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Lucknow News: किसानों के विकास में रोड़ा बन गई बकुलाही
Thu, 05 Dec 2024 01:06 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
संवाद न्यूज एजेंसी, लखनऊ
Updated Thu, 05 Dec 2024 01:06 AM IST
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ऊंचाहार (रायबरेली)। बकुलाही झील के अभिशाप से रोहनिया ग्राम पंचायत भी अछूती नहीं है। यहां किसान खेती कर उन्नति कर रहे थे। लेकिन बकुलाही किसानों के विकास की राह में रोड़ा बन गई है, जो आज तक बनी हुई है। किसान खेती छोड़कर दूसरा काम करने को विवश हैं। सबसे अधिक दिक्कत उन किसानों के सामने है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं।
खेती होती नहीं है और काम भी जब नहीं मिलता है तो परिवार के भरण पोषण को लेकर संकट खड़ा होता है।
ग्राम पंचायत की आबादी लगभग 6 हजार है। लगभग 400 किसानों की 700 बीघे जमीन बकुलाही की चपेट में है। नदी किनारे स्थित जमीन पर जलकुंभी उगी हुई है। सीपेज के चलते जमीन ऊसर होती जा रही है। यह हालात लगभग 40 वर्षों से है।
रोहनिया गांव के किसानों के साथ इस समस्या से परेशान होकर आसपास के गांवों के किसानों ने भी बकुलाही की सफाई के लिए अधिकारियों के कई चक्कर लगाए। हर बार बस कुछ दिनों में सफाई शुरू होने का आश्वासन मिला। कभी फाइल सरकार के पास भेजने की बात कही गई, तो कभी जल्द सफाई होने का दावा किया गया।
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हालत यह है कि चार दशकों में फाइल बनी पर बात आगे नहीं बढ़ सकी। गांव के खेतों में जलकुंभी व सीपेज का असर बना रहा। जब आवाज कहीं नहीं सुनी गई तो किसान मायूस होकर शांत हो गए।
बकुलाही की धारा रुकी और बंद हो गई खेती
गांव के किसान श्यामलाल, संजय यादव, लाल साहब वर्मा, आनन्द पांडेय, अभिषेक पुष्पाकर व संजय सिंह ने बताया कि गांव के किसानों की रोजी रोटी एक मात्र सहारा खेती है। इसी जमीन पर पूर्वजों ने किसानी की और हम लोगों का जीवन संवारा।
लेकिन 40 वर्ष पहले जब बकुलाही की धारा रुकी तो पानी खेतों में भरने लगा और जलकुंभी से फसल उगना बंद हो गई। जमीन ऊसर होने लगी। किसानों के सामने भुखमरी की समस्या खड़ी हो गई। चार दशक में किसानों की लगभग 700 बीघे जमीन बर्बाद हो गई है। खेती होती नहीं है तो दूसरे काम करने पड़ रहे हैं, ताकि परिवार का पेट पाल सके।
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खेती होती नहीं है और काम भी जब नहीं मिलता है तो परिवार के भरण पोषण को लेकर संकट खड़ा होता है।
ग्राम पंचायत की आबादी लगभग 6 हजार है। लगभग 400 किसानों की 700 बीघे जमीन बकुलाही की चपेट में है। नदी किनारे स्थित जमीन पर जलकुंभी उगी हुई है। सीपेज के चलते जमीन ऊसर होती जा रही है। यह हालात लगभग 40 वर्षों से है।
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रोहनिया गांव के किसानों के साथ इस समस्या से परेशान होकर आसपास के गांवों के किसानों ने भी बकुलाही की सफाई के लिए अधिकारियों के कई चक्कर लगाए। हर बार बस कुछ दिनों में सफाई शुरू होने का आश्वासन मिला। कभी फाइल सरकार के पास भेजने की बात कही गई, तो कभी जल्द सफाई होने का दावा किया गया।
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हालत यह है कि चार दशकों में फाइल बनी पर बात आगे नहीं बढ़ सकी। गांव के खेतों में जलकुंभी व सीपेज का असर बना रहा। जब आवाज कहीं नहीं सुनी गई तो किसान मायूस होकर शांत हो गए।
बकुलाही की धारा रुकी और बंद हो गई खेती
गांव के किसान श्यामलाल, संजय यादव, लाल साहब वर्मा, आनन्द पांडेय, अभिषेक पुष्पाकर व संजय सिंह ने बताया कि गांव के किसानों की रोजी रोटी एक मात्र सहारा खेती है। इसी जमीन पर पूर्वजों ने किसानी की और हम लोगों का जीवन संवारा।
लेकिन 40 वर्ष पहले जब बकुलाही की धारा रुकी तो पानी खेतों में भरने लगा और जलकुंभी से फसल उगना बंद हो गई। जमीन ऊसर होने लगी। किसानों के सामने भुखमरी की समस्या खड़ी हो गई। चार दशक में किसानों की लगभग 700 बीघे जमीन बर्बाद हो गई है। खेती होती नहीं है तो दूसरे काम करने पड़ रहे हैं, ताकि परिवार का पेट पाल सके।