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असाफी मस्जिद: यहां कुबूल होती है हर दुआ

Fri, 26 Jul 2013 12:14 PM IST
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क
लखनऊ/इंटरनेट डेस्क Updated Fri, 26 Jul 2013 12:14 PM IST
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asafi masjid in lucknow

असाफी मस्जिद का निर्माण सनू 1783 में असफ-उद-दौला ने करवाया। इसके निर्माण के लिए काफी सामग्री यूरोप से मंगवाई गई थी।

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मस्जिद के निर्माण में लोहे का इस्तेमाल नहीं किया गया है और ना ही इसमें कोई बीम है।

क्यों बनी यह मस्जिद
माना जाता है कि एक दशक से भी ज्यादा समय तक अवध के लोग अकाल की चपेट में थे। इसी अकाल और भुखमरी से जनता को निजात दिलाने के लिए नवाब ने असाफी मस्जिद का निमार्ण करवाना शुरू किया जिससे लोगों को खाने की समस्या से राहत मिल सके।

इसके निर्माण में 13 साल का समय लगा था। यहीं पर मौजूद एक अद्भुत भवन त्नबाउलीत्न है जिसका प्रयोग अवध के नवाब अपनी सुरक्षा के लिए किया करते थे।

इस भवन की विशेषता थी कि भीतर बैठा आदमी बाहर से आने-जाने वाले हर आदमी पर नजर रख सकता था लेकिन बाहर से आने वाले व्यक्ति को अंदर की ओर अंधेरे के सिवा कुछ नहीं दिखाई देता था।
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शिया धर्मगुरूओं के अनुसार पेश इमाम के लिए ये अनिवार्य था कि वो जितने भी नमाजी हैं उनसे ऊंचे स्थान पर न खड़ा हो। 1857 की क्रांति से लेकर के 1884 तक इस मस्जिद पर अंग्रेजी सरकार का कब्जा हो गया था।
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जिसका इस्तेमान गन पाउडर और गोला बारूद रखने के लिए किया जाता था। इन हथियारों और गोलाबारूद का इस्तेमाल उन लोगों को खत्म करने के लिए किया जाता था जो अवध के नवाब वाजिद अली शाह के वफादार माने जाते थे।

इसके बाद 1856 तक अवध पर शासन किया और असाफी इमामबाड़ा और मस्जिद का इस्तेमाल अंग्रेज अधिकारी अपनी सुविधानुसार करने केसाथ आलमगिर मस्जिद का इस्तेमाल जवानों के चिकित्सकीय परामर्श और इलाज के लिए किया गया।

27 साल बाद अदा हुई नमाज
सत्ताइस साल बाद शम्स-उल- उलेमा से नवाजे गए शिया धर्मगुरू मोहम्मद इब्राहिम की पहल पर 3 इमारतों को अंग्रेजी शासन से मुक्त कराने के बाद नमाज अदा की गई जबकि मुहर्रम और अन्य धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन इमामबाड़े में किया जाने लगा।

इसी के बाद शिया धर्मगुरूओं की पहल के बाद नमाज-ए- जुमा और ईद और बकरी पर अदा होने वाली नमाज को असाफी मस्जिद में संयुक्त रूप से पूरे भाईचारे की भावना के साथ अदा किया गया।

1884 में वापस मिला उसका गौरव
जब अवध के तीसरे राजा मोहम्मद अली शाह (1837-1842) में असाफी मस्जिद से बड़ी जामा मस्जिद का निर्माण करवाने लगे तो उन्होंने आदेश जारी किया था कि शिया धर्म के लोग शुक्रवार को अदा होने वाली नमाज उनके मस्जिद में अदा करेंगे।


लेकिन प्रकृति को कुछ और ही मंजूर था। जब लखनऊ के नवाब कमजोर पडऩे लगे और सत्ता से दूर होने के बाद असाफी मस्जिद ने 1884 में फिर से अपने गौरव को प्राप्त किया।

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