो कैसा था जश्न यादों का
कि जिस का ज़िक्र भी बाद-ए-विसाल होने लगा
जो रंज-ओ-ग़म में मिरे साथ साथ था अब तक
उसे भी मेरी ख़ुशी से मलाल होने लगा
जहाँ पे मंज़र-ए-जल्वा था सिर्फ़ वहम ओ गुमाँ
वहीं पे जलसा-ए-ज़ोहरा-जमाल होने लगा
तुम्हारे क़द्र से अगर बढ़ रही हो परछाईं
समझ लो धूप का वक़्त-ए-ज़वाल होने लगा
न ख़ुद को बेचा न कोई ख़ुशामदें की हैं
तो कैसे तुम पे ये 'बेकल' सवाल होने लगा
‘किराया-दार हैं सब घर बदलते रहते हैं’
इधर भी अहल-ए-जुनूँ सर बदलते रहते हैं
बदलते रहते हैं पोशाक दुश्मन-ए-जानी
मगर जो दोस्त हैं पैकर बदलते रहते हैं
हम एक बार जो बदले तो आप रूठ गए
मगर जनाब तो अक्सर बदलते रहते हैं
ये दबदबा ये हुकूमत ये नश्शा-ए-दौलत
किराया-दार हैं सब घर बदलते रहते हैं