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इन योजनाओं से वंचित हैं वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजी

Mon, 07 Dec 2015 03:15 PM IST
Updated Mon, 07 Dec 2015 03:15 PM IST
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west pakistani refugee are denied currency loan schemes

एलओसी और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बसे डेढ़ लाख वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजियों की मुसीबतें कम होने का नाम नहीं ले रहीं। एनडीए की बहु प्रचारित मुद्रा लोन योजना और बेटियों के लिए लाड़ली योजना का लाभ भी वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजियों को नहीं मिल रहा है।

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इन्हें भारत की नागरिकता तो है लेकिन जम्मू कश्मीर की नहीं। पहले केंद्रीय नौकरियां मिल जाती थी लेकिन अब उनमें राज्यवार कोटा की वजह से सेना और अर्द्धसैनिक बलों में भी इनके लिए प्रवेश द्वार बंद हो गया है।
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केंद्र प्रायोजित तमाम योजनाओं में रियासत का स्थायी निवास प्रमाण पत्र मांगा जाता है जो इनके पास नहीं हैं। विभाजन के समय पश्चिमी पाकिस्तान से आए लोग देश के दूसरे हिस्सों में जाकर तो घुल मिल गए लेकिन जो जम्मू कश्मीर आए, वे कहीं के नहीं रहे।
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सरकारें बदलती रहीं लेकिन समस्या यथावत रही। वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजी 1947 से अबतक अधिकारों से वंचित हैं। इन पर अबतक शरणार्थी शब्द चिपका हुआ है। इस समूह के नेता लब्बा राम गांधी ने अमर उजाला से कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से उनकी दिल्ली में 22 मिनट तक बातचीत हुई। आश्वासन भी मिला लेकिन नतीजा नहीं निकला।

पाक रिफ्यूजी आजाद भारत के गुलाम लोग बनकर रह गए

west pakistani refugee are denied currency loan schemes

जम्मू-कठुआ रोड पर स्थित मिलन केंद्र पर हर माह के पहले रविवार को इनका जमावड़ा होता है। समस्याओं के लिए संघर्ष की योजना बनती है। यह सिलसिला 68 साल से चल रहा है।

मढ़ तहसील के 65 वर्षीय हरसा टोकड़ियां गांव निवासी रतनलाल अपना दर्द बताते हुए रो पड़ते हैं। वह कहते हैं कि वेस्ट पाक रिफ्यूजी आजाद भारत के गुलाम लोग बनकर रह गए हैं। सतवारी से कुछ ही दूर बसे गांव रामबाग में इन लोगों की हालत और खराब है।

इस गांव के50 वर्षीय मोहनलाल कहते हैं कि रियासत सरकार कहती है कि 1952 की वोटर लिस्ट में नाम दिखाओ तब सर्टिफिकेट बनेगा। चूंकि यह प्रमाण पत्र नहीं है इसलिए बच्चों को कालेजों में एडमिशन नहीं मिलता। नौकरी के बारे में तो सोचना गुनाह है।

जम्मू, कठुआ, हीरानगर, सांबा, बिश्नाह, आरएसपुरा, अखनूर और पलांवलां के इलाके में बसे वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजियों के पास मजदूरी के अलावा रोजी-रोटी का कोई साधन नहीं रह गया है।

रामबाग की महिलाएं तवी नदी के किनारे दिनभर पत्थर बटोरकर जमा करती हैं, जो शाम को ठेकदार डेढ़-दो सौ रुपये में खरीदता है तो घरों में चूल्हा जल पाता है।

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