क्या आजम खां के नाराज होने से चितिंत नहीं है पार्टी?
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काबीना मंत्री आजम खां का मौन व्रत अब भी जारी है। वे रामपुर में अपनों के साथ मशगूल हैं। शुक्रवार को असहिष्णुता के मुद्दे पर तो उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आड़े हाथ लिया लेकिन अपने इस्तीफे पर पैदा हुई चर्चाओं पर कुछ नहीं बोले।
इधर सपा नेतृत्व भी इस मामले पर वेट एंड वॉच की नीति पर ही चल रहा है। सपा संगठन की राजनीति और समीकरणों पर नजर डालें तो इसकी वजहें भी हैं।
सपा के बारे में यह बात किसी से अब छिपी नहीं है कि सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के खास होने के बावजूद पार्टी के भीतर एक बड़े वर्ग के साथ आजम के 36 के रिश्ते हैं। इनमें कई मुस्लिम नेता, विधायक और मंत्री भी शामिल हैं।
आजम और सपा एक दूसरे को छोड़ने की स्थिति में नहीं
राजनीति शास्त्री डॉ. एस.के. द्विवेदी कहते हैं कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थिति में सपा या आजम में कोई भी फिलहाल एक-दूसरे को छोड़ने की स्थिति में नहीं है।
सूबे में अब जब एक वर्ष बाद चुनाव का बिगुल बजने वाला है तो सपा नेतृत्व आजम अकारण कोई ऐसा संदेश नहीं देना चाहेगा जिससे उसके लिए भविष्य के चुनावी समीकरणों को लेकर कोई गलत संदेश जाए।
उधर आजम के सामने भी सपा से बेहतर कोई विकल्प नहीं है। डॉ. द्विवेदी की बात सही लगती है। भले ही बहुत सारे लोग यह न मानें कि आजम का मुसलमानों के वोट पर बहुत पकड़ है लेकिन सपा ने जिस तरह उनके चेहरे को मुस्लिम पैरोकार के रूप में ही प्रयोग किया है उसके चलते वह अब उनकी उपेक्षा का संदेश देकर अपने लिए समस्या नहीं बढ़ाना चाहेंगे।
आजम को भी यह बात भलीभांति पता है कि उनके कामकाज की शैली के लिए सूबे में सपा से बेहतर फोरम दूसरा नहीं है। जाहिर है कि ऐसे में कोई भी एक-दूसरे को छोड़ने की सीमा तक नहीं जाना चाहेगा। सपा नेतृत्व भी यह बात जानता है। इसीलिए वह बेफिक्र नजर आ रहा है।