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टीबी के 10 फीसदी मरीजों के दिमाग की नसों में हो जाता है ब्लॉकेज, कराएं न्यूरो संबंधी जांच

Sat, 23 Mar 2019 01:32 AM IST
manoj tiwari न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: manoj tiwari Updated Sat, 23 Mar 2019 01:32 AM IST
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10 percent TB patients have blockage in brain
brain stroke
लखनऊ। ट्यूबरकुल बेलिवाई (टीबी) के मरीजों में करीब 10 फीसदी मरीजों के मतिष्क की नसों में ब्लॉकेज हो जा रहा है। इन मरीजों समय पर उपचार नहीं किया गया तो ब्रेन हैमरेज सहित कई समस्याएं हो सकती हैं। इसमें मरीज की जान जाने का खतरा रहता है। टीबी के मरीजों की एमआरआई और सीएफएल जांच कराकर इस बीमारी का पता लगाया जा सकता है। यह खुलासा हुआ है केजीएमयू के न्यूरोलॉजी विभाग की ओर से किए गए शोध में।
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सरकार की ओर से टीबी को खत्म करने के लिए चलाए गए अभियान के दौरान यह बात सामने आई कि तमाम ऐसे मरीजों की भी मौत हो गई, जिनकी टीबी नियंत्रित हो गई थी। निर्धारित प्रक्रिया के तहत दवाएं खाने के बाद कुछ समय तक टीबी के मरीज ठीक हुए लेकिन दवा बंद होने के बाद ही उनकी अचानक मौत हो गई। विभिन्न लक्षणों के आधार पर केजीएमयू के न्यूरोलॉजी विभाग ने टीबी के मरीजों पर न्यूरोलॉजिकल शोध शुरू किया। असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नीरज कुमार ने सालभर के अंदर करीब सौ मरीजों को शोध के दायरे में रखा। इस दौरान पाया गया कि करीब 10 फीसदी मरीजों में मस्तिष्क की नसों में ब्लॉकेज हैं। इन मरीजों की मस्तिष्क में हुए संक्रमण और ब्लॉकेज खत्म करने संबंधी दवाएं दी गईं। इसके परिणाम चौकाने वाला मिले। धीरे-धीरे मरीजों की हालत में सुधार हुआ और अब वे पूरी तरह से स्वस्थ्य हैं।
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कैसे होती है बीमारी
डॉ. नीरज कुमार ने बताया कि टीबी की वजह से फेफड़े में हुआ संक्रमण धीरे-धीरे दिमाग तक पहुंच जाता है। इससे खून को पतला रखने वाले तत्व खत्म हो जाते हैं। सेलेब्रासपाइनल फ्लूड के खत्म होने से भी ब्लाकेज होते हैं। यह दिमाग को खून और पानी देने वाली नसों को प्रभावित करता है। इससे दिमाग की नसों (ओरैटी) में ब्लॉकेज हो जाता है। धीरे-धीरे आंखों की रोशनी चली जाती है। ब्लॉकेज की वजह से दिमाग डैमेज हो जाता है। लोग टीबी की वजह से आई कमजोरी या टीबी मानकर इसे नजरअंदाज कर देते हैं। कुछ दिन बाद मरीज की मौत हो जाती है। यदि टीबी के साथ न्यूरो संबंधी जांच करके  मरीज का इलाज शुरू कर दिया जाए तो यह बीमारी ठीक हो जाती है। इसमें नसों को खोलने वाली, खून को पतला रखने वाली और संक्रमण रोकने वाली दवाएं दी जाती हैं।
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क्या हैं लक्षण और जांचें
फेफड़े के टीबी से पीड़ित को लगातार सिरदर्द बने रहना, बुखार, गर्दन में अकड़न, बेहोशी, बार-बार दौरे आए तो तत्काल न्यूरोलॉजिस्ट को भी दिखाना चाहिए। एमआरआई, सीटी स्कैन, सीएफएफ जांच, पीसीआर जांच में बीमारी पकड़ में आ जाती है। इसका इलाज करीब डेढ़ से दो साल तक चलता है।


ब्रेन टीबी के करीब 20 फीसदी मरीज
केजीएमयू के न्यूरो सर्जरी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर आरके गर्ग ने बताया कि लखनऊ और कानपुर के मरीजों पर करीब तीन साल पहले किए गए शोध में यह बात सामने आई थी कि टीबी के कुल मरीजों में करीब 20 से 22 फीसदी ब्रेन टीबी के मरीज हैं। इसमें ब्रेन के नर्व प्रभावित होने वालों की संख्या सर्वाधिक है। इसकी एक बड़ी वजह वायु प्रदूषण है। टीबी को लोग सिर्फ फेफड़े के संक्रमण से लेते हैं, लेकिन यह ब्रेन के साथ ही एब्डोमन, किडनी, स्पाइन अथवा शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है। ब्रेन टीबी ज्यादातर  बच्चों में होती है। ट्यूबरकुलोसिस मेनिनजाइटिस की वजह से मस्तिष्क की झिल्लियों में सूजन हो जाती है। तत्काल इलाज नहीं होने पर 30 फीसदी मरीज मर जाते हैं। इनमें से जो बच जाते हैं वे अपंग हो जाते है। ब्रेन टीबी के मरीजों में कुछ हद तक ड्रग रेजिस्टेंस भी होता है।

 
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