जानिए, रावी पुल बनने के पीछे के संघर्ष की कहानी
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रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर वीरवार को देश के तीसरे सबसे बड़े पुल अटल सेतु का उद्घाटन कर जनता को समर्पित करेंगे। इस पुल के उद्घाटन से बसोहली और आसपास के क्षेत्र के विकास होने के आसार भी बढ़ेंगे।
इस पुल की मंजूरी के लिए मौजूदा समय में कई नेता इसका श्रेय लेने में जुटे हैं लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है। इस पुल के लिए बसोहली के लोगों एक नहीं बल्कि कई संघर्षपूर्ण आंदोलन कर चुके हैं।
डॉ. कर्ण सिंह ने 1958 में इस पुल की मांग को जायज ठहराते हुए निर्माण स्थल का दौरा कर फुट ब्रिज बनाने की घोषणा की थी लेकिन लोग मोटर युक्त पुल की मांग पर अड़े रहे।
1965-66 में जम्मू कश्मीर सरकार ने कम लागत से रज्जु मार्ग का निर्माण करवाया।वर्ष 1981 में शेख मोहम्मद अब्दुला की सरकार ने मिनी असेंबली का बसोहली में आयोजन किया। जिसमें पुल के लिए चार करोड़ रुपये जारी करने की घोषणा की गई।
ये योजना सिर्फ कागजों तक ही सीमित रही। वर्ष 1987 में विधायक जगदीश सपोलिया ने विधानसभा में ये मुद्दा जोरशोर से उठाया। इसके फलस्वरूप 21वीं नार्दन जोन काउंसिल श्रीनगर में आयोजित हुई।
जिसमें पंजाब सरकार ने रंजीत सागर बांध में आने वाली भूमि के बदले रावी पुल बनाने की घोषणा कर आठ करोड़ रुपये देने का ऐलान किया। इसके बावजूद राज्य की सरकार न तो पंजाब सरकार से फंड ले पाई और न ही पुल बनावा पाई।
70 करोड़ हुए थे जारी
1994 में एनडी शर्मा और नरेंद्र खजुरिया ने युवाओं को फिर से इकट्ठा कर ब्रिज एक्शन कमेटी बनाई और इसकी बागडोर डॉ. उत्तम चंद शास्त्री को सौंपी। कमेटी के बैनर तले 17 दिन लगातार बसोहली कसबा पूरी तरह से बंद रहा और कई लोगों ने भूख हड़ताल शुरू की। आंदोलन की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन गवर्नर केवी कृष्णाराव ने कमेटी के प्रतिनिधिमंडल को जम्मू बुलाया और पुल को बनाने की घोषणा की। राज्यपाल ने इस पुल को जाने वाले सड़क मार्ग को बनवाया और पुल की निर्माण लागत 40 करोड़ रुपये आंकी गई। 1995 में पुल का निर्माण कार्य शुरू नहीं होने पर ब्रिज एक्शन कमेटी ने फिर से आंदोलन शुरू किया।
44 दिनों तक कसबे में बंद देखने को मिला और भूख हड़ताल चलती रही। इस भूख हड़ताल में नरेंद्र खजुरिया, एनडी शर्मा, राजेश गुप्ता शामिल थे। आंदोलन 1996-97 तक जारी रहा।
1998 में केंद्र में भाजपा की सरकार आने पर ब्रिज एक्शन कमेटी के प्रतिनिधिमंडल ने चार बार तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी से मुलाकात की। पूर्व प्रधानमंत्री बाजपेयी ने इस ब्रिज के निर्माण का जिम्मा सीमा सड़क संगठन को दिया।
इस पुल को मंजूरी दिलाने में तत्कालीन रक्षा मंत्री प्रो. चमन लाल गुप्ता ने भी अहम भूमिका निभाई। वर्ष 2004 में इस पुल के लिए 70 करोड़ रुपये जारी किए गए।
कई बार टेंडर निकालने के बाद आखिरकार इरकान और सिंगला ग्रुप ने संयुक्त रूप से इस पुल का काम अपने हाथ में लेकर पुल के काम को पूरा किया।