फिर 'कोपभवन' पहुंचे आजम खां, सियासी सरगर्मी बढ़ी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सूबे के कद्दावर मंत्री आजम खां फिर रुठ गए हैं। वे वाकई गुस्सा हैं या यह सब उनकी रणनीति का हिस्सा है, ये सवाल दिवाली के दिन भी सियासी गलियारों में हलचल मचाए रहे। हालांकि राजनीतिक पंडितों का यह भी मानना है कि वे कोई आर या पार का फैसला लेंगे, इसकी उम्मीद कम ही है।
आजम के सियासी सस्पेंस से पर्दा या तो वे खुद उठाएंगे या 22 नवंबर को सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के जन्मदिन पर उनकी मौजूदगी या गैरमौजूदगी से उठेगा। फिलहाल वे रामपुर में हैं और चुनिंदा लोगों से ही मिल-जुल रहे हैं।
राजनीतिक पंडित यह बात यूं ही नहीं कह रहे हैं। दरअसल, ठीक एक साल पहले आजम ने रामपुर में जिस तरह भव्य तरीके से मुलायम सिंह यादव का जन्मदिन मनाया था और अपने ‘महबूब नेता’ के इशारे पर जान तक कुर्बान करने की बात कही थी। उससे पता चलता है कि आजम व सपा के रिश्तों की गहराई और भविष्य की कसौटी 22 नवंबर ही होगी।
वैसे यह पहला मौका नहीं है जब आजम कोपभवन में गए हैं और उनके मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देने की चर्चाएं तैर रही हैं। इससे पहले भी कई मौकों पर तल्खी दिखी है लेकिन रिश्ते कभी टूटने के कगार पर नहीं पहुंचे।
कभी मुलायम ने मना लिया तो कभी सरकार ने आजम की पसंद का फैसला कर उन्हें मना लिया। कभी-कभी ऐसा भी वक्त आया कि आजम ने खुद ही शब्दों की जादूगरी से लोगों को चकराते हुए सपा के लिए जीने व मरने की बात करके मीडिया पर ही उनको और मुलायम को दूर करने की साजिश रचने का ठीकरा फोड़ मुलायम से वफादारी साबित कर दी।
लंबा है रूठने-मनाने का सिलसिला
ठसक और अलग दिखने की चाहत आजम के अंदाज का हिस्सा है। इसकी शुरुआत तो सपा के सरकार में आने के साथ ही हो गई थी। जब आजम को मुलायम के तमाम आग्रह के बाद अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार करना पड़ा।
पर, कभी कैबिनेट की बैठकों से गायब रहकर तो कभी मुख्यमंत्री आवास पर रोजा-इफ्तार से दूरी बनाकर वे सुर्खियां बटोरते रहे। वर्ष 2012 में सपा की सरकार बनने के बाद आगरा में हुए पार्टी के अधिवेशन से गायब रहकर वे चर्चा में रहे तो कभी गाजियाबाद में बनने वाले हज हाउस के लिए वित्त विभाग से समय से धन न मिल पाने की वजह उनकी नाराजगी का कारण बना।
मुलायम ने विहिप नेताओं से मुलाकात की तब भी आजम ने कोई परहेज इसलिए नहीं किया है कि ऐसा करने वाला उनका ‘महबूब नेता’ है। सरकार ने विहिप के कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगाकर आजम को मनाया।
अतीत के घटनाक्रम पर नजर डालें तो भी इसका पता चल जाता है।मौलाना अहमद बुखारी को मुलायम ने तवज्जो दी तो आजम ने यह कहने में देर नहीं लगाई कि दाढ़ी रख लेने से कोई सच्चा मुसलमान नहीं हो जाता।
रामपुर अस्पताल की एक घटना पर तो उन्होंने सरकार और वरिष्ठ मंत्री अहमद हसन को भी निशाना बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मुलायम से रिश्तों की मजबूत जमीन को उन्होंने अपने सियासी दुश्मनों को निपटाने के लिए भी इस्तेमाल करने में कसर नहीं छोड़ी। उन्हें मेरठ के प्रभारी मंत्री पद से हटाना इतना बुरा लगा कि इस्तीफे की ही पेशकश कर डाली।
ये भी हैं नाराजगी की कुछ वजहें
परिस्थितियों पर नजर डालें तो आजम की नाराजगी के पीछे मंत्रिमंडल का पुनर्गठन ही एकमात्र वजह नहीं है। उन्हें लगता है इसमें उनके लोगों की उपेक्षा हुई है। उल्टे अमर सिंह के नजदीकी माने जाने वाले कुछ चेहरे न केवल मंत्री बने, बल्कि प्रमोशन भी पा गए हैं। इसको लेकर नाराजगी तो उन्होंने उसी दिन राजभवन में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में न जाकर जाहिर कर दी थी।
इससे पहले भी हाल में कुछ घटनाएं ऐसी हुईं जिन्होंने आजम को अनमना कर दिया। खास तौर से 5 अगस्त 2014 से जब चार साल बाद आजम के धुर विरोधी माने जाने वाले अमर सिंह जनेश्वर मिश्र पार्क के उद्घाटन समारोह में मुलायम सिंह यादव के साथ मंच पर दिखाई पड़े।
कभी मुसलमानों के मामले में एकमात्र मध्यस्थ माने जाने वाले आजम की नाराजगी बढ़ने की एक वजह मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की तरफ से मुस्लिमों के रहनुमा के तौर पर आशु मलिक के चेहरे को उभारने की कोशिश भी मानी जा रही है। खास तौर से दादरी में इकलाख की हत्या के बाद जब मुख्यमंत्री ने आशु मलिक के जरिये उनके परिवार से मुलाकात की।
सुर्खियां बटोरने की चाहत
इस पर राजनीतिशास्त्री डॉ एसके द्विवेदी का कहना है कि फिलहाल आजम के सामने सपा में बने रहने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं है। यह बात दीगर है कि आजम ने अपना स्वभाव नहीं बदला तो भविष्य में उनके लिए मुश्किलें ज्यादा बढ़ सकती हैं। मुझे तो यह लगता है कि झगड़ा सिर्फ अहमियत का है।
आजम की बेचैनी का मुख्य कारण अमर सिंह की सपा के साथ सक्रियता और मुलायम से नजदीकी है। उनकी नाराजगी के पीछे सुर्खियां बटोरकर हलचल पैदा करने और सपा में अपनी मजबूती का संदेश देने की कोशिश ही नजर आती है। इससे ज्यादा कुछ नहीं है।