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भक्तों की मुरादें पूरी करतीं मां दुर्गा
Updated Sun, 18 Mar 2018 11:04 PM IST
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सीतापुर। शहर के आलमनगर के प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर में प्रतिदिन श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। मां दुर्गा का यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। इस मंदिर की रौनक नवरात्र में बढ़ जाती है। नवरात्र भर पूजा-अर्चना के लिए हर रोज सुबह और शाम भक्तों की कतार लगी रहती है। महाअष्टमी पर यहां विशाल मेला भी लगता है। मां दुर्गा भक्तों की सभी मुरादें पूरी करती हैं। इस मंदिर की स्थापना 1936 में शहर के प्रतिष्ठित समाजसेवी मधुसूदन वैद्य ने की थी। यहां के पुजारी महेश चंद्र शुक्ल बताते हैं कि एक दिन दुर्गा मां ने मधुसूदन वैद्य को स्वप्न दिया कि वह उनके भव्य मंदिर का निर्माण कराएं। इससे उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी। स्वप्न में माँ दुर्गा के कहने पर ही उन्होंने आलमनगर में भव्य मंदिर का निर्माण कराया। इस मंदिर का निर्माण होने के बाद स्व. नत्थूलाल व उनकी पत्नी जमुना देवी की स्मृति में मंदिर के समीप ही उनके निवास को तोड़कर भव्य हाल का रूप दिया गया और उसमें विघ्र विनाशक गणेश, मां काली, श्रीकृष्ण, अर्जुन, भगवान राम, हनुमान, शंकर-पार्वती, भगवान शनिदेव, झूलेलाल, राधा-कृष्ण आदि देवी-देवताओं की मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की गई। मंदिर के संचालन के लिए एक ट्रस्ट की स्थापना की गई। प्रत्येक दिन सुबह और शाम मंदिर में आरती व पूजा-अर्चना होती है। नवरात्र पर विधिविधान के साथ परंपरागत ढंग से मां दुर्गा का भव्य श्रृंगार भी किया जाता है।
नवजात को सबसे पहले यहां दिलाते आशीर्वाद
मंदिर निर्माण के वक्त खुदाई करने के दौरान यहां काली माँ की एक मूर्ति मिली थी। वह आज भी मंदिर में विद्यमान हैं। यहां नवजात को जन्म के बाद सबसे पहले इसी मंदिर में लाने की परंपरा है। यहां माँ का आशीर्वाद दिलाने के बाद ही लोग बच्चे को दूसरी जगह ले जाते हैं। शादी की रस्म के दौरान तेल पूजन अधिकांश लोग इस मंदिर में करते हैं।
महेश चंद्र शुक्ल, पुजारी
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नवजात को सबसे पहले यहां दिलाते आशीर्वाद
मंदिर निर्माण के वक्त खुदाई करने के दौरान यहां काली माँ की एक मूर्ति मिली थी। वह आज भी मंदिर में विद्यमान हैं। यहां नवजात को जन्म के बाद सबसे पहले इसी मंदिर में लाने की परंपरा है। यहां माँ का आशीर्वाद दिलाने के बाद ही लोग बच्चे को दूसरी जगह ले जाते हैं। शादी की रस्म के दौरान तेल पूजन अधिकांश लोग इस मंदिर में करते हैं।
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महेश चंद्र शुक्ल, पुजारी