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किसानों की रोजी-रोटी पर भारी पाक गोलाबारी

Wed, 11 Feb 2015 01:16 PM IST
Updated Wed, 11 Feb 2015 01:16 PM IST
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special story on problems of border area farmers

इंटरनेशनल बार्डर पर हो रही पाक गोलाबारी ने कृषि उत्पादन में भी सेंध लगाई है। किसानों की रोजी-रोटी पर पाक गोलाबारी से संकट आ गया है। बार्डर पर रहने वाले लोगों की आय का मुख्य साधन खेतीबाड़ी है, लेकिन पिछले एक साल पर नजर डाली जाए तो पाक गोलाबारी का खेतीबाड़ी पर सबसे अधिक असर पड़ा है।

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हजारों हेक्टेयर भूमि पर या तो फसल लगी नहीं, जो लगी वो देखभाल के अभाव में दम तोड़ गई। बार्डर पर पाक गोलाबारी से प्रभावित भूमि का करोड़ों रुपये का मुआवजा अब तक लंबित है। पिछले एक साल में दो सीजनल फसलें पाक गोलाबारी की भेंट चढ़ गईं। इस बार भी गेहूं की फसल पर पाक गोलाबारी का साया है।
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पहले तो फेंसिंग के बीच आने वाली कृषि भूमि पर खेतीबाड़ी नहीं होती थी, लेकिन अब फेसिंग से दो से तीन किलोमीटर का दायरा भी पाक गोलाबारी से प्रभावित हो रहा है। इससे किसानों की रोजी-रोटी पर संकट आ गया है। शायद यही वजह है कि लोग खेतीबाड़ी छोड़ कर जमीनों को सस्ते दामों पर बेचने की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं।
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यहां तक कि अपने रहने का ठिकाना भी सुरक्षित जगहों पर बनाया जा रहा है।

कुछ ऐसे हैं बार्डर की कृषि के आंकड़े

special story on problems of border area farmers

जम्मू जिला: जिले में 96 हजार हेक्टेयर क्षेत्र पर खेतीबाड़ी होती है। इसमें 26 हजार हेक्टेयर भूमि आरएस पुरा, अखनूर, अरनिया, रामगढ़ सेक्टर में बार्डर के अधीन है।

सांबा जिला: सांबा जिले के रामगढ़ और सांबा सेक्टर का 12 हजार हेक्टेयर क्षेत्र बार्डर के अधीन आता है। यहां पर कुल 39203 हेक्टेयर पर खेतीबाड़ी होती है।

कठुआ जिला: जिले का 20 हजार कनाल क्षेत्र बार्डर के पास फेंसिंग के बीच है, जबकि 10 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र बार्डर के अधीन आता है। तीनों जिलों की बात करें तो करीब दो लाख हेक्टेयर क्षेत्र पर खेतीबाड़ी होती है।

पाक गोलाबारी का असर
जम्मू के चीफ एग्रीकल्चर अधिकारी, चंद्र मोहन शर्मा का कहना है कि बार्डर के अधीन आने वाली कृषि भूमि पर होने वाली खेतीबाड़ी पर असर चिंतनीय है। पहले तो किसान फसल लगा नहीं पाए, जब लगाई तो देखभाल के अभाव में फसल सही नहीं हुई। 70 फीसदी कृषि उत्पादन पर इसका सीधा असर पड़ा है। कृषि विभाग के निदेशक एसएस जंबाल का कहना है कि पाक गोलाबारी से 15 से 20 फीसदी कृषि उत्पादन पर असर पड़ा है।

फेंसिंग के आगे की जमीन प्रभावित
सबसे ज्यादा असर फेंसिंग के आगे भारतीय भूमि पर पड़ा है। करीब एक लाख कनाल भूमि जो इन तीन जिलों की फेंसिंग के बीच आई है। इस भूमि पर संघर्ष विराम की उल्लंघना से पहले किसान खेतीबाड़ी करते थे, लेकिन पिछले एक साल से इस भूमि पर किसान बिलकुल भी खेती नहीं कर पाए। पहले पाक गोलाबारी का असर फेसिंग के बीच आई जमीन पर होता था। पिछले एक साल से पाक गोले भारत की दो से तीन किलोमीटर हद की भूमि पर भी आकर गिर रहे हैं। इसकी वजह से किसान अपने खेतों में आने से कतराने लगे हैं।

खेतों से दूर, सुरक्षित जगहों का रुख

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करोड़ों रुपये मुआवजा लंबित
इन जिलों में पाक गोलाबारी से प्रभावित भूमि का किसानों को अब तक मुआवजा नहीं मिला है। करोड़ों रुपये मुआवजा लंबित पड़ा हुआ है। सिर्फ कठुआ जिले में ही पांच करोड़ रुपए का मुआवजा लंबित है।

सुरक्षित जगहों का रुख
पाक गोलाबारी से त्रस्त सीमांत गांव के लोगों ने अपने घर बेचने शुरू कर दिए हैं और अपने इलाकों से दूर 6 से 7 किलोमीटर दूर जाकर घर खरीदना शुरू कर दिए हैं। 2003 के पहले सीमांत गांव में विरानी की माहौल था। वही हालात फिर से बनते नजर आ रहे हैं।

खेतों से दूर होने का कारण
दरअसल, खेतीबाड़ी करते कोई पता नहीं कि कब पाकिस्तान गोलाबारी शुरू कर दे। किसान नेता चौधरी देव राज का कहना है कि किसान खेतों में खाद डालने नहीं जा सकता, घास काटने नहीं जा सकता, फसल की देखभाल उसके वश में नहीं है।

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