Shweta Suicide Case: ब्रिलिएंट स्टूडेंट...बड़े थे ख्वाब, छूना चाहती थी आसमान, सुसाइड नोट से खुली कॉलेज की पोल
श्वेता, एक होनहार छात्रा जिसने डॉक्टर बनने के बड़े सपने देखे थे, कॉलेज की मानसिक प्रताड़ना और प्रशासन की अनदेखी के कारण आत्महत्या कर ली। इस घटना ने शिक्षा व्यवस्था और माता-पिता के संवाद की जरूरत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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छोटी सी उम्र में बड़े-बड़े ख्वाब को सिफ देखना ही नहीं, बल्कि उसे पूरा करने के लिए जुनून की हद तक चले जाने की जिद का दूसरा नाम था श्वेता। ठान लिया तो ठान लिया। एक भावी डाक्टर बिटिया के यूं ही चले जाने का किसी को यकीन नहीं हो रहा है।
बहन सुहानी और भाई नक्श से बड़ी थी श्वेता। परिजन कहते हैं कि पूरे परिवार को उस पर गर्व था। एक ब्रिलिएंट स्टूडेंट थी वह। बड़े ख्वाब थे, आसमान छूना चाहती थी। उसका एडमिशन बीएससी नर्सिंग में हो गया था, पंजाब चली गई थी। फिर छात्रवृत्ति परीक्षा पास कर ली और बीडीएस में एडमिशन की खबर आई तो लौट आई। उसने अपने मम्मी-पापा से कहा कि वो डाक्टर ही बनेगी और उनके हर सपने को पूरा करेगी। उन्हें दुनिया घुमाएगी। बोर्ड परीक्षा में 90 फीसदी से अंक कभी नीचे रहे नहीं।
सोशल मीडिया पर एक्टिव..पर रील डिलीट, नया मोबाइल भी खरीदना थाश्वेता की मां-भाई-बहन के साथ फोटो इस बात की गवाह हैं कि हमेशा हंसती-खिलखिलाती रहती थी। अलग-अलग पोज में फोटो, सेल्फी लेना उसे बहुत पसंद था। सोशल मीडिया पर भी एक्टिव रहती थी, हालांकि कुछ रील उसके इंस्टाग्राम अकाउंट से डिलीट है। परिजनों का कहना है कि उसका मोबाइल खराब हो गया था, उसे नया फोन लेना था। कह कर गई थी कि दोबारा आएगी तो मोबाइल फोन खरीदेगी।
दीदी अब नहीं आएगी…, आ जाए तो हम कभी नहीं लड़ेंगे
श्वेता की बहन सुहानी जीएमसी जम्मू में लैब असिस्टेंट की ट्रेेनिंग कर रही है। भाई नक्श अभी छोटा है और पास के ही स्कूल में पढ़ने जाता है। रो-रोकर दोनों थक चुके हैं। मां को बिलखता देख वे उसे चुप कराने की कोशिश करते हैं। दोनों एक दूसरे से बस यही कहते रहे कि दीदी अब नहीं आएगी...आ जाओ दीदी, हम कभी नहीं लड़ेंगे।
अलर्ट भी रहें माता-पिता, बच्चों से संवाद की पहल खुद करें
उदयपुर हो या गुरुग्राम…, दुर्भाग्यवश इस तरह की घटनाएं आम होती जा रही हैं। अभिभावकों के लिए यह एक संकेत है संवाद की पहल करने का। बच्चा यदि संवाद करने से कट रहा है तो खुद को दूर करके उसके जीवन में एक रिक्त स्थान न छोड़ें।
यह कहना है मनोचिकित्सक डा. मनजीत सिंह का। सिद्धड़ा में आचार्य श्री चंद्रशेखर कालेज आफ मेडिकल साइंसेज एक हास्पिटल में प्रो.एंड हेड डा. सिंह कहते हैं कि सोशल मीडिया पर हमेशा हंसता-खिलखिलाता चेहरा खुश हो, सुखी हो यह सच नहीं। खासकर बच्चों के मामले में हमें सतर्क रहना होगा।
बच्चों को ये भी बताएं-सिखाएं- हालात से लड़कर जीता जाता है, आत्महत्या किसी भी मुद्दे का हल नहीं
बच्चे यह मानते हैं कि सारे रास्ते बंद हो गए, उन्हें बताएं कि यह सच नहीं-पैपरिंग ठीक है, पर बच्चे को न कहने की आदत भी डालें। आजकल बच्चों में इस वजह से भी सबकुछ पा लेने की सोच है, बर्दाश्त नहीं रह गया है।