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Jammu News: पहले रावी का पानी देने से इन्कार, अब चिनाब पर तकरार
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रावी पर बनी शाहपुरकंडी परियोजना से जम्मू-कश्मीर को मिलना है 1150 क्यूसेक पानी, पंजाब सरकार कर रही आनाकानी
संवाद न्यूज एजेंसी/ब्यूरो
कठुआ/जम्मू। पंजाब पहले जम्मू-कश्मीर को रावी का पानी देने से इन्कार करता रहा है। अब चिनाब का पानी पाने के लिए तकरार कर रहा है। यह जल विवाद पांच दशक पुराना है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी जम्मू-कश्मीर का पानी पंजाब को न देने पर तल्ख रवैया दिखाया है। इससे दोनों राज्यों के बीच जल विवाद बढ़ गया है।
दरअसल, उमर ने जिस शाहपुरकंडी परियोजना का जिक्र किया है, वह रावी पर है और पंजाब के अधिकार में है। पंजाब को इससे जम्मू-कश्मीर को हिस्से के तौर पर 1150 क्यूसेक पानी देना है। यह पानी कठुआ व सांबा में 32 हजार हेक्टेयर भूमि को सिंचित करेगा। लेकिन, पंजाब अपने करार को निभा नहीं रहा है।
सिंधु जल संधि स्थगित होने के बाद अब सिंधु, झेलम व चिनाब के अतिरिक्त पानी का इस्तेमाल करने पर भी बहस हो रही है। जम्मू-कश्मीर सरकार ने चिनाब से रणवीर नहर के माध्यम से जम्मू तक पानी की व्यवस्था की है। यह नहर करीब 60 किमी बन चुकी है। अब पंजाब इस नहर को अपने क्षेत्र से जोड़ना चाहता है। वहीं, उमर अब्दुल्ला इस नहर के पानी से जम्मू-कश्मीर के सूखाग्रस्त क्षेत्रों को सिंचित करने की बात पर अड़े हैं।
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1979 में हुआ था समझाैता : रंजीत सागर बांध व शाहपुरकंडी बांध परियोजना को लेकर 1979 में जम्मू-कश्मीर व पंजाब सरकार के बीच समझौता हुआ था। तत्कालीन मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला और पंजाब के पूर्व सीएम प्रकाश सिंह बादल समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इससे पाकिस्तान का पानी रोकना था। 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रंजीत सागर बांध की आधारशिला रखी थी। परियोजना 1998 तक पूरी होने की उम्मीद थी, लेकिन प्रशासनिक व राजनीतिक कारणों से बार-बार बाधित होती रही। रंजीत सागर बांध का निर्माण तो 2001 में पूरा हो गया, लेकिन शाहपुरकंडी परियोजना पर अमल नहीं हो सका। 2008 में केंद्र ने इसको राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया, लेकिन काम 2013 में शुरू हो सका।
- 2014 में दोनों राज्यों के बीच नहर निर्माण, भूमि अधिग्रहण, मुआवजा, रोजगार व हाइडल पावर शेयरिंग से जुड़े मुद्दों पर फिर गतिरोध पैदा हो गया। जम्मू-कश्मीर ने अपनी जमीन पर निर्माण बंद करवा दिया। लगातार बातचीत, केंद्र सरकार की मध्यस्थता व मुख्य सचिव स्तर पर हुई बैठकें आखिरकार रंग लाईं। आठ सितंबर 2018 को पुनः समझौता हुआ। इसमें रावी नहर को जलाशय से जोड़ने वाले हिस्से को बनाने, पंजाब व जम्मू कश्मीर के समान हेड रेग्यूलेटर, कश्मीर नहर का साइफन, डेडीकेटेड पॉवर हाउस सप्लाई लाइन और अन्य तकनीकी मुद्दों पर समझौता हुआ। बीते साल से ही बांध के जलाशय को भरने का काम शुरू हुआ था।
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कठुआ और सांबा में 32,000 हेक्टेयर की होगी सिंचाई : शाहपुरकंडी बांध परियोजना दो जलविद्युत संयंत्रों के साथ एक बहुउद्देश्यीय रिवर वैली प्रोजेक्ट का हिस्सा है, इसकी बिजली उत्पादन क्षमता 206 मेगावाट है। परियोजना से जम्मू-कश्मीर को मिलने वाले 1150 क्यूसेक पानी से कठुआ व सांबा की 32,000 हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा मिलेगी। प्रदेश को परियोजना से उत्पन्न कुल बिजली का 20 प्रतिशत हिस्सा भी मिलेगा। हालांकि, रंजीत सागर बांध की बिजली की ही तरह यह भी बस बार रेट पर ही मिलने वाली है, जो जम्मू-कश्मीर के लिए फायदे का सौदा नहीं है। माधोपुर से सीधा कश्मीर नहर में पानी छोड़ने के लिए डेडीकेटेड सप्लाई चैनल तैयार किया गया है।
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रंजीत सागर झील से नहरों में पानी चाहती थी जम्मू-कश्मीर सरकार
शाहपुरकंडी परियोजना पर साढ़े तीन दशक तक काम शुरू न होने के बाद जम्मू-कश्मीर सरकार ने रंजीत सागर बांध से पानी लेने की योजना बनाई। पंजाब इस पर भी राजी नहीं था। हालांकि, 2010 में जलस्रोत एक्ट के बाद सरकार ने साफ कर दिया कि सतवाईं से नहरों को पानी लेने की योजना बनाई जाएगी। बाकायदा डीपीआर भी तैयार कर ली गई। योजना के मुताबिक सतवाईं के पास टनल बनाकर रावी तवी नहर तक पानी पहुंचाया जाना था। इससे बसतंपुर और लखनपुर में लिफ्ट सिंचाई स्टेशन को चलाने के लिए आने वाली करीब दस करोड़ की सालाना लागत भी खत्म होती। हालांकि, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के एक्सपर्ट पैनल को भेजी गई डीपीआर के सामने कई चुनौतियों ने इस पर अडंगा डाल दिया। इसके बाद पंजाब के शाहपुरकंडी बांध का काम शुरू करने के बाद यह परियोजना ठंडे बस्ते में चली गई। जम्मू-कश्मीर की नहरों को जब भी सिंचाई के लिए पानी की जरूरत हुई, तो पंजाब सरकार के रहम-ओ करम पर निर्भर रहना पड़ता था।
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संवाद न्यूज एजेंसी/ब्यूरो
कठुआ/जम्मू। पंजाब पहले जम्मू-कश्मीर को रावी का पानी देने से इन्कार करता रहा है। अब चिनाब का पानी पाने के लिए तकरार कर रहा है। यह जल विवाद पांच दशक पुराना है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी जम्मू-कश्मीर का पानी पंजाब को न देने पर तल्ख रवैया दिखाया है। इससे दोनों राज्यों के बीच जल विवाद बढ़ गया है।
दरअसल, उमर ने जिस शाहपुरकंडी परियोजना का जिक्र किया है, वह रावी पर है और पंजाब के अधिकार में है। पंजाब को इससे जम्मू-कश्मीर को हिस्से के तौर पर 1150 क्यूसेक पानी देना है। यह पानी कठुआ व सांबा में 32 हजार हेक्टेयर भूमि को सिंचित करेगा। लेकिन, पंजाब अपने करार को निभा नहीं रहा है।
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सिंधु जल संधि स्थगित होने के बाद अब सिंधु, झेलम व चिनाब के अतिरिक्त पानी का इस्तेमाल करने पर भी बहस हो रही है। जम्मू-कश्मीर सरकार ने चिनाब से रणवीर नहर के माध्यम से जम्मू तक पानी की व्यवस्था की है। यह नहर करीब 60 किमी बन चुकी है। अब पंजाब इस नहर को अपने क्षेत्र से जोड़ना चाहता है। वहीं, उमर अब्दुल्ला इस नहर के पानी से जम्मू-कश्मीर के सूखाग्रस्त क्षेत्रों को सिंचित करने की बात पर अड़े हैं।
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1979 में हुआ था समझाैता : रंजीत सागर बांध व शाहपुरकंडी बांध परियोजना को लेकर 1979 में जम्मू-कश्मीर व पंजाब सरकार के बीच समझौता हुआ था। तत्कालीन मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला और पंजाब के पूर्व सीएम प्रकाश सिंह बादल समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इससे पाकिस्तान का पानी रोकना था। 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रंजीत सागर बांध की आधारशिला रखी थी। परियोजना 1998 तक पूरी होने की उम्मीद थी, लेकिन प्रशासनिक व राजनीतिक कारणों से बार-बार बाधित होती रही। रंजीत सागर बांध का निर्माण तो 2001 में पूरा हो गया, लेकिन शाहपुरकंडी परियोजना पर अमल नहीं हो सका। 2008 में केंद्र ने इसको राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया, लेकिन काम 2013 में शुरू हो सका।
- 2014 में दोनों राज्यों के बीच नहर निर्माण, भूमि अधिग्रहण, मुआवजा, रोजगार व हाइडल पावर शेयरिंग से जुड़े मुद्दों पर फिर गतिरोध पैदा हो गया। जम्मू-कश्मीर ने अपनी जमीन पर निर्माण बंद करवा दिया। लगातार बातचीत, केंद्र सरकार की मध्यस्थता व मुख्य सचिव स्तर पर हुई बैठकें आखिरकार रंग लाईं। आठ सितंबर 2018 को पुनः समझौता हुआ। इसमें रावी नहर को जलाशय से जोड़ने वाले हिस्से को बनाने, पंजाब व जम्मू कश्मीर के समान हेड रेग्यूलेटर, कश्मीर नहर का साइफन, डेडीकेटेड पॉवर हाउस सप्लाई लाइन और अन्य तकनीकी मुद्दों पर समझौता हुआ। बीते साल से ही बांध के जलाशय को भरने का काम शुरू हुआ था।
कठुआ और सांबा में 32,000 हेक्टेयर की होगी सिंचाई : शाहपुरकंडी बांध परियोजना दो जलविद्युत संयंत्रों के साथ एक बहुउद्देश्यीय रिवर वैली प्रोजेक्ट का हिस्सा है, इसकी बिजली उत्पादन क्षमता 206 मेगावाट है। परियोजना से जम्मू-कश्मीर को मिलने वाले 1150 क्यूसेक पानी से कठुआ व सांबा की 32,000 हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा मिलेगी। प्रदेश को परियोजना से उत्पन्न कुल बिजली का 20 प्रतिशत हिस्सा भी मिलेगा। हालांकि, रंजीत सागर बांध की बिजली की ही तरह यह भी बस बार रेट पर ही मिलने वाली है, जो जम्मू-कश्मीर के लिए फायदे का सौदा नहीं है। माधोपुर से सीधा कश्मीर नहर में पानी छोड़ने के लिए डेडीकेटेड सप्लाई चैनल तैयार किया गया है।
रंजीत सागर झील से नहरों में पानी चाहती थी जम्मू-कश्मीर सरकार
शाहपुरकंडी परियोजना पर साढ़े तीन दशक तक काम शुरू न होने के बाद जम्मू-कश्मीर सरकार ने रंजीत सागर बांध से पानी लेने की योजना बनाई। पंजाब इस पर भी राजी नहीं था। हालांकि, 2010 में जलस्रोत एक्ट के बाद सरकार ने साफ कर दिया कि सतवाईं से नहरों को पानी लेने की योजना बनाई जाएगी। बाकायदा डीपीआर भी तैयार कर ली गई। योजना के मुताबिक सतवाईं के पास टनल बनाकर रावी तवी नहर तक पानी पहुंचाया जाना था। इससे बसतंपुर और लखनपुर में लिफ्ट सिंचाई स्टेशन को चलाने के लिए आने वाली करीब दस करोड़ की सालाना लागत भी खत्म होती। हालांकि, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के एक्सपर्ट पैनल को भेजी गई डीपीआर के सामने कई चुनौतियों ने इस पर अडंगा डाल दिया। इसके बाद पंजाब के शाहपुरकंडी बांध का काम शुरू करने के बाद यह परियोजना ठंडे बस्ते में चली गई। जम्मू-कश्मीर की नहरों को जब भी सिंचाई के लिए पानी की जरूरत हुई, तो पंजाब सरकार के रहम-ओ करम पर निर्भर रहना पड़ता था।