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सड़क आज भी 8 KM दूर: गांव के 90 में से 68 कुनबे खींच ले गया शहर, सांबा के रजुल गांव की दास्तान

Thu, 24 Nov 2022 05:10 PM IST
kumar गुलशन कुमार यशपाल शर्मा राजीव सिंह लंगेह, सांबा
यशपाल शर्मा राजीव सिंह लंगेह, सांबा Published by: kumar गुलशन कुमार Updated Thu, 24 Nov 2022 05:10 PM IST
सार

ऐतिहासिक पुरमंडल से सटे रजुल गांव के लोगों को रोजमर्रा कामकाज के लिए सड़क तक आठ किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। शिक्षा, स्वास्थ्य हो या फिर अन्य सुविधाएं। एक बार आने जाने में 16 किलोमीटर पैदला चलना जरूरी है। गांव में सिर्फ प्राथमिक स्कूल है, जिसके बाद की पढ़ाई करने के लिए उन्हें मंडल में 20 किलोमीटर जाना पड़ता है।

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samba Rajul village road is still 8 KM away 68 out of 90 clans of village
Samba - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सांबा शहर से गांवों तक आबादी और घर लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन सांबा जिले में माहौरगढ़ के रजुल गांव में हालात बिल्कुल उलट हैं। सड़क के अभाव में दो तिहाई से भी ज्यादा परिवार अब शहर जाकर बस गए हैं। दशकों से सुनवाई को तरस रहे रजुल गांव से सड़क आज भी आठ किलोमीटर दूर है। नब्बे के दशक में 90 परिवारों की 350 आबादी रहती थी। वर्तमान में 22 परिवारों में 110 लोग ही गांव में रह रहे हैं।

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ऐतिहासिक पुरमंडल से सटे रजुल गांव के लोगों को रोजमर्रा कामकाज के लिए सड़क तक आठ किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। शिक्षा, स्वास्थ्य हो या फिर अन्य सुविधाएं। एक बार आने जाने में 16 किलोमीटर पैदला चलना जरूरी है। गांव में सिर्फ प्राथमिक स्कूल है, जिसके बाद की पढ़ाई करने के लिए उन्हें मंडल में 20 किलोमीटर जाना पड़ता है। 
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गांव के हालात नहीं बदले तो बच्चों की पढ़ाई और अन्य सुविधाओं के लिए गांव के 68 परिवारों ने नजदीकी क्षेत्र सांबा, विजयपुर, बाड़ी ब्राह्मणा, मानसर, नड, पुरमंडल, विजयपुर और जम्मू में या तो किराये के मकानों में रहना शुरू कर दिया या फिर स्थायी रूप से वहीं अपने मकान बना लिए हैं। शहर जाकर ग्रामीणों की सहूलियतें और जीवन स्तर में सुधार हुआ है, लेकिन उन्हें मलाल है कि न चाहते हुए भी उनसे गांव छूट गया है।
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बड़े त्योहार गांव में मनाने आते हैं परिवार
साल या 6 माह बाद ही बड़े त्योहार पर यह लोग गांव में पुश्तैनी घरों का रुख करते हैं। अपने खंडहर पड़े मकानों अथवा वीरान पड़ी जमीन को देखकर दुखी होते हैं। इस दुख दर्द को अपने लोगों से साझा करते हैं, अगर इन लोगों को मूलभूत सुविधाएं सरकार की तरफ से मुहैया कराई जातीं तो आज यह अपने घरों से नहीं बिछड़ते।

गांव में देर सबेर कोई बीमार पड़ जाता है, तो जान पर बन आती है। चिकित्सा सेवा के लिए भी आठ किलोमीटर पैदल चलने की मजबूरी है। इससे कई लोगों की जान तक चली गई। मजबूरी में ज्यादातर परिवाराें को गांव से शहर की ओर आना पड़ा। -मोहन लाल, स्थानीय निवासी।

पलायन का मुख्य कारण पूर्ण रूप से शिक्षा मुहैया न होना है। बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए 20 किलोमीटर तक कॉलेज जैसी सुविधा पाने के लिए स्कूल जाने के लिए सुबह जल्दी उठना पड़ता है। 8 किलोमीटर पैदल चलने के बाद बस तक पहुंचा जाता है, और फिर सांबा के लिए 30 किलोमीटर और मंडल के लिए 12 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। -साहिल कुमार, गांव निवासी युवक।

लोग गांव में रोजगार नहीं मिलने से शहरों की तरफ जाने को मजबूर हैं। लोगों का अधिकतर समय पैदल सफर करने में ही निकल जाता है। दिहाड़ी मजदूरी करना मुश्किल हो जाता है। -जसपाल, स्थानीय निवासी।

असल में इस इलाके की सुध ही नहीं ली गई। मूलभूत सुविधाएं हर ग्रामीण क्षेत्र को मिलनी चाहिए, गांव रजुल में सड़क बनाने के लिए नाबार्ड को प्रस्ताव भेजा गया है और बोर्ड की मीटिंग होने के बाद हमें पूरा यकीन है कि इसी साल गांव में सड़क का काम लगा दिया जाएगा। जब से डीडीसी पुरमंडल के नुमाइंदे चुने गए हैं, ग्रामीण क्षेत्रों को प्राथमिकता देना ड्यूटी है, जिसके लिए दिन रात मेहनत की जा रही है। -अवतार सिंह, डीडीसी सदस्य, पुरमंडल।

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