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यूपी: विपक्षी नेता ठीकरा फोड़ने में मस्त, भाजपा अगले लक्ष्य में व्यस्त, 2024 के चुनाव के लिए बढ़ाए कदम

Tue, 12 Apr 2022 12:31 PM IST
ishwar ashish अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Tue, 12 Apr 2022 12:31 PM IST
सार

भाजपा 2024 के लोकसभा चुनाव को लेकर रणनीति बना रही है जबकि उसका अगला फोकस स्थानीय निकाय चुनाव हैं।

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At times when opposition is blaming to each other BJP is targeting for new goal.
केंद्रीय गृहमंत्री व भाजपा के प्रमुख रणनीतिकार अमित शाह। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

यूपी विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भाजपा जहां लक्ष्य 2024 की तरफ कदम बढ़ा रही है तो वहीं विपक्ष अभी एक दूसरे पर ही हार का ठीकरा फोड़ रहा है। गठबंधन पर एक दूसरे को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। यह विपक्ष की भविष्य की रणनीति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन भाजपा अभी से अगले लक्ष्य को साधने की रणनीति में जुट गई है। विपक्षी नेता भी बदली रणनीति के तहत नई संभावनाएं तलाशने में जुटे हैं।

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यूपी चुनाव में अपेक्षाकृत कम नजर आए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मायावती पर निशाना साधा। कहा कि हमने तो उनसे गठबंधन की बात करते हुए सीएम पद का उम्मीदवार बनाने का ऑफर दिया था पर उन्होंने बात तक नहीं की। राहुल ने आरोप लगाया कि सीबीआई, ईडी की वजह से भाजपा को चुनाव में मायावती ने खुला रास्ता मुहैया कराया।
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इस बयान से तिलमिलाई मायावती ने भी राहुल को कठघरे में खड़ा किया और कहा कि वह पहले अपने गिरेबां में झांकें। यह पूरी तरह तथ्यहीन है। दरअसल चुनाव परिणाम आने के बाद अब सभी दल एक दूसरे पर ठीकरा फोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। बसपा जैसी पार्टी इस चुनाव में मात्र एक सीट पर सिमट गई तो कांग्रेस दो पर आकर ठहरी।
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...तो क्या होता परिणाम
यदि कांग्रेस व बसपा का गठबंधन होता तो दोनों की कुछ सीटों में इजाफा हो सकता था। 1996 में बसपा कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी और उसका वोट प्रतिशत 10.26 से बढ़कर 27.73 हो गया था। हालांकि, दोनों को ही सीटों का कोई खास लाभ नहीं मिला था। इस चुनाव की बात करें तो बसपा को 13 प्रतिशत वोट मिला। कांग्रेस को मात्र 2.5 प्रतिशत वोट मिल पाया।

भाजपा को अकेले 41.29 प्रतिशत वोट मिला। यदि कांग्रेस और बसपा साथ आ भी जाते तो स्थिति में कितना बदलाव हो सकता था। यदि सपा व रालोद भी साथ आते तो हालात बेहतर होते। इस चुनाव में सपा को 32 प्रतिशत और रालोद को 2.85 प्रतिशत वोट मिला है। हालांकि इसका खतरा यह भी था कि कहीं भाजपा की तरफ एक तरफा माहौल न हो जाता और वह और भी प्रचंड बहुमत में आ जाती। जैसा कि पिछले लोकसभा चुनाव में हुआ था।

दलित-मुस्लिमों पर खास नजर
भाजपा अब अपना ध्यान स्थानीय निकाय चुनाव पर लगा रही है। यह चुनाव इस साल के अंत तक होने हैं। बसपा व कांग्रेस भी अपनी-अपनी राह जाने की बात कह रही हैं, पर अहम यह है कि इस तरह के द्वंद्व छेड़कर आगे की क्या दिशा अपनाई जाती है। खास तौर पर दलित व मुस्लिम वोटों पर। दोनों दल इन वोटों को अपने पक्ष में करने में जुटे हैं।


विस चुनाव में मुस्लिमों ने सपा को एकतरफा वोट दिया पर सपा सत्ता से दूर ही रह गई। बसपा मुस्लिमों को समझाना चाह रही है कि दलितों के साथ यदि मुस्लिम आ जाएं तभी भाजपा को रोका जा सकता है। मायावती खुद इस बाबत बयान जारी कर चुकी हैं। उधर, सपा और बसपा दोनों को ही कठघरे में लेकर कांग्रेस दलित और मुस्लिम वोटरों पर निशाना साधने की फिराक में है।

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