अब डायलिसिस के लिए आएं सुपर स्पेशलिटी
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राज्य के किसी सरकारी अस्पताल में पहली बार दो एपीडी (आटोमेटिक पेरिटोनियल डायलिसिस) मशीनें स्थापित की जा रही हैं। अभी तक पीड़ित डायलिसिस के लिए निजी खर्चे पर घरों में ही यह सुविधा ले रहे थे या दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ रहा था।
विभाग के एचओडी डा. एसके बाली के अनुसार 13 अगस्त को दो आधुनिक मशीनें स्थापित करने का प्रस्ताव है। इसके लिए विशेष रूम तैयार किया जा रहा है। हाल ही में विभाग में आठ स्लैड (स्लोलेस एफिशेंट डायलिसिस) मशीनों को स्थापित किया गया था।
किडनी के मरीजों को अब जल्द मिलेगी राहत
इन मशीनों से विभिन्न रोगों से गंभीर पीडि़तों को डायलिसिस की सुविधा दी जा रही है। इसके बाद यूनिट में अब एपीडी मशीनें लगाई जा रही हैं। मौजूदा समय में सुपर स्पेशलिटी में आठ मशीनों पर रोजाना दो शिफ्टों में करीब 16 डायलिसिस हो रहे हैं।
प्रति एक डायलिसिस पर 3-4 घंटे का समय लगता है। यूनिट में स्थापित मशीनों पर हिमो डायलिसिस और पेरिटोनियल डायलिसिस के मरीजों को चिकित्सा दी जा रही है। हिमो डायलिसिस में दो तरह के मरीजों का इलाज किया जाता है।
पहले में एक्यूट रिनल फेलियर के मरीज रहते हैं, जिनके शरीर में चोट से ब्लड की कमी, फ्ल्यूड की कमी, संक्रमण, सांप के काटने आदि कारणों से अचानक किडनी काम करना बंद कर देती है। ऐसे गंभीर मरीजों को डायलिसिस पर रखा जाता है।
बच्चे से लेकर बड़ों तक का होगा इलाज
दूसरी तकनीक में अधिकांश क्रोनिक मरीज डायबिटीज और अधिक ब्लड प्रेशर से पीड़ित होते हैं। इनमें मरीज की किडनी धीरे-धीरे खराब होती है। ऐसे मरीजों को उम्र भर डायलिसिस मशीन का सहारा लेना पड़ता है।
इसके अलावा पेरिटोनियल डायलिसिस में दस्त, उल्टी, ब्लड की कमी आदि से पीडि़त 10-12 साल के बच्चों का इलाज किया जाता है। पेरिटोनियल डायलिसिस में अब आटोमेटिक मशीन पर मरीज को डाल दिया जाता है, जिससे मशीन खुद ही डायलिसिस प्रक्रिया को पूरा करती है।
इससे पहले यह प्रक्रिया मैनुअल पर हो रही थी, जिसमें पर्याप्त स्टाफ और देखभाल करने वालों की जरूरत होती है। पीडि़त को डायलिसिस मशीन पर डालकर उनके शरीर से टॉक्सिन को बाहर निकालकर खून को साफ किया जाता है। टॉक्सिन खून में जाकर संक्रमण फैलाते हैं, जिससे किडनी सही तरह से काम नहीं करती है। प्रति एपीडी मशीन की कीमत साढ़े चार लाख रुपये के करीब है।