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अफसरों से रिश्ते को लेकर अखिलेश परेशान
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 22 Jan 2014 11:38 AM IST
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सपा सरकार के पौने दो साल के कार्यकाल में सरकार और शीर्ष नौकरशाही के रिश्ते शुरुआती दिनों में तो खुशनुमा माहौल का एहसास कराने वाले रहे।
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मगर जैसे-जैसे वक्त गुजरता गया यह खुमारी उतरती गई। अब सरकार व आला प्रशासनिक अफसरों के बीच का रिश्ता कुछ बदला-बदला नजर आने लगा है।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सत्ता संभालने के बाद आम लोगों के साथ आम नौकरशाही के लिए भी अपने सरकारी आवास के दरवाजे खोल दिए थे।
बसपा सुप्रीमो मायावती के कार्यकाल में बिना इजाजत अफसरों की उनके आवास पर एंट्री आसान नहीं थी। अपनी बात कहने के लिए भी उन्हें वाया पंचम तल दस्तक देनी होती थी।
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अफसरशाही से अच्छे तालमेल को लेकर सरकार की ओर से यह पहली सकारात्मक पहल थी। सरकार का बदला रुख नजर आया तो नौकरशाही ने भी पांच साल से बंद अपने संगठन के अधिवेशन यानी आईएएस वीक की दोबारा से शुरुआत कर दी।
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मुख्यमंत्री ने इस पहल को हाथों-हाथ लिया। उन्होंने नौकरशाही के सालाना जलसे में न सिर्फ शामिल होने की हामी भरी, बल्कि उनके साथ क्रिकेट खेलकर सरकार और नौकरशाही के रिश्ते को नई पहचान देने की कोशिश की।
सरकार ने 2006 से खाली पदों पर वरिष्ठ पीसीएस अफसरों की पूरी फौज को एकमुश्त प्रमोशन दिया, तो नौकरशाही बाग-बाग हो गई।
पर, यह खुशनुमा दौर ज्यादा दिन तक कायम नहीं रह सका। गाजियाबाद में आईएएस दुर्गाशक्ति नागपाल के निलंबन को लेकर स्वाभाविक प्रतिक्रिया के लिए आईएएस एसोसिएशन का आगे आना सरकार को बेहद नागवार गुजरा।
मुख्यमंत्री ही नहीं, वरिष्ठ मंत्रियों तक ने शीर्ष नौकरशाही और उसके संगठन को मायावती सरकार के दिनों की याद
दिलाई।
भरोसे का संकट इस कदर गहराया कि सपा सुप्रीमो मुलायमसिंह यादव तक ने आरोप लगाए कि कुछ अफसर सरकार के खिलाफ साजिश में शामिल हैं।
मुख्यमंत्री आगे बढ़े, उन्होंने यहां तक कह डाला कि पीआईएल कराकर सरकार की मुश्किलें बढ़ाने वालों मे अफसर भी शामिल हैं।
ऐसे में मुख्यमंत्री ने आईएएस एसोसिएशन के दूसरे सालाना जलसे के मौके पर क्रिकेट खेलने से परहेज का फैसला किया तो ज्यादा चौंकाने वाला नहीं लगा। साफ है कि रिश्तों में अब वह गर्मजोशी नहीं रही जो शुरुआती दिनों में थी।