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Jammu News: दशकों बाद मिला न्याय, तो छलक उठा दर्द, आतंकवाद पीड़ित बोले - जख्म अब भी हरे
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कहा, हमारे घर वीरान हुए... आतंकवाद और उसके समर्थकों के खिलाफ हो निर्णायक लड़ाई
अरुण कुमार
जम्मू। 1990 से आतंकवाद की आग में झुलसे परिवारों का दर्द देर से ही सही, लेकिन जुबां पर आया है। सालों बाद जब सरकार ने अपनों को खोने वालों के परिवारों की सुध ली, तो उनका दर्द छलक उठा। भावुक परिजन बोले, देश के लिए हमारे प्रियजन की शहादत व्यर्थ नहीं थी। हमारे जख्म अब भी हरे हैं। हमें पूर्ण न्याय तब मिलेगा जब आतंकियों और उसके समर्थकों का सफाया होगा।
उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने सोमवार को इन परिवारों के सदस्यों को सरकारी नौकरी के नियुक्ति पत्र दिए। जम्मू संभाग के डोडा, राजोरी, पुंछ, रियासी, कठुआ, सांबा, किश्तवाड़ और सांबा से आए पीड़ित परिवारों ने आपबीती सुनाई तो माहौल भावुकता से भर गया। किसी ने पिता, किसी ने बेटा तो किसी ने पति खोया है। पीड़ितों ने उस मंजर को याद करते हुए कहा कि दशकों तक किसी ने सुध नहीं ली। न्याय की गुहार सिर्फ सरकारी फाइलों में दबकर रह गई। देर से ही सही, अब किसी ने हमारी आवाज तो सुनी।
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आतंकियों ने सामूहिक हत्या की थी
19 जुलाई 1999 का दिन कभी नहीं भूल सकता हूं। आतंकी आए और पूरे परिवार को मार दिया। क्या पुरुष, क्या महिलाएं किसी को नहीं छोड़ा। खून से सने शव और मातम में बदला गांव। यह कहानी है... डोडा जिले के ठाठरी तहसील की पंचायत लिहोटा के नेक चंद की, जिनके परिवार के 15 लोगों की आतंकियों ने सामूहिक हत्या कर दी थी। नेक चंद ने कहा, मेरी सास, बहन के चार भाई, बहन और भांजे की निर्मम हत्या कर दी गई। पहली बार इतनी बड़ी त्रासदी हुई थी। भावुक नेक चंद ने कहा कि परिवार में चार भाई वीडीजी के सदस्य थे। हमें अपना गांव छोड़ना पड़ा। कुछ लोगों को पहले नौकरी मिली थी, लेकिन कुछ बच गए थे, आज उन्हें भी मिली है।
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देर से ही सही..... किसी को याद तो आई
डोडा जिले के कोटी निवासी संजेश्वर सिंह ने कहा कि पापा राजेश्वर सिंह सेना में थे, उनकी ड्यूटी डोडा जिले में ही थी। 23 सितंबर 2005 का दिन था, एक मुठभेड़ में पिता आतंकियों से लोहा लेते बलिदान हो गए। यह दास्तां मैंने मां और रिश्तेदारों से सुनी। पापा की शहादत के तीन माह बाद मेरा जन्म हुआ। संजेश्वर ने कहा, पापा की शहादत के 20 साल बाद न्याय मिला है। मेरी बड़ी बहन करिश्मा को नियुक्ति पत्र मिला। देर से ही सही, किसी को हमारी याद आई।
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हमेशा के लिए जख्म मिले
18 अगस्त 2009 का वह दिन हमेशा के लिए जख्म दे गया। मेरे पति मोहम्मद अशरफ पुलिस में एसपीओ थे। उनकी ड्यूटी डोडा जिले के मरमत में थी। आतंकियों के साथ मुठभेड़ में वह बलिदान हो गए। बेटी को पिता की जगह नौकरी मिली है। कभी सोचा नहीं था सरकार हमारी सुध लेगी, क्योंकि अरसे से हमारी फाइलें सरकार के पास थी कोई सुध नहीं ले रहा था।
न्याय की गुहार लगाई, लेकिन किसी ने नहीं सुनी
पति पुरुषोत्तम पुलिस में एसपीओ थे। 2003 में हमारी शादी हुई थी। शादी के कुछ ही महीने के बाद आतंकी हमले में पति शहीद हो गए। किसी तरह से खुद को संभाला। संघर्ष को चुना, न्याय की गुहार लगाई, लेकिन किसी ने नहीं सुनी। यह कहना है कठुआ जिले के मालता निवासी रंजू देवी का। उन्होंने कहा कि हाथों की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि मांग से सिंदूर मिट गया। न्याय मिला है, लेकिन देरी हुई है।
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अरुण कुमार
जम्मू। 1990 से आतंकवाद की आग में झुलसे परिवारों का दर्द देर से ही सही, लेकिन जुबां पर आया है। सालों बाद जब सरकार ने अपनों को खोने वालों के परिवारों की सुध ली, तो उनका दर्द छलक उठा। भावुक परिजन बोले, देश के लिए हमारे प्रियजन की शहादत व्यर्थ नहीं थी। हमारे जख्म अब भी हरे हैं। हमें पूर्ण न्याय तब मिलेगा जब आतंकियों और उसके समर्थकों का सफाया होगा।
उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने सोमवार को इन परिवारों के सदस्यों को सरकारी नौकरी के नियुक्ति पत्र दिए। जम्मू संभाग के डोडा, राजोरी, पुंछ, रियासी, कठुआ, सांबा, किश्तवाड़ और सांबा से आए पीड़ित परिवारों ने आपबीती सुनाई तो माहौल भावुकता से भर गया। किसी ने पिता, किसी ने बेटा तो किसी ने पति खोया है। पीड़ितों ने उस मंजर को याद करते हुए कहा कि दशकों तक किसी ने सुध नहीं ली। न्याय की गुहार सिर्फ सरकारी फाइलों में दबकर रह गई। देर से ही सही, अब किसी ने हमारी आवाज तो सुनी।
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आतंकियों ने सामूहिक हत्या की थी
19 जुलाई 1999 का दिन कभी नहीं भूल सकता हूं। आतंकी आए और पूरे परिवार को मार दिया। क्या पुरुष, क्या महिलाएं किसी को नहीं छोड़ा। खून से सने शव और मातम में बदला गांव। यह कहानी है... डोडा जिले के ठाठरी तहसील की पंचायत लिहोटा के नेक चंद की, जिनके परिवार के 15 लोगों की आतंकियों ने सामूहिक हत्या कर दी थी। नेक चंद ने कहा, मेरी सास, बहन के चार भाई, बहन और भांजे की निर्मम हत्या कर दी गई। पहली बार इतनी बड़ी त्रासदी हुई थी। भावुक नेक चंद ने कहा कि परिवार में चार भाई वीडीजी के सदस्य थे। हमें अपना गांव छोड़ना पड़ा। कुछ लोगों को पहले नौकरी मिली थी, लेकिन कुछ बच गए थे, आज उन्हें भी मिली है।
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देर से ही सही..... किसी को याद तो आई
डोडा जिले के कोटी निवासी संजेश्वर सिंह ने कहा कि पापा राजेश्वर सिंह सेना में थे, उनकी ड्यूटी डोडा जिले में ही थी। 23 सितंबर 2005 का दिन था, एक मुठभेड़ में पिता आतंकियों से लोहा लेते बलिदान हो गए। यह दास्तां मैंने मां और रिश्तेदारों से सुनी। पापा की शहादत के तीन माह बाद मेरा जन्म हुआ। संजेश्वर ने कहा, पापा की शहादत के 20 साल बाद न्याय मिला है। मेरी बड़ी बहन करिश्मा को नियुक्ति पत्र मिला। देर से ही सही, किसी को हमारी याद आई।
हमेशा के लिए जख्म मिले
18 अगस्त 2009 का वह दिन हमेशा के लिए जख्म दे गया। मेरे पति मोहम्मद अशरफ पुलिस में एसपीओ थे। उनकी ड्यूटी डोडा जिले के मरमत में थी। आतंकियों के साथ मुठभेड़ में वह बलिदान हो गए। बेटी को पिता की जगह नौकरी मिली है। कभी सोचा नहीं था सरकार हमारी सुध लेगी, क्योंकि अरसे से हमारी फाइलें सरकार के पास थी कोई सुध नहीं ले रहा था।
न्याय की गुहार लगाई, लेकिन किसी ने नहीं सुनी
पति पुरुषोत्तम पुलिस में एसपीओ थे। 2003 में हमारी शादी हुई थी। शादी के कुछ ही महीने के बाद आतंकी हमले में पति शहीद हो गए। किसी तरह से खुद को संभाला। संघर्ष को चुना, न्याय की गुहार लगाई, लेकिन किसी ने नहीं सुनी। यह कहना है कठुआ जिले के मालता निवासी रंजू देवी का। उन्होंने कहा कि हाथों की मेहंदी भी नहीं उतरी थी कि मांग से सिंदूर मिट गया। न्याय मिला है, लेकिन देरी हुई है।