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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   An eye on the social and political situation of women on the pretext of the upcoming UP election

यूपी का रण : महिलाओं को चाहिए सियासत में हक, आधी आबादी के ऐसे कुछ सवाल जिनके मुश्किल हैं जवाब 

Sun, 19 Dec 2021 06:27 AM IST
दुष्यंत शर्मा अजीत बिसारिया, लखनऊ
अजीत बिसारिया, लखनऊ Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sun, 19 Dec 2021 06:27 AM IST
सार

वह तोड़ती पत्थर, देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर... महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने जब कविता की यह पंक्तियां लिखी थीं तब से परिदृश्य काफी बदल गया। जिंदगी की रफ्तार बदल गई। मायने भी बदल गए। महिलाओं के जीवन में भी बदलाव आया। वे बढ़ रही हैं। पत्थरों को तोड़ते हुए खुद के लिए राह बना रही हैं। नए कीर्तिमान गढ़ रही हैं। सत्ता में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है। इन सबसे महिलाओं के प्रति कमतरी वाला समाज का नजरिया भी बदला है। पर, सवाल आज भी वही है-क्या आधी आबादी को पूरा हक मिल पाया है?  जवाब निसंदेह न ही होगा। बदलाव के लिए सत्ता में भागीदारी चाहिए। वह भी बराबरी की...।
 

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An eye on the social and political situation of women on the pretext of the upcoming UP election
चुनाव की वेला में सत्ता से सवाल... - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बढ़ती सियासी चेतना का गवाह महिलाओं का बढ़ता मतदान प्रतिशत है। साल दर साल वह पुरुषों को पीछे छोड़ रही है। मगर सदन में उनका प्रतिनिधित्व नहीं बढ़ रहा। वर्तमान में अपनी राजनीतिक भागीदारी की स्थिति से वे खुश नहीं हैं। वे राजनीतिक और प्रशासनिक पदों पर अपना वाजिब हक चाहती हैं। सवाल करती हैं... निर्णय लेने और बेहतर परिणाम देने की क्षमता कम नहीं है, फिर मंचों से हम नदारद क्यों रहें? सेना में अग्रिम मोर्चे पर महिलाओं को तैनाती हो चुकी है, मगर उन्हें मलाल है कि आखिर सियासी भागीदारी क्यों नहीं मिल रही।

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हालांकि, आधी आबादी अपनी जिंदगी में बदलाव महसूस कर रही है। घर-गृहस्थी में सुविधाएं बढ़ी हैं। आवास, शौचालय, सोलर लाइट, बिजली व रसोई गैस कनेक्शन ने जीवन की राह आसान की है। वे कहती हैं, घरौनी (आवास का राजस्व रिकॉर्ड) में नाम दर्ज होने से सम्मान तो बढ़ा है, मगर फ्रंट पर समुचित हिस्सेदारी क्यों नहीं दी जाती।
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गोरखपुर के गुलरिया बाजार की मीरा देवी बताती हैं कि इस सरकार में उन्हें सौभाग्य योजना से बिजली का मुफ्त कनेक्शन मिला। शाम होते ही घर रोशन हो जाता है, बच्चों को ढिबरी की रोशनी में नहीं पढ़ना पड़ता है। गोरखपुर के ही चरगांवा की मीना चौहान कहती हैं, शौचालय, गैस कनेक्शन और आवास मिलने से काफी सहूलियत हुई है। देवरिया के गांव सिधावे की पतिया देवी के घर पर भी दो साल पहले शौचालय बन चुका है। महराजगंज के ग्राम पंचायत कृत पिपरा की मेवातीन और कौशल्या एक स्वयं सहायता समूह की सदस्य हैं। बताती हैं कि बकरी और मुर्गी पालन के लिए सरकार से सहायता मिली, जिससे उनकी जिंदगी बदल रही है।
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रोजगार के लिए काफी कुछ किया जाना बाकी
फैजाबाद के गांव पड़री की सीमा देवी सरकार से मिली सुविधाओं के फायदे तो स्वीकार करती हैं, मगर यह भी कहती हैं कि रोजगार के लिए काफी कुछ किया जाना बाकी है। महिलाओं की जिंदगी में बड़ा और असली बदलाव तभी आ सकता है जब उनके रोजगार की समुचित व्यवस्था हो जाए। अभी तो ऐसे अवसरों की कमी ही दिखती है। बरेली के गांव गैनी की दिलकिश बताती हैं कि घर बनाने के लिए खाते में 1.20 लाख रुपये आए। थोड़े से रुपये अपने पास से मिलाकर अच्छा रहने लायक पक्का घर बन चुका है। शाहजहांपुर के हरदुआ गांव की महिला किसान देववती कहती हैं, सरकार खाद की किल्लत और छुट्टा पशुओं की समस्या से मुक्ति नहीं दिला पाई। महिलाओं को गांव के स्तर पर ही छोटे-मोटे रोजगार की व्यवस्था हो जाए तो उन्हें काफी आसानी हो सकती है। पर, इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

बड़े हैं ये सवाल...
जिंदगी में बदलाव महसूस कर रही महिलाएं सवाल भी उठाती हैं.... निर्णय लेने, बेहतर परिणाम में पीछे नहीं हैं तो सियासी भागीदारी क्यों नहीं बढ़ रही। 17वीं विधानसभा में सिर्फ 11 फीसदी महिला विधायक हैं, फिलहाल 44 महिला विधायक। संसद और देशभर की विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 15 फीसदी से भी कम है। वर्तमान लोकसभा में 14 और राज्यसभा में 11.6 फीसदी सांसद ही महिलाएं हैं। वह भी तब जबकि उनमें अधिक से अधिक प्रतिनिधित्व की ललक जगी है... वर्ष 2017 विधानसभा चुनाव को ही देख लीजिए। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं ने 4 फीसदी अधिक मतदान किया, यानी 63.31 फीसदी। वर्ष 2012 में भी 60.28 फीसदी महिलाओं ने वोट किया था। 

मुद्दों के अलावा और भी हैं कई मामले

मुख्य मुद्दे
  • सुरक्षा के और पुख्ता इंतजाम
  • राजनीति में आबादी के अनुपात में भागीदारी
  • प्रशासनिक पदों पर तरजीह
  • निजी सेक्टर में सरकार की निगरानी में तय हों सेवा-शर्तें
  • गर्भधारण के दौरान निजी सेक्टर में भी मिले अवकाश
  • स्वावलंबन के लिए पर्याप्त संख्या में महिलाओं को मिले सस्ता लोन
  • मध्यवर्गीय महिलाओं के लिए प्रोफेशनल कोर्सेज के लिए विशेष पैकेज
  • कौशल प्रशिक्षण पर और रोजगार दिलाने पर विशेष ध्यान
  • पुरुष प्रभुत्व समाज से मुक्ति के लिए किए जाएं समुचित उपाय

सरकार की प्रमुख योजनाएं : राज्य महिला सशक्तीकरण मिशन
  • आपकी सखी, आशा ज्योति केंद्रों का संचालन
  • रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष
  • ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना
  • 181 महिला हेल्प लाइन

राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम निराश्रित महिला पेंशन योजना...पति की मृत्यु पर निराश्रित महिलाओं को सहायक अनुदान योजना
  • 35 वर्ष से कम आयु की पति की मृत्यु पर निराश्रित महिला से विवाह करने पर दंपती को पुरस्कार पति की मृत्यु पर निराश्रित महिला की पुत्री से विवाह के लिए अनुदान योजना, दहेज से पीड़ित महिलाओं को आर्थिक व कानूनी सहायता योजना
  • महिला समाख्या कार्यक्रम, महिला संघ, नारी अदालत, नारी शिक्षा एवं संजीवनी केंद्र, महिला स्वयं सहायता समूह, मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना, मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना, मुस्लिम महिलाओं को बिना महरम के हज पर जाने की सुविधा, घरौनी घर की महिला के नाम, सभी थानों  में महिला हेल्प डेस्क की स्थापना, महिलाओं को त्वरित न्याय दिलाने के लिए 218 नए फास्ट ट्रैक कोर्ट, 81 मजिस्ट्रेट स्तरीय न्यायालय और 81 अपर सत्र न्यायालय

राजनीतिक दलों के प्रमुख  एजेंडे

भाजपा : महिलाओं की आबादी और ताकत को देखते हुए कोई भी पार्टी आज उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकती। भाजपा ने महिला सशक्तीकरण, महिला सुरक्षा व सम्मान को अपने एजेंडे में प्रमुखता से स्थान दिया है। सरकार का ‘मिशन शक्ति’ इसी का नतीजा है।

सपा : महिलाओं की शिक्षा को अपनी घोषणाओं में विशेष तरजीह दी। उसका एजेंडा है कि महिलाओं के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देंगे। उनके साथ हो रहे भेदभाव को खत्म करेंगे। सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव पर्दा प्रथा के खिलाफ खुलकर मंच से बोलते रहे हैं।

कांग्रेस : महिलाओं को यूपी में टिकटों और नौकरियों में 40 प्रतिशत आरक्षण को अपने एजेंडे में शामिल किया है। लड़की हूूं ....लड़ सकती हूं का नारा दिया है।

बसपा : राजनीति में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का समर्थन करती रही है।


किस पार्टी से कितनी विधायक
2017 में 42 महिलाएं जीतीं। उपचुनाव में मिली जीत के बाद यह संख्या बढ़कर 44 हो गई। इनमें से भाजपा से 37, सपा, बसपा, कांग्रेस से दो-दो, अपना दल से एक महिला विधायक हैं।

विधान परिषद में महिलाओं की मौजूदगी
कुल तीन महिलाएं विधानपरिषद में हैं। इनमें सपा से दो तो भाजपा से एक।

संसद में यूपी की महिलाओं का प्रतिनिधित्व
11 महिलाओं का यूपी से प्रतिनिधित्व है संसद में। इनमें से भाजपा से 8, कांग्रेस, बसपा व अपना दल से एक-एक सांसद शामिल हैं।

ऐसे आएगा बदलाव

प्रोत्साहित व पुरस्कृत किया जाए
दो-तीन दशक में महिलाओं की सोच में अंतर आया है। आर्थिक रूप से सबल हुई हैं। स्वाभिमान की भावना बढ़ी है। शिक्षा में ऊंचाइयों तक पहुंची हैं। सरकार का मिशन शक्ति भी उनकी काफी मदद कर रहा है। जरूरत इस बात की है सरकार महिलाओं को पुरस्कृत करने, प्रोत्साहन देने और प्रशंसा पत्र देने के लिहाज से अधिकाधिक काम करे।
- डॉ. किरनलता डंगवाल, असिस्टेंट प्रोफेसर, लखनऊ विश्वविद्यालय

उद्यम के लिए मिले सस्ता लोन
सरकारें महिलाओं को उद्यम करने के लिए सस्ता ऋण आसानी से उपलब्ध कराएं, तभी उनकी स्थिति में आमूल-चूल बदलाव आ सकता है। महिलाओं को रोजगारपरक प्रशिक्षण देकर उनके कौशल विकास किए जाने की आवश्यकता है।        
- डॉ. सरला चौधरी, वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ, लखनऊ

बिना राजनीतिक भागीदारी कैसी बराबरी
महिलाओं को आगे बढ़ाने व सुरक्षा के लिए सरकार ने काफी काम किया है। आज बाहर आने-जाने में उनके मन में सुरक्षा का भाव रहता है। स्टार्ट अप जैसी स्कीमें उन्हें आगे बढ़ा रही हैं, लेकिन बहुत सी बातें सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं। जब तक महिलाओं की राजनीति में भागीदारी नहीं बढ़ेगी, उन्हें बराबरी का हक नहीं मिल सकता। भले ही वे आर्थिक और व्यावसायिक क्षेत्र में कितनी ही आगे क्यों न बढ़ जाएं।            
- ऊषा अग्रवाल, सोशल वर्कर, लखनऊ

मध्य वर्ग की महिलाएं आज भी वंचित
सरकार कोई भी हो, मध्य वर्गीय महिलाएं खाली हाथ ही रहती हैं। इस सरकार में भी मिडिल क्लास की महिलाओं के हाथ कुछ नहीं आया। लड़कियां डॉक्टर बनना चाहती हैं, पर प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों की फीस 1.5 करोड़ रुपये है। सरकार इस तरफ  भी ध्यान दे, ताकि समाज के सभी वर्गों के बीच संतुलन स्थापित हो।
- डॉ. मधुर रे, सेवानिवृत्त उप निदेशक, सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट

निजी क्षेत्र में भी तय हों सेवा शर्तें
प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाली महिलाओं की सेवा शर्तें भी सरकार को तय करनी चाहिए। गर्भधारण व मां बनने के बाद उन्हें आवश्कतानुसार छुट्टियां नहीं मिलती हैं। कई निजी कंपनियां तो गर्भ धारण करने पर उन्हें नौकरी से निकाल देती हैं। आज लड़कियां लड़कों से ज्यादा नंबर पाती हैं।
- प्रो. विनीता पाठक, पंडित दीनदयाल उपाध्याय विवि, गोरखपुर

रोजगारपरक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में अब 70% महिलाएं
आवास, बिजली, शौचालय, गैस कनेक्शन और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं की जिंदगी में क्रांति लाई जा रही है। निर्भया स्कीम महिलाओं के लिए कारगर साबित हो रही है। मिशन शक्ति से स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की भावना को बल मिल रहा है। यूपी महिला सामर्थ्य योजना, यूपी भाग्यलक्ष्मी योजना और कन्या सुमंगला योजना आम महिलाओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। पहले हस्तशिल्प और दस्तकारों की ट्रेनिंग में महिला-पुरुष अनुपात 30:70 रहता था। अब यह 70:30 है। - क्षिप्रा शुक्ला, अध्यक्ष, यूपी डिजाइन एवं शोध संस्थान

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