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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   Battle of UP: The path of any party is not easy in Doab, after the farmers' movement and the SP-RLD alliance, the BJP threw strength

पश्चिमी यूपी से ग्राउंड रिपोर्ट: दोआब में आसान नहीं किसी दल की राह, किसान आंदोलन और सपा-रालोद गठबंधन के बाद भाजपा ने झोंकी ताकत

Thu, 30 Dec 2021 08:03 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव रवींद्र प्रताप राणा, अमर उजाला, मेरठ
रवींद्र प्रताप राणा, अमर उजाला, मेरठ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Thu, 30 Dec 2021 08:03 AM IST
सार

पश्चिमी यूपी में सभी राजनीतिक दलों ने ताकत झोंक रखी है। हरियाणा और उत्तराखंड से सटे बागपत, शामली, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और मेरठ की 26 विधानसभा सीटों पर सर्द मौसम में भी सियासत गर्म है।

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Battle of UP: The path of any party is not easy in Doab, after the farmers' movement and the SP-RLD alliance, the BJP threw strength
ग्राउंड जीरो पर अमर उजाला की नेताओं से चुनावी चर्चा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पश्चिमी यूपी में गंगा-यमुना के दोआब की उर्वरा भूमि में वोटों की फसल लहलहाने के लिए सभी राजनीतिक दलों ने ताकत झोंक रखी है। हरियाणा और उत्तराखंड से सटे बागपत, शामली, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर और मेरठ की 26 विधानसभा सीटों पर सर्द मौसम में भी सियासत गर्म है। वर्ष 2017 में भाजपा ने मेरठ, सहारनपुर मंडल में पड़ने वाले इन पांचों जिलों की 26 में से 20 सीटों पर जीत हासिल की थी। सपा को तीन, कांग्रेस को दो और रालोद को एक सीट मिली थी। टिकैत का गढ़ सिसौली जिस मुजफ्फरनगर जिले में है, वहां की सभी 6 सीटें भाजपा ने जीती थीं। तीन कृषि कानूनों की वापसी के बावजूद किसान आंदोलन के प्रभाव वाले इस क्षेत्र में इस बार भाजपा की चुनौती बढ़ी हुई है। फिलहाल शुरुआती दौर में भाजपा और सपा-रालोद गठबंधन के बीच मुख्य मुकाबला नजर आ रहा है। पेश है एक रिपोर्ट...

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सियासी बहस में हर सरकार के काम को तौल रहे मतदाता
मेरठ कॉलेज के पास कुटिया के नाम से मशहूर चाय की दुकानों पर युवाओं, छात्रों, वकीलों और मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करने वालों का जमावड़ा लगा रहता है। चाय की चुस्कियों के साथ यहां सरकारें बनाने-गिराने का दौर सुबह से शाम तक चलता है। एडवोकेट शक्ति सिंह कहते हैं, किसान आंदोलन ने तो सियासी हवा ही बदल दी। तीन कृषि कानून बनाते वक्त भी मास्टर स्ट्रोक बताया गया और वापस लिए तो भी...। अब इसमें से कौन वाला मास्टर स्ट्रोक था, पता नहीं। छात्र अभिनव को लगता है कि राममंदिर और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370  हटाना इस चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा है। अभिनव के दोस्त विवेक और हर्ष भी उनका दमदारी से समर्थन करते हैं। वे कहते हैं, अखिलेश ने सिर्फ शिलान्यास किए, काम तो योगी सरकार में ही हुआ। आदेश गुर्जर काउंटर अटैक करते हैं। वह कहते हैं, सरकार ने सहारनपुर में विश्वविद्यालय बनाया और पैसा मेरठ विश्वविद्यालय से दे दिया। 

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कचहरी में लॉ की प्रैक्टिस कर रहे दीपक तोमर को लगता है कि नौकरियां मिल नहीं रहीं, इसलिए यही सबसे बड़ा मुद्दा होगा। आदेश प्रधान कहते हैं कि समाज में धर्म के आधार पर बंटवारा और भ्रष्टाचार बढ़ा है। शुभम राणा तीखे शब्दों में प्रहार करते हुए जोड़ते हैं यूपी में सबसे ज्यादा अपराध है। पीछे खड़े चाय की चुस्कियां ले रहे अमरोहा से आए डॉ. जैनुल आबेदीन महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, जातिवाद और सांप्रदायिकता को चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बताते हैं।

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पर्स मोबाइल लूट, वाहन चोरी का डर नहीं
मेरठ शहर के बीचो-बीच घंटाघर पर रात में भी लोग चुनावी चर्चाओं में मशगूल रहते हैं। यह उसी शहर विधानसभा सीट में आता है, जहां 2017 की लहर में भी भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी सपा के रफीक अंसारी से चुनाव हार गए थे। हालांकि, जिले की छह अन्य सीटों पर भाजपा विजयी रही थी। मिश्रित आबादी वाले इस इलाके में कड़ाही में पके बादाम वाले गर्म दूध की दुकानें रात भर खुली रहती हैं। यहां दूध पी रहे अंकुर बात छेड़ते हैं कि पांच साल में अपराध पर लगाम लगी है। पहले डर रहता था कि पता नहीं कहां पर्स और मोबाइल लुट जाए। अब वाहन चोरी का भी डर नहीं। चोरी के वाहनों को काटकर उनके पार्ट्स बेचने के लिए बदनाम सोतीगंज बाजार पर हुई कार्रवाई की ओर इशारा करते हुए वे कहते हैं, वहां तो ताले पड़ गए। सुना है अब वहां जूते-चप्पल बिकेंगे। पास ही खड़े इकबाल असहमति जाहिर करते हुए कहते हैं कि भाईजान लूट तो अब भी हो रही है। सोतीगंज में तो गेहूं के साथ घुन भी पिस रहा है। ईमानदारी से काम करने वालों की भी दुकानें बंद हो गईं। दुकानों पर काम करने वाले मजदूरों का क्या कुसूर है?


हाथी की चाल पर भी नजर
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के सामने चाय की दुकानों पर भी सियासत के ही चर्चे हैं। तीस बरस से भी ज्यादा पुरानी इन दुकानों पर छात्रों, कंपनियों में काम करने वालों और कर्मचारी नेताओं का जमावड़ा रहता है। मेरठ दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में पड़ने वाले इस अड्डे की खूबसूरती यह है कि सवर्ण, ओबीसी और दलित, यानी सभी धड़े आपको एक साथ बैठकर यहां चर्चा पर करते दिखेंगे। यहां मिले मेरठ कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. सतीश प्रकाश कहते हैं कि हाथी की चाल किसी भी वक्त बाजी पलट सकती है। वह आरक्षण और नौकरियों के मुद्दे पर सरकार से नाराज हैं। वहीं, छात्र संघ के पूर्व महामंत्री डॉ. रवि प्रकाश इसके उलट तर्क देते हैं कि नौकरियां तो पारदर्शिता से मिल रही हैं। भ्रष्टाचार और अपराध भी कम हुआ है। वहीं, विवेक बेनीवाल तर्क रखते हैं कि सबसे बड़ा मुद्दा किसान है। अबकी बार हवा बदल रही है। बीटेक कर चुके कमल प्रताप की नजर में अपराध घटा है। हाईवे और एक्सप्रेसवे बने हैं। भ्रष्टाचार कम हुआ है। कमल दावा करते हैं कि चुनाव इन्हीं मुद्दों पर होने जा रहा है।
 

छुट्टा पशु, महंगी बिजली से परेशान, लेकिन जाति भी फैक्टर
आम उत्पादन के लिए मशहूर किठौर विधानसभा क्षेत्र की फिजाओं में भी सियासत की चाशनी घुल रही है। मवाना रोड पर किठौर विधानसभा क्षेत्र के मसूरी गांव में हुक्का पी रहे 80 वर्ष के चौधरी अनार सिंह शांत भाव से कहते हैं, इस बार हवा बदल रही है। पास ही बैठे जयवीर उन्हें टोकते हुए कहते हैं, छुट्टा पशु खेत चर रहे हैं। तीन साल में गन्ने पर 25 रुपये बढ़े, पर किसान को कुछ नहीं मिला। बिजली की दरें गई गुना हो गईं। वहीं, अपने घर के चबूतरे पर बैठे हरदन धीमान कहते हैं, बदलाव जरूर है, फिर भी सबसे बड़ा मुद्दा तो सुरक्षा और अपराध ही रहने वाला है। खेतों में पशुओं की समस्या से वह परेशान हैं। स्थानीय स्तर पर नाराजगी के बाद भी वह सरकार से संतुष्ट हैं। पास ही बैठे किसान महावीर कश्यप कहते हैं, बदमाशों पर शिकंजा तो कसा है।
 

जाट और अति पिछड़ा सबसे ज्यादा मुखर
मेरठ-सहारनपुर मंडल के पांच जिलों की 26 सीटों पर जाट, मुस्लिम, दलित, गुर्जर और वैश्य मतदाता प्रभावशाली स्थिति में हैं। सैनी, कश्यप समेत कुछ अति पिछड़ी जातियां भी सियासी समीकरण प्रभावित करती हैं। किसान आंदोलन के असर के चलते बागपत, शामली, मुजफ्फरनगर में जाट सबसे ज्यादा मुखर हैं। किसान आंदोलन में सक्रिय भागीदारी और तीन कानून वापस होने के बाद गांवों में इनके नफे-नुकसान पर चर्चा है। 


मुस्लिमों की चिंता, बंट न जाए वोट
मवाना रोड स्थित मसूरी गांव में एक चौपाल पर चर्चा करते अजहर को लगता है कि महंगाई ने मजदूरों को मार डाला है। सिलिंडर तो मिला पर उसे भरवाएं कहां से। हर चीज महंगी है और काम धंधा चल नहीं रहा। उन्हें लगता है कि भाजपा को सीधी चुनौती सपा ही दे सकती है। यहीं बैठे महावीर कहते हैं कि अभी माहौल बदलेगा और बहनजी चुनाव में जबरदस्त एंट्री करेंगी। उन्हें उम्मीद है कि बसपा 100 से ज्यादा टिकट मुस्लिमों को देगी और इनमें ज्यादातर मेरठ-सहारनपुर मंडल में िमलेंेगे। मुस्लिम राजपूत बहुल खरदौनी गांव के हाजी गफ्फार कहते हैं कि वोट बंटा तो फायदा भाजपा को होगा। यह बात अब सब समझ चुके हैं।

 

मुजफ्फरनगर : किसानों के मुद्दों  के साथ रोजगार का भी सवाल

2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के बाद 2017 के चुनाव में मुजफ्फरनगर और शामली में सुरक्षा का मुद्दा मतदाताओं के लिए पहले नंबर पर था। करीब 38 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले मुजफ्फरनगर-शामली जिले में इस बार हवा कुछ बदली-बदली है। मुजफ्फरनगर के ऐतिहासिक गांव सोरम में मिले सौरभ सिंह कहते हैं, रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा है। भर्तियां अधूरी पड़ी हैं। विभागों में पद खाली हैं, नौकरियां मिल नहीं रहीं। बघरा के आसिफ प्रधान को लगता है कि इस बार चुनाव में किसान ही सबसे बड़ा मुद्दा है। विकास के नाम पर झूठ बोला गया है। 


अमीरनगर के जागन कश्यप का कहना है कि समाज को अनुसूचित जाति का आरक्षण दिया जाना चाहिए। जागन की नजर में रोजगार और महंगाई बड़ा मुद्दा है। पिछले पांच सालों में गन्ना मूल्य में सपा, बसपा सरकार की तुलना में कम वृद्धि होना, समय से बकाया भुगतान न मिलना और बिजली की बढ़ी दरें ग्रामीण   क्षेत्रों में मुद्दा हैं। हालांकि, यहां वोटों के ध्रुवीकरण के लिए खाद-पानी के भी इंतजाम किए जा रहे हैं। किसान आंदोलन का बड़ा चेहरा बने राकेश टिकैत के रुख पर भी मुजफ्फरनगर और आसपास के जिलों की नजर रहेगी।

शामली : पलायन बनाम भाईचारा
मुजफ्फरनगर से ही कटकर अलग जिला बने शामली में भी इस बार लोग अलग मुद्दों पर बात कर रहे हैं। भाजपा जहां दंगे और कैराना से पलायन की याद दिला रही है, वहीं विपक्षी दल भाईचारे की बात कर रहे हैं। बदमाशों के एनकाउंटर और कानून-व्यवस्था पर योगी सरकार के काम को कई लोग सराहते हैं, लेकिन काबड़ौत के अजय मलिक कहते है कि सरकार ने युवाओं की अनदेखी की है। टैबलेट और स्मार्टफोन दिए जा रहे हैं, लेकिन रोजगार नहीं दिया। लांक के रमेश कश्यप बताते हैं कि बिजली का बिल महंगा है। डीजल से कोल्हू चलाना आसान नहीं है। मजदूर वर्ग के लोगों के सामने मुश्किलें हैं। इन मुद्दों का समाधान होना चाहिए। चूनसा गांव के इंतजार कहते हैं,  समाज को भाईचारे और विकास की जरूरत है। नेताओं का ध्यान काम के बजाय लोगों को जातियों और धर्म के आधार पर बांटने पर ज्यादा है। शामली वह जिला है जहां पलायन का मुद्दा सबसे ज्यादा गरमाया। इसी जिले के कैराना कस्बे में कुछ दिनों पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पलायन के बाद लौटे कुछ परिवारों से जाकर मिले थे।

बागपत : सबसे बड़ा मुद्दा किसान
बागपत जिले को पहले चौधरी चरण सिंह और फिर चौधरी अजित सिंह की कर्मभूमि माना जाता रहा है। अजित सिंह के निधन के बाद अब राष्ट्रीय लोकदल की कमान चौधरी जयंत सिंह संभाले हुए हैं। बागपत व अन्य जाट बहुल क्षेत्रों में जयंत के प्रति भावनात्मक जुड़ाव भी दिख रहा है। करीब 24.7 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले इस जिले में भी चुनावी मुद्दे मुजफ्फरनगर और शामली की तरह ही हैं। छपरौली विधानसभा क्षेत्र के आदर्श नंगला गांव के देवपाल सिंह कहते हैं, 14 दिन में गन्ना के बकाया भुगतान का वादा पूरा नहीं हुआ। आंदोलन में 700 से ज्यादा किसानों ने जान गंवाई तब तीन कृषि कानून वापस लिए। देवपाल को लगता है कि इस बार चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा तो किसान ही रहेंगे। बड़ौत विधानसभा क्षेत्र के हिलवाड़ी गांव की अमृता कहती हैं कि कानून-व्यवस्था और विकास के मुद्दे पर ही चुनाव होगा। पिछले पांच साल   में सड़कें बेहतर हुई हैं और बदमाश सलाखों के पीछे हैं।

सहारनपुर : वुड कार्विंग कारोबारी दिख रहे परेशान
पश्चिमी यूपी में सहारनपुर जिला कई मायने में बेहद अहम है। यहां दारुल उलूम है तो मां शाकंभरी देवी की शक्ति पीठ भी। इस जिले में विधानसभा की 7 सीटें हैं। 2017 की भाजपा लहर में भी यहां कांग्रेस दो और सपा एक सीट जीत गई थी। हालांकि, देवबंद समेत 4 सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की थी। 2019 में मोदी लहर के बावजूद यहां बसपा के फजलुर्रहमान लोकसभा चुनाव जीत गए। 
कलक्ट्रेट में भूमि अधिग्रहण के मुआवजे के संबंध में आए गांव नैनसोब के किसान राजेंद्र शर्मा गन्ने का भुगतान समय पर न मिलने से नाराज हैं। वह कहते हैं, किसान की लागत भी नहीं निकल पा रही। पुरानी मंडी क्षेत्र में वुड कार्विंग का कारोबार करने वाले आरिफ खान को महंगाई सबसे ज्यादा परेशान कर रही है। वह कहते हैं कि जीएसटी की बढ़ी दरें कारोबार को नहीं उबरने दे रहीं। बाजार में ग्राहक नहीं हैं। 
शहर के ही मोहल्ला छत्ता जम्बुदास निवासी दानिश सिद्दीकी उम्मीदों से भरे हैं। वह कहते हैं, स्मार्ट सिटी योजना में चुने जाने से सहारनपुर की सूरत संवरने की उम्मीद बढ़ी है। अगर रिंग रोड बन जाए तो जाम से राहत मिल जाए। वह चाहते हैं कि दुकानों और भवनों के टैक्स कम किए जाएं। बसंत विहार निवासी अंजली शर्मा रोजगार एवं महिला सम्मान को चुनाव का बड़ा मुद्दा मानती हैं। सहारनपुर में लगभग 40 फीसदी आबादी मुस्लिम है।

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