पायलट की जुबानी, हनुमंथप्पा के रेस्क्यू की कहानी
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जीवन का एक चुनौती भरा अनुभव मिला। लेह से हेलीकाप्टर ने सियाचिन के लिए उड़ान भरी। उसमें में दो पायलट और मैं था। वहां हिमस्खलन वाले क्षेत्र से एकमात्र जिंदा मिले सैनिक को लेकर लौटना था।
हनुमंथप्पा को हेलीकाप्टर में नूबरा एयरपोर्ट लाया गया था। वहां से उन्हें एयर एंबुलेंस से सैन्य अस्पताल ले जाया गया। आरएमओ घटनास्थल पर ही लगातार हनुमंथप्पा पर रातभर नजर रख रहे थे। बचाव टीम रात के समय लगातार लापता सैनिकों को बचाने की हर कोशिश कर रही थी। लेकिन वीरवार को दोपहर हनुमंथप्पा की मौत हो गई।
बर्फीले तूफान और अंधेरे में हेलीकाप्टर के पायलट लगातार संकीर्ण पहाड़ों के बीच से उड़ान भर अपने साहस का परिचय देते रहे। कम रोशनी पायलटों के लिए चुनौती बनी हुई थी। अंतत: पायलट बर्फ के बीच छोटे से हेलीपैड में सफलतापूर्वक हेलीकाप्टर उतारने में कामयाब रहे।
चारों ओर बर्फ की चादर थी। सेना के जवान अपने कुत्तों के साथ बर्फ के गहरे गड्ढों में बार-बार तलाशी के लिए जा रहे थे। लेकिन हर बार उन्हें निराशा हाथ लग रही थी। अंतत: बर्फ के नीचे माइनस 50 डिग्री से नीचे तापमान में जमा देने वाले स्थल पर हनुमंथप्पा मिले।
झपकती आंखों को देखा तो एक आशा की किरण जगी
एकबारगी तो उनकी पहचान मानव के रूप में नहीं हो रही थी। लेकिन उन्हें जब हेलीकाप्टर में डाला गया और मैंने उन्हें करीब से उनकी झपकती आंखों को देखा तो एक आशा की किरण जगी थी।
जैसे ही हमने नूबरा एयरपोर्ट के लिए उड़ान भरी, वहां पहले से एक अन्य एयर एंबुलेंस हमारा इंतजार कर रही थी, जिसमें दूसरी मेडिकल टीम जवान को तत्काल चिकित्सा सुविधा देने के लिए तैयार बैठी थी।
सबसे कम तापमान के बीच विश्व की सबसे ऊंची चोटियों को पार करते समय हनुमंथप्पा मेरे सामने पड़े थे और मैं उन्हें बार-बार उम्मीद के साथ देख रहा था। हम सभी उन्हें किसी भी हाल में बचाना चाहते थे।
इसमें कोई संदेह नहीं कि उनमें अपने को बचाने के लिए संघर्ष की जो क्षमता नजर आई, वह अनोखी थी। इसके अलावा बचाव कार्य में लगे जवानों का हौसला बर्फीली चोटियों से भी ऊंचा था। सेना की वर्दी में बर्फ के बीच जुटे जवानों को मेरा सैल्यूट।